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शरीर में ये 5 चीजें चुपचाप बढ़ रही हैं तो सावधान! एक साथ घेर सकती हैं हार्ट, किडनी और डायबिटीज की 4 बड़ी बीमारियां



नई दिल्ली, 16 अगस्त 2026: आज के समय में मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और बढ़ी हुई ब्लड शुगर को अक्सर अलग-अलग समस्याएं माना जाता है, लेकिन मेडिकल साइंस अब इनके बीच के गहरे संबंध पर ज्यादा जोर दे रहा है। हार्ट डिजीज, किडनी की बीमारी, डायबिटीज और मोटापे से जुड़ी मेटाबॉलिक समस्याएं एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं। इसी संबंध को अब Cardiovascular-Kidney-Metabolic यानी CKM Syndrome के रूप में समझा जा रहा है।

जून 2026 में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन, अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी, अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन और अमेरिकन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी ने CKM Syndrome पर पहली व्यापक क्लिनिकल गाइडलाइन जारी की। इसमें मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य cholesterol और chronic kidney disease को आपस में जुड़े जोखिमों के रूप में देखा गया है।

सबसे चिंता की बात यह है कि इन समस्याओं की शुरुआत अक्सर धीरे-धीरे होती है। व्यक्ति को लंबे समय तक कोई गंभीर लक्षण महसूस नहीं होते, लेकिन अंदर ही अंदर ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, वजन और किडनी की कार्यक्षमता में बदलाव शुरू हो सकते हैं।

आखिर क्या है CKM Syndrome?

CKM Syndrome को एक ऐसी स्वास्थ्य स्थिति के रूप में समझा जा सकता है जिसमें मेटाबॉलिक गड़बड़ियां, किडनी की बीमारी और हृदय संबंधी समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का वजन लगातार बढ़ रहा है। इसके साथ पेट की चर्बी बढ़ती है, ब्लड प्रेशर ऊपर जाने लगता है और ब्लड शुगर भी सामान्य से ज्यादा रहने लगती है। समय के साथ ये बदलाव डायबिटीज और हृदय रोग का जोखिम बढ़ा सकते हैं। किडनी भी हाई BP और डायबिटीज से प्रभावित हो सकती है।

यही कारण है कि विशेषज्ञ अब इन बीमारियों को केवल अलग-अलग अंगों की समस्या के रूप में देखने के बजाय एक जुड़े हुए स्वास्थ्य जोखिम के रूप में देखने पर जोर दे रहे हैं।

शरीर में ये 5 चीजें बढ़ीं तो खतरा बढ़ सकता है

1. पेट और शरीर की अतिरिक्त चर्बी

सबसे पहला संकेत है अत्यधिक वजन और खासकर कमर के आसपास बढ़ती चर्बी। अतिरिक्त या असामान्य रूप से जमा फैट शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर डाल सकता है।

पेट की चर्बी बढ़ने के साथ इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई BP और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। CKM गाइडलाइन में excess या dysfunctional adiposity को बीमारी के शुरुआती जोखिम कारकों में शामिल किया गया है।

इसलिए केवल वजन मशीन पर दिखने वाले आंकड़े पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। कमर का बढ़ता घेरा भी स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है।

2. ब्लड प्रेशर का लगातार बढ़ना

दूसरी बड़ी चीज है हाई ब्लड प्रेशर। इसे अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है क्योंकि कई लोगों में BP बढ़ने के बावजूद कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते।

लगातार बढ़ा हुआ BP रक्त वाहिकाओं और हृदय पर दबाव डाल सकता है और किडनी को भी नुकसान पहुंचा सकता है। दूसरी तरफ किडनी की बीमारी होने पर भी BP नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

2026 की CKM गाइडलाइन में 130/80 mmHg या उससे अधिक BP को CKM के महत्वपूर्ण मेटाबॉलिक जोखिम कारकों में शामिल किया गया है।

3. ब्लड शुगर का बढ़ना

तीसरी चीज है बढ़ी हुई ब्लड शुगर। प्री-डायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज को केवल शुगर की बीमारी समझना सही नहीं है।

लंबे समय तक ब्लड शुगर नियंत्रित न रहने पर शरीर की रक्त वाहिकाओं और अन्य अंगों पर असर पड़ सकता है। डायबिटीज हृदय और किडनी दोनों से जुड़ी जटिलताओं का जोखिम बढ़ाती है।

नई CKM गाइडलाइन में टाइप-2 डायबिटीज को CKM Syndrome के महत्वपूर्ण चरणों में शामिल किया गया है और नियमित glycemic assessment पर जोर दिया गया है।

4. ट्राइग्लिसराइड बढ़ना

चौथी चीज है खून में ट्राइग्लिसराइड का बढ़ना। यह एक प्रकार की blood fat है। इसका स्तर ज्यादा होने पर व्यक्ति में अन्य मेटाबॉलिक समस्याएं भी मौजूद हो सकती हैं।

2026 की गाइडलाइन में 150 mg/dL या उससे अधिक triglycerides को CKM के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल किया गया है। साथ ही cholesterol और अन्य lipid abnormalities को भी हृदय संबंधी जोखिम के आकलन में महत्वपूर्ण माना गया है।

इसलिए केवल शुगर की जांच कराना पर्याप्त नहीं है। समय-समय पर lipid profile भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार कराया जाना चाहिए।

5. HDL यानी “अच्छे” कोलेस्ट्रॉल का कम होना

पांचवीं चीज है HDL cholesterol का कम होना। इसे आमतौर पर “अच्छा cholesterol” कहा जाता है।

CKM गाइडलाइन में low HDL-C को भी metabolic risk profile का हिस्सा माना गया है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि metabolic risk factors में low HDL-C की भूमिका अन्य कारकों की तुलना में अलग है।

इसलिए किसी एक रिपोर्ट को देखकर घबराने के बजाय पूरी lipid profile और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों को साथ में देखना जरूरी है।

भारत में भी सामने आया बड़ा संकेत

भारत में भी हार्ट, किडनी, डायबिटीज, हाई BP और मोटापे जैसी समस्याओं के एक साथ मौजूद होने को लेकर महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आए हैं।

जून 2026 में अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के वैज्ञानिक कार्यक्रम में प्रस्तुत एक बड़े community-based भारतीय अध्ययन में cardio-renal-metabolic multimorbidity की prevalence 33.6% बताई गई। इस अध्ययन में ऐसी multimorbidity को कम से कम दो संबंधित स्थितियों के एक साथ मौजूद होने के रूप में परिभाषित किया गया था। 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में यह आंकड़ा 49.7% था, जबकि शहरी आबादी में 42.9% रिपोर्ट किया गया।

यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि इन बीमारियों को अलग-अलग देखने के बजाय संयुक्त रूप से रोकथाम और जांच की जरूरत हो सकती है।

40 की उम्र के बाद क्यों बढ़ जाता है खतरा?

उम्र बढ़ने के साथ डायबिटीज और हाई BP जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। हाल ही में भारत में हुए एक hospital-based अध्ययन ने भी 40 वर्ष से अधिक उम्र के वयस्कों में hypertension और diabetes के एक साथ होने के बढ़ते जोखिम पर ध्यान आकर्षित किया है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि युवाओं को खतरा नहीं है। आज की sedentary lifestyle, लंबे समय तक बैठना, शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खान-पान और बढ़ता मोटापा कम उम्र में भी metabolic risk factors पैदा कर सकते हैं।

किडनी और हार्ट का कनेक्शन समझना जरूरी

किडनी और हृदय को अलग-अलग अंग समझना आम बात है, लेकिन दोनों के बीच मजबूत संबंध है।

हृदय शरीर में रक्त पहुंचाता है और किडनी रक्त को फिल्टर करके शरीर में तरल पदार्थ तथा कई महत्वपूर्ण तत्वों का संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। जब किडनी की कार्यक्षमता कम होती है तो cardiovascular risk बढ़ सकता है। दूसरी तरफ हृदय और रक्त वाहिकाओं की बीमारी किडनी पर भी असर डाल सकती है।

इसी bidirectional relationship के कारण 2026 CKM guideline में हृदय और किडनी की समस्याओं को एक साथ देखने पर विशेष जोर दिया गया है।

शरीर इन समस्याओं का संकेत कैसे देता है?

कई बार शुरुआती CKM risk में कोई खास लक्षण नहीं होते। यही सबसे बड़ी परेशानी है।

कुछ लोगों में लगातार थकान, वजन बढ़ना, सांस फूलना, पैरों में सूजन, अत्यधिक प्यास या बार-बार पेशाब जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं, लेकिन इनमें से कोई भी लक्षण अकेले CKM Syndrome की पुष्टि नहीं करता।

इसीलिए केवल लक्षणों का इंतजार करने के बजाय नियमित स्वास्थ्य जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।

कौन-कौन सी जांच जरूरी हो सकती है?

व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर ब्लड प्रेशर, वजन और कमर का घेरा, fasting blood glucose या HbA1c, cholesterol और triglycerides जैसी जांचों की सलाह दे सकते हैं।

जिन लोगों में किडनी से जुड़े जोखिम मौजूद हैं, उनमें kidney function और urine tests भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार किए जा सकते हैं।

2026 की गाइडलाइन CKM के शुरुआती चरणों में risk factors की नियमित assessment पर जोर देती है ताकि समस्या बढ़ने से पहले पहचान की जा सके।

बचाव के लिए क्या करें?

CKM Syndrome से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए lifestyle सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है।

नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन, वजन को स्वस्थ सीमा में रखने की कोशिश, पर्याप्त नींद, धूम्रपान से बचना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार BP, sugar और cholesterol को नियंत्रित रखना मददगार हो सकता है।

अगर किसी व्यक्ति को पहले से डायबिटीज, हाई BP, मोटापा या किडनी की बीमारी है तो दवाएं अपने मन से बंद नहीं करनी चाहिए।

2026 की गाइडलाइन भी healthy weight बनाए रखने और lifestyle तथा risk-factor management को CKM की रोकथाम और उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बताती है।

हार्ट, किडनी और डायबिटीज को अलग-अलग बीमारियां समझकर नजरअंदाज करना अब पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। शरीर में बढ़ता वजन, कमर की चर्बी, हाई BP, बढ़ी हुई ब्लड शुगर और असामान्य cholesterol/triglycerides एक साथ मौजूद हों तो cardiovascular-kidney-metabolic जोखिम बढ़ सकता है।

भारत में सामने आए नए आंकड़े और 2026 में जारी पहली CKM clinical guideline इस बात पर जोर देती है कि बीमारी गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय जोखिम कारकों की समय रहते पहचान और प्रबंधन किया जाए।

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