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सुबह आंख खुलते ही ये नंबर दिखे तो हो जाएं सावधान! कहीं शरीर में चुपचाप बढ़ तो नहीं रही शुगर, जानिए कितना होना चाहिए लेवल



डायबिटीज आज दुनिया की बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतों, शारीरिक गतिविधि की कमी और बढ़ते वजन के कारण टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है। भारत में भी बड़ी संख्या में लोग ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने के लिए दवाओं, खान-पान में बदलाव और नियमित व्यायाम का सहारा लेते हैं।

डायबिटीज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार शुरुआती दौर में इसके लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं होते। ऐसे में नियमित ब्लड शुगर की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। खासकर जिन लोगों को पहले से डायबिटीज है, उनके लिए यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग समय पर ब्लड शुगर का स्तर किस सीमा में होना चाहिए।

अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि सुबह खाली पेट ब्लड शुगर कितना होना चाहिए? खाने के दो घंटे बाद कितना शुगर सामान्य माना जाता है? और किस स्तर पर डायबिटीज या प्री-डायबिटीज की आशंका होती है?

इन आंकड़ों को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि डायबिटीज की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले टेस्ट और पहले से डायबिटीज वाले व्यक्ति के रोजाना शुगर टारगेट अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक रिपोर्ट के आधार पर खुद से बीमारी का फैसला नहीं करना चाहिए।

आखिर डायबिटीज क्यों होती है?

डायबिटीज ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में ब्लड ग्लूकोज यानी रक्त में मौजूद शुगर का स्तर सामान्य से ज्यादा हो जाता है। भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट शरीर में ग्लूकोज में बदलते हैं। इस ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने और ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करने में इंसुलिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

टाइप-2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता और समय के साथ शरीर में इंसुलिन की कमी भी हो सकती है। इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस से भी जोड़ा जाता है।

मोटापा, पेट के आसपास ज्यादा चर्बी, शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खान-पान और परिवार में डायबिटीज का इतिहास जैसे कई कारक टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

लंबे समय तक ब्लड शुगर नियंत्रित न रहने पर आंखों, किडनी, नसों और हृदय समेत शरीर के कई अंगों पर असर पड़ सकता है। इसलिए समय पर पहचान और उचित नियंत्रण महत्वपूर्ण है।

सुबह खाली पेट कितना होना चाहिए ब्लड शुगर?

खाली पेट ब्लड ग्लूकोज की जांच डायबिटीज की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण जांचों में से एक है। फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट के लिए आमतौर पर कम से कम 8 घंटे तक खाना नहीं खाया जाता। इस दौरान पानी पीना सामान्यतः अनुमति योग्य होता है।

डायबिटीज की जांच के लिए सामान्यतः ये सीमाएं देखी जाती हैं:

  • 100 mg/dL से कम: सामान्य

  • 100 से 125 mg/dL: प्री-डायबिटीज की श्रेणी

  • 126 mg/dL या उससे ज्यादा: डायबिटीज की ओर संकेत

हालांकि एक बार की रिपोर्ट से डायबिटीज का अंतिम निदान नहीं किया जाता। डॉक्टर जरूरत के अनुसार दोबारा जांच या HbA1c जैसे दूसरे टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।

इसलिए अगर किसी व्यक्ति की सुबह खाली पेट शुगर 126 mg/dL या उससे अधिक आती है, तो घबराने की बजाय चिकित्सक से सलाह लेकर उचित जांच कराना चाहिए।

खाने के दो घंटे बाद कितना शुगर होना चाहिए?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। डायबिटीज की पहचान के लिए 2 घंटे वाला OGTT टेस्ट और घर पर सामान्य भोजन के दो घंटे बाद की जाने वाली शुगर जांच एक ही चीज नहीं हैं।

OGTT यानी Oral Glucose Tolerance Test में व्यक्ति को निर्धारित मात्रा में ग्लूकोज वाला पेय दिया जाता है और दो घंटे बाद ब्लड ग्लूकोज की जांच की जाती है। इस टेस्ट से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि शरीर ग्लूकोज को किस तरह प्रोसेस कर रहा है।

OGTT के दो घंटे बाद के परिणामों में सामान्यतः:

  • 140 mg/dL से कम: सामान्य

  • 140 से 199 mg/dL: प्री-डायबिटीज या impaired glucose tolerance

  • 200 mg/dL या उससे ज्यादा: डायबिटीज की ओर संकेत

लेकिन अगर कोई व्यक्ति घर पर सामान्य भोजन करने के दो घंटे बाद ग्लूकोमीटर से शुगर जांच रहा है, तो इन OGTT कटऑफ को सीधे उस रीडिंग पर लागू नहीं करना चाहिए।

पहले से डायबिटीज वाले मरीजों के लिए क्या टारगेट होता है?

जिस व्यक्ति को पहले से डायबिटीज है, उसके लिए शुगर का लक्ष्य बीमारी की जांच वाले कटऑफ से अलग हो सकता है।

कई गैर-गर्भवती वयस्कों में उपचार के दौरान सामान्य लक्ष्य भोजन से पहले लगभग 80 से 130 mg/dL और भोजन शुरू होने के करीब 1 से 2 घंटे बाद 180 mg/dL से कम रखा जाता है। लेकिन यह लक्ष्य हर व्यक्ति के लिए बिल्कुल एक जैसा नहीं होता।

उम्र, डायबिटीज कितने समय से है, दवाएं, दूसरी बीमारियां, हाइपोग्लाइसीमिया का जोखिम और व्यक्ति की समग्र स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर डॉक्टर अलग लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं।

इसलिए डायबिटीज के मरीज को अपनी रिपोर्ट की तुलना किसी दूसरे व्यक्ति की रिपोर्ट से नहीं करनी चाहिए।

सिर्फ शुगर की एक रिपोर्ट से बीमारी तय न करें

कई बार लोग घर पर ग्लूकोमीटर से शुगर जांचने के बाद खुद ही यह तय कर लेते हैं कि उन्हें डायबिटीज है या नहीं। ऐसा करना सही नहीं है।

ग्लूकोमीटर की रीडिंग पर भोजन, व्यायाम, तनाव, बीमारी, दवाएं और जांच के समय जैसी कई चीजों का प्रभाव पड़ सकता है। वहीं डायबिटीज के निदान के लिए डॉक्टर लैब टेस्ट और व्यक्ति की पूरी स्थिति को ध्यान में रखते हैं।

अगर किसी व्यक्ति की शुगर बार-बार सामान्य से ज्यादा आ रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

HbA1c टेस्ट भी है बेहद महत्वपूर्ण

डायबिटीज की जांच और निगरानी में HbA1c टेस्ट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पिछले लगभग दो से तीन महीनों में ब्लड शुगर के औसत स्तर के बारे में जानकारी देता है।

इसका फायदा यह है कि इसके लिए व्यक्ति को रोजाना की तरह खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर इसे डायबिटीज की पहचान और इलाज के दौरान शुगर नियंत्रण का आकलन करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

अगर किसी व्यक्ति को बार-बार शुगर बढ़ी हुई मिल रही है, तो डॉक्टर फास्टिंग ग्लूकोज, HbA1c या अन्य जरूरी जांचों का सुझाव दे सकते हैं।

किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए?

जिन लोगों का वजन ज्यादा है, पेट के आसपास चर्बी अधिक है, शारीरिक गतिविधि बहुत कम है या परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, उन्हें अपने ब्लड शुगर को लेकर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स और पहले प्री-डायबिटीज की रिपोर्ट आ चुकी हो तो भी नियमित स्वास्थ्य जांच उपयोगी हो सकती है।

महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान शुगर की जांच और लक्ष्य अलग हो सकते हैं, इसलिए गर्भवती महिलाओं को सामान्य वयस्कों के आंकड़ों से अपनी रिपोर्ट की तुलना नहीं करनी चाहिए।

शुगर कंट्रोल रखने के लिए क्या करें?

ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में केवल दवा ही नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली की भूमिका होती है। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं का सही समय पर सेवन महत्वपूर्ण है।

मीठे पेय, अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन और जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेने से बचना मददगार हो सकता है। अगर वजन ज्यादा है तो डॉक्टर या डाइट विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार धीरे-धीरे वजन कम करना भी फायदेमंद हो सकता है।

डायबिटीज की दवा खुद से बंद करना या उसकी मात्रा बदलना बिल्कुल सही नहीं है। शुगर कम या ज्यादा होने पर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

कब तुरंत सावधानी बरतनी चाहिए?

अगर शुगर बहुत ज्यादा आ रही है और साथ में अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब आना, कमजोरी, उल्टी, पेट दर्द, सांस लेने में परेशानी, भ्रम या अत्यधिक उनींदापन जैसे गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी हो सकता है।

वहीं बहुत कम ब्लड शुगर में कंपकंपी, पसीना, भूख, चक्कर, कमजोरी, धड़कन तेज होना या भ्रम जैसे लक्षण हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में भी तत्काल उचित कदम और चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।

याद रखें ये जरूरी आंकड़े

डायबिटीज की जांच के लिए फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज 100 mg/dL से कम सामान्य, 100-125 mg/dL प्री-डायबिटीज और 126 mg/dL या उससे ज्यादा डायबिटीज की ओर संकेत करता है। वहीं OGTT में दो घंटे बाद 140 mg/dL से कम सामान्य, 140-199 mg/dL प्री-डायबिटीज और 200 mg/dL या उससे ज्यादा डायबिटीज की ओर संकेत करता है।

लेकिन इन आंकड़ों को अपनी व्यक्तिगत रिपोर्ट पर लागू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। खासकर पहले से डायबिटीज वाले मरीजों के लिए रोजाना के शुगर लक्ष्य अलग हो सकते हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि एक अकेली शुगर रिपोर्ट देखकर घबराने या खुद से दवा शुरू करने की बजाय डॉक्टर से सही जांच और सलाह लें। समय पर पहचान, नियमित निगरानी और स्वस्थ जीवनशैली डायबिटीज को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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