युवाओं को भी चुपचाप अपनी चपेट में ले रही ये बीमारी! डायबिटीज बढ़ने के पीछे छिपे 7 बड़े कारण, ये संकेत दिखें तो हो जाएं सावधान
नई दिल्ली: डायबिटीज यानी मधुमेह को लंबे समय तक उम्र बढ़ने के साथ जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में कम उम्र के लोगों में भी टाइप-2 डायबिटीज और प्री-डायबिटीज को लेकर चिंता बढ़ी है। बदलती जीवनशैली, कम शारीरिक गतिविधि, अस्वास्थ्यकर खान-पान, बढ़ता वजन और कई अन्य जोखिम कारक इस स्थिति में भूमिका निभाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में 18 वर्ष से अधिक उम्र के करीब 7.7 करोड़ लोग टाइप-2 डायबिटीज से प्रभावित हैं और लगभग 2.5 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज की स्थिति में हैं। WHO के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोगों को अपनी डायबिटीज की स्थिति की जानकारी ही नहीं होती।
ICMR के INDIAB अध्ययन ने भी देश में डायबिटीज, प्री-डायबिटीज, मोटापा और दूसरे मेटाबॉलिक जोखिमों के व्यापक बोझ को दर्ज किया है। ICMR के अनुसार, इस अध्ययन में 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 1,13,106 लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और डायबिटीज की कुल प्रसार दर 9.6 प्रतिशत दर्ज की गई।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर डायबिटीज का खतरा बढ़ने के पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हो सकते हैं? खासकर युवाओं में यह बीमारी क्यों दिखाई दे रही है? आइए समझते हैं।
1. घंटों बैठे रहना और शारीरिक गतिविधि की कमी
आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में लंबे समय तक बैठकर काम करना, पढ़ाई करना, मोबाइल चलाना या टीवी देखना आम हो गया है। कई युवाओं की दिनचर्या में नियमित व्यायाम या पर्याप्त शारीरिक गतिविधि के लिए समय ही नहीं बचता।
शारीरिक गतिविधि की कमी टाइप-2 डायबिटीज के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है। जब शरीर पर्याप्त सक्रिय नहीं रहता तो वजन बढ़ने और इंसुलिन के प्रभावी ढंग से काम न करने का जोखिम बढ़ सकता है।
WHO भी नियमित शारीरिक गतिविधि को टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को कम करने वाली महत्वपूर्ण जीवनशैली आदतों में शामिल करता है।
यानी दिनभर ऑफिस की कुर्सी, कार या बाइक और फिर घर पर सोफे या बिस्तर पर समय बिताना शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता।
2. फास्ट फूड और असंतुलित खान-पान
युवाओं की बदलती खाने की आदतें भी चिंता का विषय हैं। पिज्जा, बर्गर, फ्राइड फूड, पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का बार-बार सेवन कुल कैलोरी, चीनी और अस्वास्थ्यकर वसा का सेवन बढ़ा सकता है।
WHO के अनुसार, अस्वास्थ्यकर आहार और शारीरिक निष्क्रियता गैर-संचारी बीमारियों के प्रमुख व्यवहार संबंधी जोखिम कारकों में शामिल हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि किसी एक खाद्य पदार्थ को खाने से डायबिटीज हो जाती है। समस्या तब बढ़ती है जब लंबे समय तक खान-पान असंतुलित रहे, शारीरिक गतिविधि कम हो और वजन बढ़ने लगे।
3. बढ़ता वजन और पेट के आसपास जमा चर्बी
मोटापा और अधिक वजन टाइप-2 डायबिटीज के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल हैं। शरीर में विशेष रूप से पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी जमा होना मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
WHO के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज का संबंध अधिक वजन, कम शारीरिक गतिविधि और आनुवंशिक कारकों से है।
युवाओं में बढ़ता वजन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कम उम्र में शुरू होने वाली मेटाबॉलिक समस्याएं लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।
हालांकि केवल शरीर का वजन देखकर किसी व्यक्ति को डायबिटीज का मरीज नहीं माना जा सकता। इसके लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है।
4. परिवार में डायबिटीज का इतिहास
डायबिटीज के मामले में केवल जीवनशैली ही जिम्मेदार नहीं होती। परिवार में किसी करीबी सदस्य को टाइप-2 डायबिटीज होने पर व्यक्ति में इसका जोखिम बढ़ सकता है।
WHO भी टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम में आनुवंशिक कारकों की भूमिका को स्वीकार करता है।
इसलिए अगर माता-पिता या परिवार के करीबी सदस्यों में डायबिटीज का इतिहास रहा है, तो व्यक्ति को अपनी जीवनशैली और स्वास्थ्य जांच को लेकर अधिक सतर्क रहना चाहिए।
इसका मतलब यह भी नहीं है कि परिवार में डायबिटीज होने पर व्यक्ति को निश्चित रूप से बीमारी होगी। यह केवल जोखिम को प्रभावित करने वाला एक कारक है।
5. ज्यादा मीठे पेय और अतिरिक्त चीनी
चाय-कॉफी में अतिरिक्त चीनी, मीठे शीतल पेय, एनर्जी ड्रिंक, पैकेज्ड जूस और अन्य मीठे पेय कई लोगों की रोजमर्रा की आदत का हिस्सा बन चुके हैं।
समस्या तब होती है जब इनका सेवन लगातार अधिक मात्रा में किया जाए और इसके साथ कुल कैलोरी सेवन भी बढ़ता रहे।
WHO स्वस्थ आहार और सामान्य वजन बनाए रखने को टाइप-2 डायबिटीज को रोकने या देर से आने में मदद करने वाले उपायों में शामिल करता है।
इसलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि व्यक्ति मिठाई कितनी खाता है। पूरे दिन में वह कितनी अतिरिक्त चीनी और कैलोरी ले रहा है, यह भी महत्वपूर्ण है।
6. नींद की खराब आदत और अनियमित दिनचर्या
आज की युवा पीढ़ी में देर रात तक जागना और सुबह जल्दी उठकर काम या पढ़ाई के लिए निकलना आम हो गया है। लंबे समय तक खराब नींद और अनियमित दिनचर्या कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी हो सकती है।
डायबिटीज का जोखिम केवल किसी एक रात कम सोने से नहीं बढ़ता। लेकिन लंबे समय तक अस्वस्थ जीवनशैली, कम शारीरिक गतिविधि, तनाव, खराब खान-पान और अनियमित नींद एक साथ मौजूद हों तो मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
इसलिए डायबिटीज से बचाव की चर्चा केवल चीनी कम करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पूरी जीवनशैली पर ध्यान देना जरूरी है।
7. तनाव और बदलती शहरी जीवनशैली
तेज रफ्तार जिंदगी, काम का दबाव, लंबे समय तक बैठकर काम करना और शहरी जीवनशैली भी अप्रत्यक्ष रूप से डायबिटीज के जोखिम को प्रभावित कर सकती है।
WHO के अनुसार, शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव गैर-संचारी बीमारियों के बढ़ते बोझ से जुड़े महत्वपूर्ण कारकों में हैं।
तनाव के दौरान खान-पान बिगड़ना, शारीरिक गतिविधि कम होना या नींद खराब होना भी समस्या को बढ़ा सकता है।
इसलिए तनाव को केवल मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा मानने के बजाय पूरे स्वास्थ्य पर उसके संभावित प्रभाव को समझना जरूरी है।
डायबिटीज के शुरुआती संकेत क्या हो सकते हैं?
डायबिटीज कई बार शुरुआती दौर में स्पष्ट लक्षण नहीं देती। यही वजह है कि कुछ लोगों को बीमारी का पता तब चलता है जब रक्त शर्करा लंबे समय से बढ़ी हुई होती है।
WHO के अनुसार, डायबिटीज के संभावित लक्षणों में बार-बार पेशाब आना, अत्यधिक प्यास लगना, थकान, बिना कोशिश वजन कम होना और अत्यधिक भूख जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं।
हालांकि इन लक्षणों का मतलब हमेशा डायबिटीज होना नहीं है। इनके पीछे दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं। इसलिए खुद से बीमारी का निष्कर्ष निकालने के बजाय डॉक्टर से सलाह और आवश्यक रक्त जांच कराना बेहतर होता है।
प्री-डायबिटीज को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
डायबिटीज से पहले एक ऐसी स्थिति हो सकती है जिसे प्री-डायबिटीज कहा जाता है। इसमें रक्त शर्करा सामान्य से अधिक होती है, लेकिन डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंचती।
भारत में लगभग 2.5 करोड़ वयस्कों के प्री-डायबिटीज की स्थिति में होने का WHO का अनुमान है।
प्री-डायबिटीज को समय रहते पहचानना महत्वपूर्ण है क्योंकि जीवनशैली में सुधार के जरिए टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को कम करने का अवसर मिल सकता है।
युवाओं को कब करानी चाहिए जांच?
हर युवा को बिना वजह बार-बार डायबिटीज की जांच कराने की जरूरत नहीं होती, लेकिन जिन लोगों में जोखिम कारक मौजूद हैं उन्हें डॉक्टर से सलाह लेकर जांच की जरूरत हो सकती है।
परिवार में डायबिटीज का इतिहास, अधिक वजन या मोटापा, कम शारीरिक गतिविधि, पहले से प्री-डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य मेटाबॉलिक समस्याएं होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
डायबिटीज की जांच आमतौर पर रक्त में ग्लूकोज और HbA1c जैसे परीक्षणों के जरिए की जाती है। WHO के अनुसार, समय पर जांच और उपचार डायबिटीज की गंभीर जटिलताओं को रोकने या देर से आने में मदद कर सकते हैं।
डायबिटीज सिर्फ ब्लड शुगर की बीमारी नहीं
डायबिटीज को केवल बढ़ी हुई शुगर के रूप में देखना सही नहीं है। लंबे समय तक रक्त शर्करा नियंत्रित न रहने पर शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं।
WHO के अनुसार, अनियंत्रित डायबिटीज से हृदय, रक्त वाहिकाओं, आंखों, नसों और किडनी को नुकसान पहुंच सकता है। यह हार्ट अटैक और स्ट्रोक के जोखिम को भी बढ़ाता है।
यही कारण है कि बीमारी का पता चलने के बाद केवल दवा लेना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। डॉक्टर की सलाह के अनुसार खान-पान, शारीरिक गतिविधि, वजन, रक्त शर्करा और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों की नियमित निगरानी भी जरूरी होती है।
बचाव के लिए क्या करें?
टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को कम करने के लिए जीवनशैली में छोटे लेकिन लगातार बदलाव महत्वपूर्ण हो सकते हैं। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन, स्वस्थ वजन बनाए रखना, तंबाकू से दूरी और जरूरत के अनुसार स्वास्थ्य जांच इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
WHO के अनुसार, स्वस्थ आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और सामान्य वजन बनाए रखने से टाइप-2 डायबिटीज को रोकने या इसके आने में देरी करने में मदद मिल सकती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि डायबिटीज को केवल बुजुर्गों की बीमारी समझकर नजरअंदाज न किया जाए। कम उम्र में भी यदि जोखिम कारक मौजूद हैं तो समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना और स्वास्थ्य की जांच कराना उपयोगी हो सकता है।
डायबिटीज के बढ़ते बोझ के पीछे कोई एक कारण नहीं है। कम शारीरिक गतिविधि, अस्वास्थ्यकर खान-पान, बढ़ता वजन, पारिवारिक इतिहास, अधिक मीठे और कैलोरी वाले पेय, खराब दिनचर्या तथा शहरी जीवनशैली से जुड़े व्यवहार अलग-अलग लोगों में जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत में डायबिटीज का बोझ बड़ा है और ICMR तथा WHO दोनों ही इसके प्रभाव और रोकथाम पर लगातार जोर दे रहे हैं।
अगर किसी व्यक्ति को बार-बार प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, असामान्य थकान या बिना वजह वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है। समय पर पहचान और उचित प्रबंधन डायबिटीज से होने वाली कई गंभीर जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं