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Video: मोबाइल ने मासूम बच्चे को कैसे बदला? गोरखपुर की इस घटना ने उड़ाए होश, फोन में ऐसा क्या मिला कि स्कूल तक को लेना पड़ा बड़ा फैसला



गोरखपुर शहर से बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल और इंटरनेट पर उनकी पहुंच को लेकर चिंता बढ़ाने वाला मामला सामने आया है। एक निजी स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ने वाले छात्र के व्यवहार को लेकर परिवार और स्कूल प्रबंधन उस समय हैरान रह गया, जब उसके व्यवहार में लगातार गंभीर बदलाव दिखाई देने लगे। परिवार का कहना है कि ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल मिलने के बाद धीरे-धीरे बच्चे की फोन पर निर्भरता बढ़ती गई और बाद में उसके व्यवहार में भी असामान्य परिवर्तन नजर आने लगे।

मामला सामने आने के बाद स्कूल प्रबंधन ने परिवार को बच्चे की विशेषज्ञ से जांच और उपचार कराने की सलाह दी। परिवार के अनुसार, बच्चे को मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया गया, जहां उसके व्यवहार से संबंधित समस्या बताई गई और फिलहाल उसका इलाज चल रहा है। हालांकि, किसी बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी निदान की पुष्टि केवल विशेषज्ञ की विस्तृत जांच के आधार पर ही की जा सकती है।

यह घटना केवल एक परिवार या एक स्कूल की चिंता नहीं है। इससे बच्चों को स्मार्टफोन देने, इंटरनेट पर उनकी गतिविधियों की निगरानी करने और उन्हें ऑनलाइन उपलब्ध अनुचित सामग्री से बचाने को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

ऑनलाइन क्लास के लिए मिला था मोबाइल

परिवार के मुताबिक, कोरोना काल के बाद से ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल माध्यम बच्चों की शिक्षा का हिस्सा बन गए हैं। इसी जरूरत के चलते बच्चे को पढ़ाई के लिए मोबाइल फोन उपलब्ध कराया गया था। शुरुआत में उसका इस्तेमाल ऑनलाइन क्लास और पढ़ाई से संबंधित गतिविधियों के लिए होता था।

परिवार का कहना है कि पढ़ाई के बीच बच्चा कभी-कभी मोबाइल पर गेम भी खेलता था। शुरुआत में इसे सामान्य आदत माना गया, लेकिन कुछ समय बाद फोन के इस्तेमाल को लेकर उसकी मांग बढ़ने लगी।

बताया गया कि लगभग छह महीने के दौरान बच्चे में मोबाइल के प्रति अत्यधिक आकर्षण दिखाई देने लगा। फोन नहीं मिलने पर वह परेशान होने लगा और कई बार रोने या गुस्सा करने जैसी प्रतिक्रिया देने लगा। परिवार ने इसे पहले सामान्य जिद समझा, लेकिन धीरे-धीरे बच्चे के व्यवहार में दूसरे बदलाव भी दिखाई देने लगे।

मोबाइल छिपाकर इस्तेमाल करने लगा बच्चा

परिवार के अनुसार, बाद में बच्चे ने मोबाइल का इस्तेमाल छिपकर करना शुरू कर दिया। वह फोन लेकर अकेले रहने की कोशिश करता और लंबे समय तक उसका इस्तेमाल करता था। कई बार वह बाथरूम में भी मोबाइल ले जाता था।

जब परिवार के लोग उसे मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से रोकते या फोन वापस लेने की कोशिश करते तो वह चिढ़चिढ़ाने और गुस्सा करने लगता था।

विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे का स्क्रीन टाइम अचानक बढ़ना, फोन न मिलने पर अत्यधिक गुस्सा या बेचैनी, पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों से दूरी बनाना तथा मोबाइल को छिपाकर इस्तेमाल करना ऐसे व्यवहार हैं जिन पर माता-पिता को ध्यान देना चाहिए। हालांकि इन संकेतों को अकेले किसी मानसिक बीमारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

परिवार को तब हुई गंभीर चिंता

मामला उस समय गंभीर हो गया जब परिवार ने बच्चे और उसकी सात वर्षीय बहन से जुड़ी एक आपत्तिजनक स्थिति देखी। परिवार के मुताबिक, बाद में बच्चे के मोबाइल की जांच की गई तो उसमें वयस्कों के लिए बनाई गई अनुचित सामग्री देखी गई।

इस घटना के बाद परिवार को पहली बार गंभीरता से यह समझ आया कि बच्चा इंटरनेट पर किस तरह की सामग्री तक पहुंच बना रहा था। परिवार ने उसे समझाने की कोशिश की और ऐसी सामग्री के गलत होने के बारे में बताया।

यहां विशेषज्ञों के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि इतने कम उम्र के बच्चे तक ऐसी सामग्री कैसे पहुंची और उसके व्यवहार पर उसका क्या प्रभाव पड़ा। बच्चों की उम्र को देखते हुए ऐसी स्थिति में उन्हें केवल डांटने या शर्मिंदा करने के बजाय विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी हो सकता है।

स्कूल में भी सामने आया चिंताजनक व्यवहार

परिवार के अनुसार, इस घटना से पहले स्कूल में भी बच्चे के व्यवहार को लेकर चिंता सामने आ चुकी थी। करीब दो महीने पहले स्कूल प्रबंधन की ओर से परिवार को बुलाया गया।

परिवार जब स्कूल पहुंचा तो उसे बच्चे के व्यवहार से संबंधित शिकायत के बारे में बताया गया। स्कूल प्रबंधन के मुताबिक, बच्चे ने एक शिक्षिका से संबंधित आपत्तिजनक चित्र बनाए थे।

इसके बाद स्कूल में उसके साथ पढ़ने वाले कुछ बच्चों से भी उसके व्यवहार के बारे में जानकारी ली गई। परिवार का कहना है कि दूसरे बच्चों ने भी उसके द्वारा अनुचित बातें किए जाने की शिकायत की थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए स्कूल प्रबंधन ने परिवार से बच्चे पर विशेष ध्यान देने और विशेषज्ञ से उपचार कराने की सलाह दी। बाद में स्कूल से बच्चे का नाम भी हटा दिया गया।

बच्चे को डांटने के बजाय विशेषज्ञ की मदद जरूरी

ऐसी घटनाओं में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि माता-पिता बच्चे के व्यवहार को देखकर गुस्सा या शर्मिंदगी महसूस कर सकते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक और गंभीर बदलाव दिखाई दे रहे हों, तो केवल सजा देने या डांटने से समस्या का समाधान जरूरी नहीं है।

बच्चे के व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें इंटरनेट पर अनुचित सामग्री तक पहुंच, परिवार या आसपास के वातावरण से प्रभावित होना, भावनात्मक समस्याएं, किसी प्रकार का अनुभव या अन्य व्यवहार संबंधी कारण शामिल हो सकते हैं।

इसलिए किसी बच्चे के बारे में बिना विशेषज्ञ की जांच के मानसिक बीमारी का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है।

परिवार के अनुसार, बच्चे को मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया गया है और फिलहाल उसका इलाज चल रहा है। आगे की स्थिति विशेषज्ञ की निगरानी और परिवार के सहयोग से ही स्पष्ट हो सकती है।

बच्चों के हाथ में मोबाइल देते समय सावधानी जरूरी

आज के समय में बच्चों को पूरी तरह डिजिटल दुनिया से अलग रखना हर परिवार के लिए संभव नहीं है। पढ़ाई, ऑनलाइन क्लास, शैक्षणिक सामग्री और कई जरूरी सेवाओं के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करना पड़ता है।

लेकिन बच्चों को मोबाइल देना और उन्हें बिना निगरानी के इंटरनेट की पूरी दुनिया तक पहुंच दे देना दो अलग बातें हैं।

माता-पिता को यह समझना चाहिए कि बच्चा फोन पर क्या देख रहा है, किन ऐप्स का इस्तेमाल कर रहा है और किन लोगों से ऑनलाइन संपर्क में है। छोटे बच्चों के मामले में विशेष सावधानी जरूरी है।

फोन में पैरेंटल कंट्रोल, सुरक्षित सर्च और उम्र के हिसाब से कंटेंट फिल्टर जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। संवेदनशील ऐप्स और वेबसाइटों को पासवर्ड से सुरक्षित रखना भी मददगार हो सकता है।

केवल स्क्रीन टाइम कम करना पर्याप्त नहीं

मोबाइल की समस्या को केवल इस बात से नहीं जोड़ा जाना चाहिए कि बच्चा दिन में कितने घंटे फोन देखता है। कंटेंट की प्रकृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

एक बच्चा लंबे समय तक शैक्षणिक वीडियो देख रहा है और दूसरा बच्चा उसी अवधि में अनुचित सामग्री देख रहा है, दोनों परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं।

इसीलिए माता-पिता को स्क्रीन टाइम के साथ-साथ कंटेंट, ऐप्स, वेबसाइटों और ऑनलाइन संपर्कों पर भी नजर रखनी चाहिए।

बच्चे को इंटरनेट के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में उसकी उम्र के अनुसार समझाना भी जरूरी है। उसे यह बताया जाना चाहिए कि अगर इंटरनेट पर कोई डरावनी, अनुचित या असहज सामग्री दिखाई देती है तो वह तुरंत माता-पिता या किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति को बताए।

बच्चे के व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज न करें

अगर बच्चा अचानक बहुत ज्यादा गुस्सा करने लगे, मोबाइल छीनने पर असामान्य प्रतिक्रिया दे, फोन छिपाकर इस्तेमाल करे, पढ़ाई और खेलकूद से दूरी बनाने लगे या उसके व्यवहार में अचानक ऐसे बदलाव आएं जिन्हें परिवार समझ नहीं पा रहा हो, तो इसे केवल जिद कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसी स्थिति में बच्चे से शांत तरीके से बात करना जरूरी है। उससे यह पूछने के बजाय कि उसने "ऐसा क्यों किया", माता-पिता यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि वह इंटरनेट पर क्या देख रहा था और उसे किसी तरह की परेशानी तो नहीं है।

जरूरत पड़ने पर बाल मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या दूसरे योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह ली जा सकती है।

बच्चों की सुरक्षा में माता-पिता की भूमिका सबसे अहम

गोरखपुर की यह घटना एक बार फिर यह सवाल सामने लाती है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया से जोड़ते समय परिवारों को कितनी सावधानी बरतनी चाहिए।

मोबाइल और इंटरनेट अपने आप में समस्या नहीं हैं। इनका सुरक्षित और सीमित इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई और जानकारी के लिए उपयोगी हो सकता है। समस्या तब पैदा हो सकती है जब छोटे बच्चों को बिना निगरानी के इंटरनेट की ऐसी सामग्री तक पहुंच मिल जाए, जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं है।

इसलिए माता-पिता को बच्चों को मोबाइल देने के साथ-साथ उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर उम्र के अनुसार निगरानी रखनी चाहिए। फोन में जरूरी सुरक्षा सेटिंग्स सक्रिय करनी चाहिए और बच्चों से खुलकर बातचीत करनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर किसी बच्चे के व्यवहार में गंभीर बदलाव दिखाई देता है तो उसे केवल डांटने, शर्मिंदा करने या सजा देने के बजाय समस्या के कारण को समझने की कोशिश की जाए।

बच्चों का डिजिटल भविष्य सुरक्षित तभी हो सकता है, जब तकनीक के साथ निगरानी, संवाद और सही मार्गदर्शन भी मौजूद हो।

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