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कैंसर का पता चलेगा बीमारी के लक्षण आने से पहले? वैज्ञानिकों ने खोजा खून में छिपा ये ‘राज’, एक टेस्ट से मिलेंगे कई संकेत



नई दिल्ली। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की समय रहते पहचान करना इलाज की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन समस्या यह है कि कई कैंसर शुरुआती चरण में ऐसे स्पष्ट लक्षण नहीं देते, जिनसे मरीज को तुरंत बीमारी का अंदाजा हो सके। यही वजह है कि दुनिया भर में वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जिससे बीमारी की शुरुआती पहचान आसान, कम खर्चीली और कम तकलीफ वाली हो सके। इसी दिशा में अमेरिका की UCLA Health के वैज्ञानिकों ने एक नई ब्लड टेस्ट तकनीक विकसित की है, जिसने शुरुआती अध्ययनों में कई तरह के कैंसर के साथ-साथ लीवर की कुछ बीमारियों और अंगों से जुड़ी असामान्यताओं का पता लगाने की क्षमता दिखाई है।

इस नई तकनीक की खास बात यह है कि इसके लिए केवल खून के नमूने का इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों ने रक्त में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़ों का विश्लेषण करने का तरीका विकसित किया है। इन टुकड़ों में मौजूद जैविक संकेतों को पढ़कर शरीर में होने वाले बदलावों की जानकारी हासिल करने की कोशिश की जाती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में ऐसी तकनीक बीमारी की शुरुआती पहचान और स्वास्थ्य की निगरानी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, अभी यह तकनीक शोध और परीक्षण के चरण में है और इसे आम मरीजों के लिए नियमित कैंसर जांच का विकल्प नहीं माना जा सकता।

खून में छिपे संकेतों से बीमारी तलाशने की कोशिश

हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार बनती और टूटती रहती हैं। जब कोशिकाएं टूटती हैं तो उनका कुछ डीएनए रक्तप्रवाह में पहुंच जाता है। वैज्ञानिक इसी तरह के cell-free DNA यानी रक्त में मौजूद मुक्त डीएनए के टुकड़ों का अध्ययन कर रहे हैं।

UCLA के शोधकर्ताओं ने इस डीएनए में मौजूद रासायनिक संकेतों, खासकर DNA methylation patterns, का विश्लेषण करने पर ध्यान केंद्रित किया। शरीर के अलग-अलग अंगों की कोशिकाओं में डीएनए के ये संकेत अलग हो सकते हैं। बीमारी या कैंसर की स्थिति में इन संकेतों में बदलाव आ सकता है। यही बदलाव इस नई तकनीक के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

सरल भाषा में समझें तो वैज्ञानिक खून के अंदर मौजूद डीएनए को एक तरह के जैविक संदेश की तरह पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अगर किसी अंग की कोशिकाओं में असामान्य बदलाव हो रहा है तो उसके संकेत रक्त में मौजूद डीएनए के टुकड़ों में दिखाई दे सकते हैं।

एक ही टेस्ट से कई बीमारियों की पहचान का लक्ष्य

आज कैंसर की जांच के लिए अलग-अलग प्रकार के कैंसर के अनुसार अलग-अलग स्क्रीनिंग और डायग्नोस्टिक टेस्ट किए जाते हैं। कुछ मामलों में इमेजिंग, एंडोस्कोपी या बायोप्सी जैसी प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी जांचें बीमारी की पुष्टि के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कई बार मरीज के लिए समय लेने वाली या असुविधाजनक भी हो सकती हैं।

नई ब्लड टेस्ट तकनीक का उद्देश्य इन सभी जांचों को तुरंत खत्म करना नहीं है। बल्कि वैज्ञानिक ऐसी अतिरिक्त जांच विकसित करना चाहते हैं, जो डॉक्टरों को यह संकेत दे सके कि शरीर में किसी गंभीर बीमारी की संभावना हो सकती है और आगे किस दिशा में जांच की जरूरत है।

UCLA Health के अनुसार, शुरुआती अध्ययन में इस तकनीक ने कई कैंसर और लीवर से जुड़ी अलग-अलग स्थितियों को पहचानने की क्षमता दिखाई। शोधकर्ताओं ने इसे एक संभावित कम लागत और अपेक्षाकृत सरल जांच के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया है।

कैंसर की शुरुआती पहचान क्यों है इतनी जरूरी?

कैंसर के इलाज में समय का बहुत महत्व होता है। कई कैंसर शुरुआती चरण में पाए जाने पर इलाज के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध कराते हैं। इसके विपरीत, जब बीमारी शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल जाती है तो उपचार अधिक जटिल हो सकता है।

सबसे बड़ी चुनौती उन कैंसर की है जिनके लिए सामान्य आबादी में नियमित स्क्रीनिंग के विकल्प सीमित हैं। यदि किसी व्यक्ति में लक्षण आने से पहले बीमारी का संकेत मिल जाए तो डॉक्टर आगे की जांच और आवश्यक उपचार की योजना जल्दी बना सकते हैं।

यही कारण है कि वैज्ञानिक ऐसी तकनीकों पर लगातार काम कर रहे हैं, जो शरीर में होने वाले शुरुआती बदलावों को पकड़ सकें। ब्लड टेस्ट इस मामले में खास हो सकता है क्योंकि खून का नमूना लेना अपेक्षाकृत आसान होता है और इसके लिए शरीर के अंदर किसी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती।

क्या हर कैंसर का पता चल जाएगा?

नई तकनीक को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना जरूरी है कि यह अभी ऐसा टेस्ट नहीं है जो हर प्रकार के कैंसर को निश्चित रूप से पकड़ सके। शुरुआती शोध में किसी बीमारी के संकेत मिलने का मतलब यह नहीं होता कि तकनीक हर मरीज में बीमारी की सही पहचान कर लेगी।

कैंसर अलग-अलग प्रकार का होता है और प्रत्येक कैंसर शरीर में अलग तरीके से विकसित होता है। कुछ ट्यूमर शुरुआती चरण में रक्त में बहुत कम मात्रा में डीएनए संकेत छोड़ सकते हैं। ऐसे मामलों में किसी भी ब्लड टेस्ट के लिए बीमारी का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

इसी वजह से वैज्ञानिकों को बड़े और विविध मरीज समूहों में इस तकनीक का परीक्षण करना होगा। यह देखना जरूरी होगा कि कितने मरीजों में टेस्ट सही बीमारी का संकेत देता है, कितने मामलों में बीमारी छूट जाती है और कितने स्वस्थ लोगों में गलती से बीमारी का संकेत मिलता है।

गलत पॉजिटिव और गलत नेगेटिव का खतरा

किसी भी मेडिकल स्क्रीनिंग टेस्ट की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह कितनी बीमारियां पकड़ता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि वह स्वस्थ व्यक्ति को गलत तरीके से बीमार न बताए और बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को गलत तरीके से स्वस्थ न बताए।

अगर किसी स्वस्थ व्यक्ति की रिपोर्ट में कैंसर का संकेत आ जाए तो उसे अतिरिक्त जांच, चिंता और अनावश्यक चिकित्सा प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ सकता है। दूसरी तरफ यदि किसी कैंसर मरीज की रिपोर्ट सामान्य आ जाए तो बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है।

इसलिए नई ब्लड टेस्ट तकनीक को आम चिकित्सा उपयोग में लाने से पहले इसकी accuracy और reliability को बड़े क्लीनिकल ट्रायल में परखा जाना जरूरी होगा।

लीवर की बीमारियों के संकेत भी मिले

इस शोध की एक दिलचस्प बात यह है कि तकनीक को केवल कैंसर तक सीमित नहीं रखा गया। UCLA के शोधकर्ताओं ने बताया कि रक्त में मौजूद डीएनए संकेतों के जरिए लीवर से संबंधित कई स्थितियों और अंगों की असामान्यताओं को भी पहचानने की संभावना दिखाई दी।

यदि भविष्य में यह तकनीक अलग-अलग अंगों की स्थिति के बारे में विश्वसनीय जानकारी देने में सफल होती है, तो इसका इस्तेमाल केवल कैंसर स्क्रीनिंग के लिए ही नहीं बल्कि व्यापक स्वास्थ्य निगरानी के लिए भी किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति में बीमारी के स्पष्ट लक्षण दिखाई देने से पहले शरीर के किसी अंग में असामान्य बदलाव का संकेत मिल सकता है। इसके बाद डॉक्टर जरूरत के अनुसार लक्षित जांच कर सकते हैं।

कम लागत वाली जांच बनने की उम्मीद

इस तकनीक की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसे अपेक्षाकृत कम लागत वाला बनाने की कोशिश है। शोधकर्ताओं का उद्देश्य ऐसी जांच विकसित करना है जिसे भविष्य में बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सके। अगर कोई तकनीक बेहद महंगी होती है तो उसका लाभ सीमित संख्या में लोगों तक ही पहुंच पाता है।

कम लागत वाली रक्त जांच भविष्य में उन क्षेत्रों में भी उपयोगी हो सकती है जहां महंगी चिकित्सा सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि वास्तविक कीमत, उपलब्धता और चिकित्सा उपयोग की स्थिति भविष्य में होने वाले परीक्षणों और नियामकीय मंजूरी पर निर्भर करेगी।

क्या अभी लोग यह टेस्ट करा सकते हैं?

इस खबर का मतलब यह नहीं है कि आम लोग तुरंत बाजार में जाकर इस नई तकनीक से कैंसर की जांच करा सकते हैं। यह अभी शोध के स्तर पर है। वैज्ञानिकों को इसके प्रदर्शन को बड़े स्तर पर साबित करना होगा और यह तय करना होगा कि इसे मरीजों की नियमित जांच में किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

कैंसर की आशंका होने पर लोगों को किसी नई या प्रयोगात्मक जांच के भरोसे अपनी सामान्य मेडिकल स्क्रीनिंग नहीं छोड़नी चाहिए। डॉक्टर द्वारा उम्र, परिवार के इतिहास, लक्षण और जोखिम के आधार पर सुझाई गई जांचों को प्राथमिकता देना जरूरी है।

भविष्य में बदल सकता है कैंसर स्क्रीनिंग का तरीका

UCLA के शोधकर्ताओं की यह तकनीक कैंसर की शुरुआती पहचान के क्षेत्र में उम्मीद जरूर जगाती है। एक छोटे से रक्त नमूने से शरीर में मौजूद डीएनए संकेतों का विश्लेषण करके कई प्रकार की बीमारियों के बारे में जानकारी हासिल करने का विचार चिकित्सा विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है।

अगर आने वाले बड़े अध्ययनों में यह तकनीक पर्याप्त सटीक और सुरक्षित साबित होती है, तो भविष्य में डॉक्टरों के पास कैंसर और दूसरी गंभीर बीमारियों की शुरुआती जांच के लिए एक नया विकल्प हो सकता है। इससे उन बीमारियों की पहचान में मदद मिल सकती है, जिनका पता अक्सर तब चलता है जब मरीज में लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं।

हालांकि फिलहाल इसे कैंसर का पक्का पता लगाने वाला टेस्ट कहना सही नहीं होगा। यह एक उभरती हुई तकनीक है, जिसके वास्तविक फायदे और सीमाएं बड़े स्तर के क्लीनिकल परीक्षणों के बाद ही स्पष्ट होंगी।

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