कैंसर से मौत के बाद भी नहीं मिला घर का दरवाजा! 31 साल की पूजा की आखिरी विदाई अस्पताल में क्यों हुई? वजह जानकर दंग रह जाएंगे
मध्य प्रदेश के गुना से सामने आई एक घटना ने इंसानियत, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां 31 वर्षीय पूजा रजक की कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बाद मौत हो गई। जिंदगी के आखिरी दौर तक बीमारी से संघर्ष करने वाली पूजा के परिवार को उम्मीद थी कि कम से कम उनकी बेटी की अंतिम विदाई सम्मान और अपनेपन के साथ होगी, लेकिन मौत के बाद परिवार के सामने ऐसी परिस्थिति आ गई, जिसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।
बताया जा रहा है कि पूजा मूल रूप से बदरवास की रहने वाली थीं और पिछले करीब चार वर्षों से अपने माता-पिता के साथ गुना के घोसीपुरा इलाके में किराए के मकान में रह रही थीं। परिवार इसी मकान को अपना आशियाना मानकर जीवन गुजार रहा था। लेकिन पूजा की मौत के बाद जब परिजन उनकी पार्थिव देह को किराए के घर पर ले जाने की कोशिश करने लगे, तो कथित तौर पर मकान मालिक ने शव को घर के अंदर लाने की अनुमति नहीं दी।
परिजनों के अनुसार, मकान मालिक ने कहा कि घर में धार्मिक कार्यक्रम चल रहा है और नवरात्रि के कारण शव को मकान के भीतर नहीं लाया जा सकता। इसके बाद परिवार के सामने ऐसा संकट खड़ा हो गया कि मृतका की अंतिम रस्में आखिर कहां की जाएं।
चार साल जिस घर में गुजरे, वहीं अंतिम विदाई के लिए नहीं मिली जगह
पूजा पिछले चार वर्षों से अपने माता-पिता के साथ इसी किराए के मकान में रह रही थीं। बीमारी के दौरान भी परिवार ने इसी घर में उनकी देखभाल की। लेकिन जब पूजा ने अंतिम सांस ली तो उसी घर में उनकी पार्थिव देह को कुछ समय के लिए भी रखने की अनुमति नहीं मिल सकी।
किसी परिवार के लिए अपने किसी प्रियजन की मौत का समय पहले ही बेहद दुखद होता है। ऐसे समय में परिवार भावनात्मक रूप से टूट चुका होता है और उसे केवल अपने प्रियजन को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देने की चिंता होती है। लेकिन पूजा के परिवार को इसी दौरान रहने की जगह और अंतिम रस्मों के लिए स्थान की समस्या का सामना करना पड़ा।
परिवार के सामने कोई आसान विकल्प नहीं था। एक तरफ बेटी की मौत का गम था और दूसरी तरफ अंतिम संस्कार से पहले की परंपरागत रस्मों को पूरा करने की मजबूरी।
जिला अस्पताल परिसर में पूरी करनी पड़ीं अंतिम रस्में
घर में जगह नहीं मिलने के बाद पूजा के परिजनों ने जिला अस्पताल परिसर में ही उनकी अंतिम रस्में पूरी करने का फैसला किया। अस्पताल परिसर में ही मृतका का पारंपरिक रूप से श्रृंगार किया गया।
हिंदू समाज की कई परंपराओं में विवाहित महिला की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार से पहले विशेष श्रृंगार और कुछ पारंपरिक रस्में पूरी की जाती हैं। परिवार भी चाहता था कि पूजा को उसी सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाए।
लेकिन घर का दरवाजा बंद होने के कारण यह सब किराए के मकान में नहीं हो सका। आखिरकार अस्पताल परिसर ही वह स्थान बना, जहां परिवार ने अपनी बेटी को अंतिम बार दुल्हन और सुहागन के रूप में सजाया।
परिजनों के लिए यह क्षण बेहद भावुक था। एक तरफ सामने बेटी की पार्थिव देह थी और दूसरी तरफ उसे अंतिम बार सजाने की जिम्मेदारी। परिवार के लोगों की आंखों में आंसू थे और आसपास मौजूद लोगों के लिए भी यह दृश्य बेहद पीड़ादायक बताया गया।
रस्में पूरी होने के बाद पूजा की पार्थिव देह को सीधे मुक्तिधाम ले जाया गया, जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।
पूजा की जिंदगी पहले से ही संघर्षों से भरी थी
पूजा की कहानी केवल बीमारी और मौत तक सीमित नहीं थी। उनकी निजी जिंदगी भी लंबे संघर्ष से गुजरी थी।
बताया गया है कि पूजा की शादी इंदौर निवासी राकेश लश्करी से हुई थी। परिवार के अनुसार, जब पूजा को कैंसर की गंभीर बीमारी ने घेरा तो वैवाहिक जीवन में भी परिस्थितियां खराब हो गईं। परिजनों ने आरोप लगाया कि बीमारी के दौरान पूजा को प्रताड़ित किया गया और उन्हें घर से बाहर कर दिया गया।
इस मामले को लेकर परिजनों की ओर से पुलिस में शिकायत किए जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि इस मामले से जुड़े सभी आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही हो सकती है।
पूजा की मौत की सूचना मिलने के बाद इंदौर से उनके पति और उनकी दूसरी पत्नी के मौके पर पहुंचने की बात भी सामने आई है। इसके बाद अस्पताल परिसर में पूजा की अंतिम रस्में पूरी की गईं।
तीन बच्चों के सिर से उठा मां का साया
पूजा अपने पीछे दो बेटियां और एक बेटा छोड़ गई हैं। मां की मौत के बाद बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है।
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही मां को अपनी आंखों के सामने संघर्ष करते देखना और फिर हमेशा के लिए खो देना किसी भी बच्चे के लिए बेहद कठिन अनुभव होता है। पूजा के बच्चों के लिए यह दुख उस समय और गहरा हो गया, जब मां की अंतिम विदाई से पहले परिवार को जगह के लिए भी संघर्ष करना पड़ा।
परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं बताई जा रही है। बीमारी के इलाज और लंबे समय तक चले संघर्ष ने पहले ही परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ा दिया था। ऐसे में अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना भी उनके लिए आसान नहीं था।
मुश्किल समय में समाजसेवी आगे आए
जब परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से बेहद कठिन स्थिति में था, तब कुछ लोगों ने आगे बढ़कर मदद की। जाने-माने समाजसेवी प्रमोद भार्गव और गौ सेवक राम सिंह रजक ने परिवार की सहायता की।
बताया गया है कि दोनों ने परिवार को ढांढस बंधाया और अंतिम संस्कार से जुड़ी व्यवस्थाओं में मदद की। ऐसे समय में किसी जरूरतमंद परिवार के साथ खड़ा होना उनके लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है।
पूजा के परिवार के पास जहां एक ओर अपनी बेटी और मां को खोने का दुख था, वहीं आर्थिक तंगी ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी थी। ऐसे में समाज के लोगों की मदद से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी हो सकी।
घटना ने खड़े किए संवेदनशीलता पर सवाल
इस पूरे मामले ने समाज के सामने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत मान्यताओं का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन किसी परिवार के दुख की घड़ी में मानवीय संवेदना का महत्व भी उतना ही बड़ा है।
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके परिजनों के लिए अंतिम विदाई का क्षण बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसी स्थिति में यदि परिवार को अपनी ही रहने की जगह पर पार्थिव देह रखने के लिए स्थान न मिले, तो यह उनके दुख को और बढ़ा देता है।
हालांकि घटना से जुड़े सभी पक्षों की पूरी स्थिति सामने आना जरूरी है। मकान मालिक का पक्ष और इस निर्णय के पीछे की परिस्थितियां भी स्पष्ट होना चाहिए, ताकि मामले को एकतरफा तरीके से नहीं देखा जाए।
पूजा की आखिरी विदाई बनी बड़ा सवाल
पूजा ने 31 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद उनकी जिंदगी खत्म हुई, लेकिन मौत के बाद सामने आई परिस्थितियों ने उनके परिवार के दर्द को और गहरा कर दिया।
जिस घर में उन्होंने अपने माता-पिता के साथ चार साल बिताए, वहां उनकी पार्थिव देह को अंतिम रस्मों के लिए जगह नहीं मिल सकी। अंततः जिला अस्पताल परिसर में उनका श्रृंगार किया गया और वहीं से उन्हें अंतिम यात्रा के लिए रवाना किया गया।
पूजा की कहानी केवल एक महिला की मौत की कहानी नहीं है। यह बीमारी, आर्थिक तंगी, पारिवारिक संघर्ष, सामाजिक संवेदनशीलता और अंतिम समय में इंसान के साथ खड़े होने की जरूरत का सवाल भी है।
आज पूजा इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन पीछे छूट गए उनके तीन बच्चे और उनका परिवार इस घटना की पीड़ा लंबे समय तक महसूस करेगा। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा संदेश यही है कि मुश्किल वक्त में इंसान की मदद करना ही सबसे बड़ी इंसानियत है।
इस रिपोर्ट में पारिवारिक आरोपों और घटना से संबंधित दावों को उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। संबंधित आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अलग विषय है।

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