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20-30 की उम्र में ही शरीर दे रहा है खतरे की घंटी! शुगर बढ़ने से पहले दिखते हैं ये 7 संकेत, कहीं आप भी तो नहीं?



नई दिल्ली, 16 अगस्त 2026: डायबिटीज को कभी उम्र बढ़ने के साथ होने वाली बीमारी माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। टाइप-2 डायबिटीज के मामले कम उम्र के लोगों में भी सामने आ रहे हैं। खासकर 20 से 30 साल की उम्र के युवाओं में खराब खान-पान, कम शारीरिक गतिविधि, बढ़ता वजन, पेट की चर्बी और लगातार बिगड़ती लाइफस्टाइल चिंता बढ़ा रही है। हालिया भारतीय शोध में 40 वर्ष से कम उम्र में टाइप-2 डायबिटीज की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई गई है और शोधकर्ताओं ने कम उम्र में स्क्रीनिंग पर जोर दिया है।

सबसे बड़ी परेशानी यह है कि प्री-डायबिटीज और शुरुआती टाइप-2 डायबिटीज में कई बार कोई साफ लक्षण दिखाई ही नहीं देते। यानी शरीर के अंदर ब्लड शुगर धीरे-धीरे बढ़ती रह सकती है और व्यक्ति खुद को पूरी तरह स्वस्थ समझता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार प्री-डायबिटीज कई वर्षों तक बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकती है।

ऐसे में कुछ बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि इनमें से कोई भी संकेत अकेले डायबिटीज की पुष्टि नहीं करता, लेकिन अगर कई संकेत एक साथ दिखाई दे रहे हों और व्यक्ति में जोखिम कारक भी मौजूद हों तो ब्लड शुगर की जांच कराने के बारे में डॉक्टर से बात करना समझदारी हो सकती है।

1. बार-बार प्यास लगना

अगर आपको सामान्य दिनों की तुलना में बार-बार और ज्यादा प्यास लगने लगी है तो इसे नजरअंदाज न करें। शरीर में ब्लड ग्लूकोज ज्यादा होने पर किडनी अतिरिक्त ग्लूकोज को पेशाब के जरिए बाहर निकालने की कोशिश करती है। इससे पेशाब की मात्रा बढ़ सकती है और शरीर में पानी की कमी महसूस हो सकती है।

हालांकि ज्यादा प्यास केवल डायबिटीज के कारण नहीं होती। गर्मी, ज्यादा नमक का सेवन, अधिक शारीरिक मेहनत या शरीर में पानी की कमी भी इसकी वजह हो सकती है।

लेकिन अगर प्यास लगातार बढ़ी हुई है और इसके साथ बार-बार पेशाब भी आ रहा है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

2. बार-बार पेशाब आना

डायबिटीज में बार-बार पेशाब आना एक जाना-पहचाना संकेत है। खासकर अगर रात में कई बार उठकर पेशाब करना पड़ने लगे और पहले ऐसा नहीं होता था तो ब्लड शुगर की जांच पर विचार किया जा सकता है।

जब रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ती है तो शरीर उसे पेशाब के रास्ते बाहर निकालने की कोशिश करता है। इससे पेशाब ज्यादा हो सकता है।

लेकिन यहां भी यह जरूरी है कि व्यक्ति खुद से यह निष्कर्ष न निकाले कि उसे डायबिटीज हो गई है। पेशाब की समस्या के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं।

3. बिना ज्यादा काम के थकान

लगातार थकान को आजकल लोग तनाव, नींद की कमी या काम का दबाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अगर पर्याप्त नींद लेने के बावजूद शरीर में लगातार कमजोरी और थकान महसूस हो रही है तो इसकी वजह की जांच जरूरी हो सकती है।

जब शरीर ग्लूकोज का प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता तो ऊर्जा से जुड़ी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

युवाओं में यह संकेत खास तौर पर भ्रम पैदा कर सकता है, क्योंकि पढ़ाई, नौकरी, देर रात तक जागना और स्क्रीन टाइम भी थकान का कारण बन सकते हैं। इसलिए केवल थकान के आधार पर डायबिटीज का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

4. अचानक वजन कम होना

बिना डाइटिंग या एक्सरसाइज बढ़ाए वजन तेजी से कम होना ऐसा बदलाव है जिसे गंभीरता से लेना चाहिए।

टाइप-2 डायबिटीज के अलावा कई दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं में भी बिना वजह वजन कम हो सकता है। इसलिए अगर किसी व्यक्ति का वजन लगातार घट रहा है और इसके पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं है तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

विशेषकर यदि इसके साथ अत्यधिक प्यास, बार-बार पेशाब, कमजोरी या धुंधला दिखाई देना जैसे अन्य बदलाव भी हों तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

5. नजर धुंधली होना

ब्लड शुगर में बदलाव का असर आंखों की दृष्टि पर भी पड़ सकता है। कुछ लोगों को अचानक या समय-समय पर धुंधला दिखाई देने की शिकायत हो सकती है।

हालांकि आंखों की रोशनी में बदलाव के कई कारण हो सकते हैं और इसे सीधे डायबिटीज का संकेत नहीं माना जा सकता। अगर धुंधलापन बार-बार हो रहा है या अचानक नजर में गंभीर बदलाव आया है तो चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

डायबिटीज लंबे समय तक नियंत्रित न रहे तो आंखों सहित शरीर के कई अंगों पर असर पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डायबिटीज से आंखों की रोशनी, किडनी, हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं।

6. घाव भरने में ज्यादा समय लगना

अगर छोटी चोट या कट पहले की तुलना में धीरे-धीरे ठीक हो रहा है तो इसे भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लंबे समय तक बढ़ी हुई ब्लड शुगर शरीर की रक्त वाहिकाओं और नसों पर असर डाल सकती है। इससे संक्रमण और घाव भरने से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।

लेकिन घाव का देर से भरना केवल डायबिटीज की वजह से नहीं होता। पोषण की कमी, संक्रमण और अन्य बीमारियां भी इसके पीछे हो सकती हैं।

7. हाथ-पैर में झनझनाहट

हाथों या पैरों में बार-बार झनझनाहट, सुन्नपन या जलन महसूस होना भी कई कारणों से हो सकता है। लंबे समय से अनियंत्रित डायबिटीज में नसों पर असर पड़ने के कारण ऐसी समस्या विकसित हो सकती है।

युवा व्यक्ति अगर लंबे समय तक कंप्यूटर पर बैठता है, गलत posture में रहता है या किसी नस पर दबाव पड़ता है तो भी झनझनाहट हो सकती है। इसलिए इसे देखकर तुरंत डायबिटीज मान लेना सही नहीं होगा।

अगर समस्या लगातार बनी हुई है तो चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

20-30 साल की उम्र में क्यों बढ़ रहा है खतरा?

युवाओं में टाइप-2 डायबिटीज को लेकर चिंता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि आज की lifestyle में शारीरिक गतिविधि कम और बैठने का समय ज्यादा हो गया है।

लंबे समय तक बैठकर काम करना, बाहर का खाना, मीठे पेय, ज्यादा कैलोरी वाला भोजन, नींद का बिगड़ा हुआ पैटर्न और बढ़ता वजन मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

भारत से जुड़े हालिया शोध में 40 वर्ष से कम उम्र में टाइप-2 डायबिटीज की उच्च मौजूदगी की ओर संकेत मिला है और शोधकर्ताओं ने 25 वर्ष की उम्र तक स्क्रीनिंग पर विचार करने की सलाह दी है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर 20-30 साल के व्यक्ति को डायबिटीज का खतरा है। बल्कि यह संकेत है कि कम उम्र में भी जोखिम कारकों को पहचानना जरूरी होता जा रहा है।

भारत में डायबिटीज का बोझ कितना बड़ा है?

ICMR-INDIAB के राष्ट्रीय अध्ययन में भारत में डायबिटीज की weighted prevalence 11.4% और प्री-डायबिटीज की prevalence 15.3% रिपोर्ट की गई थी। इसी अध्ययन में generalized obesity 28.6% और abdominal obesity 39.5% पाई गई थी।

इन आंकड़ों से यह समझा जा सकता है कि ब्लड शुगर से जुड़ी समस्याओं के साथ मोटापा और पेट की अतिरिक्त चर्बी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण चिंता हैं।

प्री-डायबिटीज का मतलब क्या है?

प्री-डायबिटीज का मतलब है कि ब्लड शुगर सामान्य से ज्यादा है, लेकिन डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंची है। इसे शरीर की तरफ से एक तरह की चेतावनी माना जा सकता है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि प्री-डायबिटीज अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रह सकती है। इसी वजह से केवल शरीर में संकेतों का इंतजार करना सही तरीका नहीं है।

अच्छी बात यह है कि कई लोगों में lifestyle में सुधार करके टाइप-2 डायबिटीज की ओर बढ़ने के जोखिम को कम किया जा सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ भोजन और जरूरत पड़ने पर वजन कम करना इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

कौन-सी जांच से पता चलता है शुगर का स्तर?

डायबिटीज या प्री-डायबिटीज की जांच के लिए डॉक्टर व्यक्ति की स्थिति के अनुसार fasting blood glucose, HbA1c या अन्य glucose tests की सलाह दे सकते हैं।

HbA1c टेस्ट पिछले लगभग 2-3 महीनों के औसत ब्लड शुगर के बारे में जानकारी देता है। हालिया स्वास्थ्य रिपोर्टों में भी HbA1c को प्री-डायबिटीज की पहचान के लिए महत्वपूर्ण टेस्ट के रूप में समझाया गया है।

किसी एक रिपोर्ट के आधार पर खुद से बीमारी का निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है। टेस्ट की व्याख्या उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य जोखिम कारकों को ध्यान में रखकर डॉक्टर द्वारा की जानी चाहिए।

युवाओं को किन आदतों पर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए?

अगर कोई व्यक्ति 20-30 साल का है तो अभी से कुछ आदतों में सुधार भविष्य के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

नियमित शारीरिक गतिविधि को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना, अत्यधिक मीठे पेय और processed food को सीमित करना, पर्याप्त नींद लेना और वजन तथा कमर के बढ़ते आकार पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है।

अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, वजन ज्यादा है, हाई BP या cholesterol की समस्या है या डॉक्टर ने पहले से कोई metabolic risk बताया है तो जांच की जरूरत के बारे में डॉक्टर से चर्चा करनी चाहिए।

सबसे जरूरी बात—लक्षण आने का इंतजार न करें

डायबिटीज की कहानी में सबसे बड़ा खतरा यही है कि शुरुआती दौर में कई लोगों को पता ही नहीं चलता। प्री-डायबिटीज वर्षों तक बिना स्पष्ट लक्षण के रह सकती है और टाइप-2 डायबिटीज के शुरुआती लक्षण भी कई बार इतने हल्के होते हैं कि व्यक्ति उन्हें सामान्य थकान या lifestyle का हिस्सा समझ लेता है।

इसलिए बार-बार प्यास लगना, पेशाब बढ़ना, लगातार थकान, बिना वजह वजन कम होना, नजर धुंधली होना या घाव देर से भरना जैसे बदलाव दिखें तो खुद से बीमारी का फैसला करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

डायबिटीज अब केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं मानी जा सकती। कम उम्र में भी टाइप-2 डायबिटीज और प्री-डायबिटीज के जोखिम को लेकर विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं। हालांकि शरीर में दिखने वाले संकेतों से अकेले डायबिटीज की पुष्टि नहीं की जा सकती, क्योंकि शुरुआती प्री-डायबिटीज में अक्सर कोई लक्षण नहीं होता।

युवाओं के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है कि 20-30 साल की उम्र में भी अपने वजन, कमर की चर्बी, खान-पान, शारीरिक गतिविधि और पारिवारिक जोखिम पर ध्यान दें। अगर जोखिम ज्यादा है तो समय पर ब्लड शुगर की जांच कराना बीमारी को शुरुआती चरण में पहचानने में मदद कर सकता है।

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