क्या डायबिटीज़ हमेशा के लिए ठीक हो सकती है? रिसर्च में सामने आया डायबिटीज़ का बड़ा राज
डायबिटीज़ यानी मधुमेह आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। भारत में भी बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं। लेकिन डायबिटीज़ को लेकर सबसे बड़ी समस्या सिर्फ बढ़ी हुई ब्लड शुगर नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी गलतफहमियां भी हैं। कोई इसे केवल ज्यादा मिठाई खाने का नतीजा मानता है, तो कोई दावा करता है कि कुछ दिनों तक मेथी, करेला या कोई आयुर्वेदिक दवा लेने से डायबिटीज़ हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।
सवाल यह है कि आखिर सच क्या है?
क्या हर डायबिटीज़ एक जैसी होती है? अगर किसी बच्चे को डायबिटीज़ हो जाए तो उसे जिंदगीभर इंसुलिन क्यों लेना पड़ सकता है, जबकि कुछ वयस्क वजन कम करने और खानपान में बदलाव के बाद बिना दवा के भी सामान्य शुगर बनाए रखते हैं? क्या इसका मतलब है कि उनकी बीमारी पूरी तरह ठीक हो गई?
चिकित्सा विज्ञान इन सवालों के जवाब काफी स्पष्ट तरीके से देता है। डायबिटीज़ के अलग-अलग प्रकार होते हैं और हर प्रकार के पीछे शरीर में होने वाली प्रक्रिया अलग हो सकती है।
इंसुलिन आखिर करता क्या है?
हम जो भोजन खाते हैं, उसका एक हिस्सा पाचन के बाद ग्लूकोज़ में बदल जाता है। यही ग्लूकोज़ शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन ग्लूकोज़ को कोशिकाओं तक सही तरीके से पहुँचाने और उसका इस्तेमाल कराने में इंसुलिन की बड़ी भूमिका होती है।
इंसुलिन अग्न्याशय यानी पैंक्रियाज़ में मौजूद बीटा कोशिकाओं द्वारा बनाया जाने वाला हार्मोन है। जब शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, तो रक्त में ग्लूकोज़ की मात्रा बढ़ने लगती है।
लंबे समय तक बढ़ी हुई ब्लड शुगर आंखों, गुर्दों, नसों, हृदय और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। लेकिन हर मरीज में इंसुलिन की समस्या एक जैसी नहीं होती। यही वजह है कि टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज़ को समझना जरूरी है।
टाइप-1 डायबिटीज़ में क्यों जरूरी पड़ता है इंसुलिन?
टाइप-1 डायबिटीज़ आमतौर पर एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अग्न्याशय की उन बीटा कोशिकाओं पर हमला करने लगती है, जो इंसुलिन बनाती हैं।
समय के साथ इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाएं इतनी प्रभावित हो सकती हैं कि शरीर अपनी जरूरत के अनुसार पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। ऐसे में बाहर से इंसुलिन देना जरूरी हो जाता है।
इसी कारण टाइप-1 डायबिटीज़ वाले अधिकांश लोगों को लंबे समय तक, आमतौर पर जीवनभर, इंसुलिन की जरूरत पड़ती है। इंसुलिन इंजेक्शन या इंसुलिन पंप के जरिए दिया जा सकता है।
यह समझना बेहद जरूरी है कि टाइप-1 डायबिटीज़ केवल मिठाई खाने, मोटापे या व्यायाम की कमी के कारण नहीं होती। आनुवंशिक संवेदनशीलता और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े कई कारक इसकी शुरुआत में भूमिका निभा सकते हैं।
क्या टाइप-1 सिर्फ बच्चों को होती है?
ऐसा मानना गलत है।
टाइप-1 डायबिटीज़ बच्चों और किशोरों में अक्सर सामने आती है, लेकिन यह वयस्कों में भी शुरू हो सकती है। कुछ वयस्कों में प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा बीटा कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने की प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है। ऐसी स्थिति को कई बार एलएडीए यानी LADA कहा जाता है।
इसी तरह टाइप-2 डायबिटीज़ केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं है। आज बच्चों और किशोरों में भी टाइप-2 डायबिटीज़ देखी जा रही है।
इसलिए केवल उम्र देखकर डायबिटीज़ का प्रकार तय नहीं किया जा सकता। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर ऑटोएंटीबॉडी और सी-पेप्टाइड जैसी जांचों की मदद ले सकते हैं।
टाइप-2 डायबिटीज़ में क्या होता है?
टाइप-2 डायबिटीज़ में अक्सर शुरुआती समस्या इंसुलिन प्रतिरोध होती है। इसका मतलब है कि शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति पहले की तरह प्रतिक्रिया नहीं करतीं।
शुरुआत में अग्न्याशय ज्यादा इंसुलिन बनाकर इसकी भरपाई करने की कोशिश करता है। लेकिन समय के साथ बीटा कोशिकाओं की क्षमता कम हो सकती है और शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। परिणामस्वरूप रक्त में शुगर बढ़ने लगती है।
टाइप-2 डायबिटीज़ के जोखिम में उम्र, आनुवंशिक कारण, शारीरिक गतिविधि की कमी, शरीर में अतिरिक्त वसा और खासतौर पर पेट के आसपास जमा फैट जैसे कई कारक भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि केवल अधिक वजन वाले लोगों को ही डायबिटीज़ होती है। दक्षिण एशियाई लोगों में अपेक्षाकृत कम वजन होने पर भी टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा हो सकता है।
क्या टाइप-2 डायबिटीज़ वास्तव में खत्म हो सकती है?
यहीं सबसे ज्यादा भ्रम देखने को मिलता है।
टाइप-2 डायबिटीज़ के संदर्भ में चिकित्सा विज्ञान अक्सर "रिमिशन" शब्द का इस्तेमाल करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बीमारी हमेशा के लिए खत्म हो गई।
कुछ लोगों में वजन कम करने, खानपान में बदलाव, शारीरिक गतिविधि बढ़ाने और चिकित्सकीय उपचार के बाद ब्लड शुगर इतना सुधर सकता है कि शुगर कम करने वाली दवाओं के बिना भी लंबे समय तक डायबिटीज़ की सीमा से नीचे बनी रहे।
ऐसी स्थिति को रिमिशन कहा जा सकता है।
लेकिन भविष्य में ब्लड शुगर दोबारा बढ़ सकती है। इसलिए रिमिशन को स्थायी इलाज मान लेना सही नहीं होगा।
वजन कम करने से कुछ लोगों को क्यों फायदा होता है?
कुछ टाइप-2 डायबिटीज़ मरीजों में लिवर और अग्न्याशय के आसपास जमा अतिरिक्त वसा शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती है।
जब ऐसे व्यक्ति पर्याप्त वजन कम करते हैं और उस वजन को लंबे समय तक बनाए रखते हैं, तो शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार हो सकता है। कुछ मामलों में अग्न्याशय की कार्यक्षमता में भी सुधार देखा जा सकता है।
इसी वजह से कुछ लोगों में ब्लड शुगर काफी कम हो जाती है और दवाओं के बिना भी रिमिशन संभव हो सकता है।
लेकिन इसका फायदा हर व्यक्ति को एक जैसा नहीं मिलता। डायबिटीज़ कितने समय से है, शरीर अभी कितना इंसुलिन बना रहा है और वजन कितना कम हुआ है—इन सभी बातों का असर पड़ सकता है।
क्या रिसर्च में डायबिटीज़ रिमिशन के प्रमाण मिले हैं?
ब्रिटेन में किया गया DiRECT अध्ययन टाइप-2 डायबिटीज़ और वजन घटाने के संबंध में महत्वपूर्ण शोधों में शामिल है।
इसमें चुनिंदा मरीजों को विशेषज्ञों की निगरानी में वजन कम करने का व्यवस्थित कार्यक्रम दिया गया। इसमें सीमित अवधि के लिए कम ऊर्जा वाला विशेष आहार, फिर धीरे-धीरे सामान्य भोजन की ओर वापसी और वजन बनाए रखने की रणनीति शामिल थी।
अध्ययन के दो साल बाद कार्यक्रम में शामिल लगभग 36 प्रतिशत प्रतिभागी रिमिशन में थे। जिन लोगों ने 10 किलोग्राम से ज्यादा वजन घटाया और उसे बनाए रखा, उनमें रिमिशन की संभावना काफी अधिक थी।
लेकिन बाद के वर्षों में यह भी सामने आया कि कुछ लोगों का वजन दोबारा बढ़ा और रिमिशन समाप्त हो गया।
यानी संदेश साफ है—कुछ मरीजों में टाइप-2 डायबिटीज़ का रिमिशन संभव है, लेकिन इसे हमेशा के लिए बीमारी खत्म हो जाना नहीं कहा जा सकता।
क्या मेथी से डायबिटीज़ जड़ से खत्म हो सकती है?
मेथी का इस्तेमाल भारतीय खानपान में लंबे समय से होता रहा है। इसके बीजों में फाइबर और कुछ जैविक सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। कुछ छोटे अध्ययनों में ब्लड शुगर पर संभावित सकारात्मक प्रभाव के संकेत मिले हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेथी डायबिटीज़ की प्रमाणित दवा है।
अलग-अलग अध्ययनों में मेथी की मात्रा, इस्तेमाल का तरीका और मरीजों की स्थिति अलग रही है। इसलिए यह दावा करना कि रोजाना एक निश्चित मात्रा में मेथी खाने से हर व्यक्ति की डायबिटीज़ खत्म हो जाएगी, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
जो मरीज पहले से शुगर कम करने वाली दवाएं ले रहे हैं, उन्हें बड़ी मात्रा में किसी भी ऐसे सप्लीमेंट का इस्तेमाल डॉक्टर से पूछे बिना नहीं करना चाहिए जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकता हो।
करेला और जामुन के बारे में क्या कहता है विज्ञान?
करेले और जामुन से जुड़े कई पारंपरिक दावे प्रचलित हैं। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में इनके संभावित प्रभावों की जांच भी की गई है।
करेले में मौजूद कुछ पदार्थ ग्लूकोज़ मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन अभी ऐसा भरोसेमंद प्रमाण नहीं है कि करेले का जूस टाइप-1 या टाइप-2 डायबिटीज़ को स्थायी रूप से खत्म कर देता है।
इसी तरह जामुन का फल खाना और जामुन की गुठली से बने पाउडर या कैप्सूल को डायबिटीज़ की प्रमाणित दवा मान लेना दो अलग बातें हैं।
टाइप-1 डायबिटीज़ में इंसुलिन की जगह किसी हर्बल उत्पाद का इस्तेमाल करना विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है।
दालचीनी क्या सच में शुगर घटाती है?
दालचीनी पर भी कई अध्ययन किए गए हैं। कुछ शोधों में ब्लड शुगर या इंसुलिन प्रतिरोध से जुड़े कुछ संकेत मिले हैं, लेकिन सभी अध्ययनों के परिणाम एक जैसे नहीं रहे हैं।
इसलिए दालचीनी को डायबिटीज़ की दवा मान लेना उचित नहीं है।
खाने में मसाले के रूप में दालचीनी का इस्तेमाल और बड़ी मात्रा में दालचीनी के अर्क या सप्लीमेंट लेना भी एक जैसा नहीं है। खासकर कैसिया दालचीनी में कूमारिन पाया जा सकता है, जिसकी अधिक मात्रा कुछ लोगों में लिवर के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
"प्राकृतिक" होने का मतलब हमेशा सुरक्षित नहीं होता
डायबिटीज़ के मरीजों में यह धारणा काफी आम है कि आयुर्वेदिक या हर्बल उत्पाद प्राकृतिक हैं, इसलिए उनसे कोई नुकसान नहीं हो सकता।
लेकिन यह सोच सही नहीं है।
पौधों में भी सक्रिय रसायन मौजूद होते हैं, जो शरीर पर प्रभाव डाल सकते हैं। किसी हर्बल उत्पाद की मात्रा, गुणवत्ता, निर्माण प्रक्रिया और दूसरी दवाओं के साथ उसकी प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होती है।
कुछ उत्पादों में सक्रिय पदार्थों की मात्रा भी निश्चित नहीं हो सकती।
इसलिए किसी भी आयुर्वेदिक या हर्बल उत्पाद को शुरू करने से पहले डॉक्टर से चर्चा करना बेहतर है, खासकर तब जब मरीज पहले से डायबिटीज़ की दवा या इंसुलिन ले रहा हो।
क्या इंसुलिन शुरू होने का मतलब बीमारी अंतिम अवस्था में है?
बिल्कुल नहीं।
टाइप-1 डायबिटीज़ में इंसुलिन बीमारी की शुरुआत से ही जरूरी हो सकता है। यह अंतिम अवस्था का संकेत नहीं बल्कि शरीर में जरूरी हार्मोन की कमी को पूरा करने वाला जीवनरक्षक उपचार है।
टाइप-2 डायबिटीज़ में भी कुछ मरीजों को इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है। ब्लड शुगर बहुत अधिक होने, किसी गंभीर बीमारी के दौरान या अन्य दवाओं से पर्याप्त नियंत्रण न मिलने पर डॉक्टर इंसुलिन शुरू कर सकते हैं।
कुछ लोगों में यह अस्थायी हो सकता है, जबकि कुछ को लंबे समय तक इसकी जरूरत पड़ सकती है।
इसलिए इंसुलिन लेना किसी मरीज की असफलता नहीं है।
शुगर सामान्य हो जाए तो क्या दवा बंद कर देनी चाहिए?
यह सबसे खतरनाक गलतफहमियों में से एक हो सकती है।
अगर किसी व्यक्ति की शुगर दवा लेने के कारण सामान्य है, तो इसका मतलब यह नहीं कि बीमारी खत्म हो गई। इसी तरह किसी व्यक्ति में टाइप-2 डायबिटीज़ का रिमिशन होने पर भी दवा बंद करने का फैसला डॉक्टर की निगरानी में होना चाहिए।
कुछ दवाएं केवल ब्लड शुगर कम करने के लिए नहीं, बल्कि हृदय और गुर्दों से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए भी दी जा सकती हैं।
टाइप-1 डायबिटीज़ में डॉक्टर की सलाह के बिना इंसुलिन बंद करना विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है और डायबिटिक कीटोएसिडोसिस जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।
डायबिटीज़ की पहचान कैसे होती है?
डायबिटीज़ की जांच के लिए एचबीए1सी, खाली पेट ब्लड ग्लूकोज़, ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट और कुछ परिस्थितियों में रैंडम ब्लड ग्लूकोज़ का इस्तेमाल किया जाता है।
आम तौर पर गैर-गर्भवती वयस्कों में डायबिटीज़ के निदान से जुड़े प्रमुख मानदंडों में शामिल हैं:
एचबीए1सी 6.5 प्रतिशत या उससे अधिक
खाली पेट प्लाज्मा ग्लूकोज़ 126 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक
ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट के दो घंटे बाद 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक
डायबिटीज़ के स्पष्ट लक्षणों के साथ रैंडम प्लाज्मा ग्लूकोज़ 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक
यदि स्पष्ट लक्षण मौजूद नहीं हैं, तो निदान की पुष्टि के लिए दो असामान्य परीक्षण परिणामों की जरूरत पड़ सकती है।
गर्भावस्था और कुछ विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों में मानदंड अलग हो सकते हैं।
डायबिटीज़ के मरीजों को सबसे ज्यादा किस बात से सावधान रहना चाहिए?
सबसे बड़ा खतरा केवल बढ़ी हुई शुगर नहीं है। उससे भी खतरनाक स्थिति तब बन सकती है जब मरीज किसी चमत्कारी इलाज के दावे पर भरोसा करके प्रमाणित उपचार बंद कर दे।
अगर कोई विज्ञापन यह दावा करता है कि कोई उत्पाद 15 या 30 दिनों में डायबिटीज़ को जड़ से खत्म कर देगा, इंसुलिन हमेशा के लिए बंद करा देगा या बिना किसी नियमित जांच के बीमारी समाप्त कर देगा, तो ऐसे दावों को बेहद सावधानी से देखना चाहिए।
किसी व्यक्ति की पहले और बाद की दो रिपोर्ट, सोशल मीडिया वीडियो या किसी मरीज का अनुभव किसी उपचार को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं करता।
आखिर डायबिटीज़ के बारे में सबसे बड़ा सच क्या है?
डायबिटीज़ एक ही तरह की बीमारी नहीं है। टाइप-1 और टाइप-2 के पीछे शरीर में होने वाली प्रक्रियाएं अलग हैं और उनका उपचार भी अलग हो सकता है।
टाइप-1 में इंसुलिन जीवनरक्षक उपचार है और वर्तमान में स्थापित टाइप-1 डायबिटीज़ को घरेलू नुस्खों, डाइट या व्यायाम से स्थायी रूप से खत्म करने का प्रमाणित तरीका उपलब्ध नहीं है।
टाइप-2 में कुछ लोगों में पर्याप्त और टिकाऊ वजन घटाने तथा जीवनशैली में बदलाव से रिमिशन संभव हो सकता है। लेकिन रिमिशन का अर्थ हमेशा के लिए बीमारी खत्म हो जाना नहीं है। भविष्य में शुगर दोबारा बढ़ सकती है।
मेथी, करेला, जामुन, गुड़मार या दालचीनी जैसे खाद्य पदार्थों और पौधों पर शोध जारी है, लेकिन इन्हें प्रमाणित चिकित्सा उपचार का विकल्प मानना उचित नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डायबिटीज़ की सही पहचान हो, समय-समय पर जांच होती रहे, डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार लिया जाए और खानपान तथा शारीरिक गतिविधि में ऐसे बदलाव किए जाएं जिन्हें लंबे समय तक जारी रखा जा सके।
डायबिटीज़ को समझना ही उसके बेहतर प्रबंधन की पहली सीढ़ी है।
यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। यह किसी व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह, निदान या दवा बंद करने का निर्देश नहीं है। दवा या इंसुलिन में कोई बदलाव डॉक्टर की सलाह से ही करें।

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