शुगर बढ़ने के बाद शरीर में चुपचाप हो रहा था ये खतरनाक खेल! 9 हजार मरीजों की जांच में सामने आया लिवर का डरावना सच
नई दिल्ली: डायबिटीज को आमतौर पर ऐसी बीमारी माना जाता है जिसका असर ब्लड शुगर बढ़ने तक सीमित रहता है। लेकिन अब सामने आई एक बड़ी भारतीय स्टडी ने डायबिटीज और लिवर के बीच के संबंध को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। देशभर में टाइप-2 डायबिटीज वाले 9,202 वयस्कों पर किए गए DiaFib-Liver अध्ययन में पाया गया कि करीब हर चार में से एक व्यक्ति में लिवर फाइब्रोसिस के संकेत मौजूद थे। इतना ही नहीं, लगभग 5 फीसदी मरीजों में संभावित सिरोसिस के अनुरूप लिवर स्टिफनेस पाई गई।
इस स्टडी की खास बात यह है कि जिन लोगों को लिवर की कोई स्पष्ट शिकायत नहीं थी, उनमें भी लिवर के अंदर नुकसान के संकेत पाए गए। यानी सिर्फ यह मान लेना कि डायबिटीज नियंत्रण में है या लिवर में दर्द नहीं हो रहा, पर्याप्त नहीं है। लिवर की कई समस्याएं लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के आगे बढ़ सकती हैं।
9 हजार से ज्यादा मरीजों पर हुई स्टडी
DiaFib-Liver अध्ययन जनवरी से जुलाई 2024 के बीच भारत के कई केंद्रों में किया गया। इसमें टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित ऐसे वयस्कों को शामिल किया गया जो लिवर की बीमारी के स्पष्ट लक्षणों के कारण इलाज नहीं करा रहे थे। मरीजों के लिवर की स्थिति जानने के लिए Vibration-Controlled Transient Elastography (VCTE) जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
अध्ययन में शामिल 9,202 लोगों की औसत उम्र लगभग 53 साल थी। इनमें 61 फीसदी पुरुष थे। जांच में करीब 26 फीसदी लोगों में clinically significant liver fibrosis पाई गई। वहीं करीब 14 फीसदी में advanced fibrosis के संकेत मिले और लगभग 5 फीसदी लोगों में probable cirrhosis के अनुरूप परिणाम सामने आए।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लिवर फाइब्रोसिस का मतलब है कि लिवर में लंबे समय से नुकसान के कारण निशान बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। अगर यह प्रक्रिया आगे बढ़ती रहे तो लिवर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और गंभीर अवस्था में सिरोसिस जैसी समस्या विकसित हो सकती है।
सबसे चौंकाने वाली बात क्या सामने आई?
स्टडी का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि लिवर में फैट जमा होना ही पूरी कहानी नहीं है। कुछ ऐसे डायबिटीज मरीज भी मिले जिनमें लिवर में स्पष्ट steatosis यानी फैट जमा होने के संकेत नहीं थे, फिर भी फाइब्रोसिस मौजूद थी।
जिन मरीजों में steatosis नहीं थी, उनमें भी लगभग 13 फीसदी में clinically significant fibrosis पाई गई। लगभग 4 फीसदी में जांच के परिणाम probable cirrhosis के अनुरूप थे।
यही वजह है कि विशेषज्ञों के लिए अब सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं माना जा रहा कि लिवर में फैट है या नहीं। लिवर के अंदर कितना स्कारिंग यानी fibrosis विकसित हो चुका है, इसकी पहचान भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
डायबिटीज और लिवर के बीच क्या है संबंध?
टाइप-2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता। लंबे समय तक बढ़ी हुई ब्लड शुगर और insulin resistance शरीर के metabolism पर असर डाल सकती है। इसी metabolic dysfunction का संबंध लिवर में फैट जमा होने और आगे चलकर लिवर को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रियाओं से हो सकता है।
आजकल ऐसी लिवर बीमारी को Metabolic Dysfunction-Associated Steatotic Liver Disease यानी MASLD कहा जाता है। यह पहले NAFLD के नाम से जानी जाती थी।
एक अन्य 2026 की भारतीय multicentre study में biopsy से पुष्टि किए गए 400 MASLD मरीजों का विश्लेषण किया गया। इसमें टाइप-2 डायबिटीज वाले मरीजों में advanced fibrosis का जोखिम बिना डायबिटीज वाले मरीजों की तुलना में लगभग दोगुना पाया गया।
इस अध्ययन में advanced fibrosis वाले मरीजों में डायबिटीज की मौजूदगी भी ज्यादा थी। शोधकर्ताओं के multivariable analysis में उम्र और टाइप-2 डायबिटीज दोनों advanced fibrosis से जुड़े महत्वपूर्ण कारक रहे।
क्या हर डायबिटीज मरीज को Fatty Liver होता है?
ऐसा कहना सही नहीं होगा कि हर डायबिटीज मरीज को fatty liver या fibrosis जरूर होगी। लेकिन डायबिटीज के साथ metabolic risk factors बढ़ने पर लिवर की समस्या का खतरा बढ़ सकता है।
2026 में प्रकाशित एक systematic review और meta-analysis में भारत के टाइप-2 डायबिटीज मरीजों से संबंधित 18 अध्ययनों और 81,364 वयस्क डायबिटीज मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें MASLD की pooled prevalence करीब 56.9 फीसदी आंकी गई, हालांकि अलग-अलग अध्ययनों और जांच विधियों में काफी अंतर था।
इसलिए किसी व्यक्ति के बारे में केवल इस आंकड़े के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसे MASLD है। व्यक्तिगत जोखिम का पता लगाने के लिए डॉक्टर की सलाह और उचित जांच जरूरी होती है।
मोटापा ही एकमात्र कारण नहीं
अक्सर माना जाता है कि लिवर में फैट या fibrosis की समस्या सिर्फ मोटापे से जुड़ी है। लेकिन DiaFib-Liver अध्ययन में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई—BMI 25 से कम वाले यानी non-obese मरीजों में भी करीब 19 फीसदी में clinically significant fibrosis पाई गई।
इसका मतलब यह है कि शरीर का वजन सामान्य दिखने के बावजूद किसी व्यक्ति में metabolic और liver-related risk मौजूद हो सकता है।
स्टडी में obesity, dyslipidemia, कम kidney filtration rate और लंबे समय से चली आ रही डायबिटीज को clinically significant fibrosis से जुड़े कारकों में शामिल किया गया।
लंबे समय से डायबिटीज वालों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत
डायबिटीज जितने लंबे समय तक रहती है, शरीर पर metabolic stress का असर भी लंबे समय तक रह सकता है। अध्ययन में 10 साल या उससे अधिक समय से डायबिटीज वाले लोगों में fibrosis के जोखिम से संबंध पाया गया।
हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि 10 साल से कम समय से डायबिटीज वाले व्यक्ति सुरक्षित हैं। fibrosis कुछ लोगों में पहले भी विकसित हो सकती है। इसलिए उम्र, वजन, cholesterol, blood pressure, kidney function और diabetes duration जैसे कई factors को एक साथ देखना जरूरी है।
क्या लिवर खराब होने पर हमेशा लक्षण दिखाई देते हैं?
यही इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती है। लिवर fibrosis शुरुआती चरणों में कई बार स्पष्ट लक्षणों के बिना मौजूद रह सकती है। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, रोजमर्रा के काम कर सकता है और उसे यह अंदाजा भी नहीं होता कि लिवर में अंदरूनी बदलाव हो रहे हैं।
इसी कारण केवल लक्षणों का इंतजार करना उचित नहीं माना जाता। खासकर डायबिटीज, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य cholesterol या अन्य metabolic risk factors वाले लोगों में डॉक्टर जरूरत के अनुसार liver function tests, imaging या fibrosis assessment जैसी जांचों पर विचार कर सकते हैं।
कौन-से संकेत नजर आएं तो डॉक्टर से संपर्क करें?
लिवर से जुड़ी परेशानी के कई संभावित संकेत हो सकते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी लक्षण अकेले fibrosis की पुष्टि नहीं करता। लगातार थकान, भूख में बदलाव, पेट में असहजता, त्वचा या आंखों में पीलापन, पैरों में सूजन या पेट में असामान्य सूजन जैसी समस्या होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
खास बात यह है कि fibrosis के शुरुआती चरणों में कोई खास लक्षण नहीं भी हो सकता है। इसलिए केवल शरीर के संकेतों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
बचाव के लिए क्या किया जा सकता है?
डायबिटीज और लिवर की सेहत को अलग-अलग देखने के बजाय दोनों को साथ समझना जरूरी है। डॉक्टर द्वारा निर्धारित डायबिटीज की दवाएं नियमित रूप से लेना, ब्लड शुगर की निगरानी करना, संतुलित भोजन लेना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और वजन को स्वस्थ सीमा में रखने की कोशिश करना metabolic health के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
शराब का सेवन करने वालों को इसके बारे में अपने डॉक्टर से व्यक्तिगत सलाह लेनी चाहिए, खासकर यदि लिवर से जुड़ी कोई समस्या पहले से मौजूद हो।
किसी भी दवा, सप्लीमेंट या घरेलू उपचार को अपने स्तर पर शुरू करना सही नहीं है। डायबिटीज की दवा में बदलाव या लिवर की बीमारी के इलाज के लिए चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है।
अब क्यों बढ़ रही है चिंता?
भारत में डायबिटीज और metabolic diseases का बढ़ता बोझ स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बन रहा है। नई स्टडी का संदेश यह है कि डायबिटीज की निगरानी सिर्फ ब्लड शुगर और HbA1c तक सीमित रखने से लिवर की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।
DiaFib-Liver के शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष दिया कि डायबिटीज देखभाल में liver fibrosis की व्यवस्थित जांच को शामिल करने पर विचार करने की जरूरत है।
यानी आने वाले समय में डायबिटीज मरीजों की नियमित देखभाल में सिर्फ शुगर कंट्रोल ही नहीं, बल्कि लिवर की स्थिति पर भी ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है।
डायबिटीज को सिर्फ ब्लड शुगर की बीमारी समझना भारी पड़ सकता है। 9,202 भारतीय टाइप-2 डायबिटीज मरीजों पर हुए DiaFib-Liver अध्ययन में करीब हर चार में से एक व्यक्ति में clinically significant liver fibrosis और करीब हर 20 में से एक में probable cirrhosis के अनुरूप परिणाम मिले।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लिवर में नुकसान हमेशा मोटापे या स्पष्ट लक्षणों के साथ ही दिखाई दे, ऐसा जरूरी नहीं है। इसलिए डायबिटीज से जूझ रहे लोगों को अपने ब्लड शुगर के साथ-साथ समग्र metabolic और liver health पर भी चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ध्यान देना चाहिए।

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