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डायबिटीज को लेकर सबसे बड़ा भ्रम हुआ उजागर! क्या सच में चीनी छोड़ने से बच जाएंगे आप? असली वजह जानकर चौंक जाएंगे



डायबिटीज यानी मधुमेह को लेकर समाज में एक आम धारणा है कि ज्यादा मिठाई, चीनी या मीठे पेय पदार्थ खाने-पीने से ही यह बीमारी होती है। यही वजह है कि कई लोग डायबिटीज का नाम सुनते ही सबसे पहले मिठाई और चीनी को जिम्मेदार मान लेते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस की तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल है। सिर्फ मीठा खाना डायबिटीज का एकमात्र कारण नहीं है। खासकर टाइप-2 डायबिटीज के पीछे शरीर में इंसुलिन का ठीक से काम न करना, आनुवंशिक कारण, अधिक वजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, उम्र, पारिवारिक इतिहास और कई अन्य कारक भूमिका निभाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक डायबिटीज एक ऐसी पुरानी बीमारी है जिसमें खून में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है। लंबे समय तक ब्लड शुगर नियंत्रित न रहने पर आंखों, किडनी, नसों, हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। WHO के अनुसार टाइप-2 डायबिटीज के विकास में अधिक वजन, शारीरिक निष्क्रियता और आनुवंशिक कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत में भी डायबिटीज का बोझ तेजी से बढ़ा है। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन यानी IDF के 2025 Diabetes Atlas के अनुसार 2024 में भारत में 20 से 79 वर्ष की उम्र के करीब 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज के साथ रह रहे थे। यही संख्या 2050 तक लगभग 15.67 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।

क्या ज्यादा चीनी खाने से डायबिटीज हो जाती है?

इस सवाल का सीधा जवाब है—सिर्फ चीनी खाना डायबिटीज का अकेला कारण नहीं है।

टाइप-2 डायबिटीज में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पातीं। इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। समय के साथ अग्न्याशय शरीर की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता और ब्लड ग्लूकोज बढ़ने लगता है। इस प्रक्रिया में आनुवंशिक और मेटाबॉलिक कारकों के साथ वजन, खान-पान और शारीरिक गतिविधि जैसे कई तत्व शामिल होते हैं।

हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि चीनी या मीठे खाद्य पदार्थों का कोई महत्व नहीं है। ज्यादा कैलोरी वाला खान-पान, मीठे पेय पदार्थ और लंबे समय तक अधिक कैलोरी का सेवन वजन बढ़ने में योगदान कर सकता है। अधिक वजन और मोटापा टाइप-2 डायबिटीज के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल हैं। इसलिए मीठे का अत्यधिक सेवन अप्रत्यक्ष रूप से जोखिम बढ़ाने वाली जीवनशैली का हिस्सा बन सकता है, लेकिन इसे बीमारी का अकेला कारण कहना सही नहीं होगा।

फिर डायबिटीज होने की असली वजह क्या है?

टाइप-2 डायबिटीज एक बहु-कारक बीमारी है। इसका मतलब है कि इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण एक साथ काम कर सकते हैं।

1. इंसुलिन रेजिस्टेंस

इंसुलिन शरीर में ब्लड ग्लूकोज को नियंत्रित करने वाला महत्वपूर्ण हार्मोन है। जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, तो ग्लूकोज का इस्तेमाल ठीक से नहीं हो पाता। इससे खून में शुगर बढ़ सकती है।

समय के साथ अग्न्याशय पर भी अधिक इंसुलिन बनाने का दबाव पड़ सकता है। जब शरीर इस अतिरिक्त जरूरत को पूरा नहीं कर पाता, तब ब्लड शुगर लगातार बढ़ने लगती है। यही प्रक्रिया टाइप-2 डायबिटीज के विकास में अहम भूमिका निभाती है।

2. ज्यादा वजन और पेट की चर्बी

अधिक वजन और मोटापा टाइप-2 डायबिटीज के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। खासकर पेट के आसपास अधिक चर्बी मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण हो सकती है।

NIDDK के अनुसार अधिक वजन या मोटापा होने पर टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। कमर की परिधि भी जोखिम का एक संकेत हो सकती है।

3. शारीरिक गतिविधि की कमी

आज की जीवनशैली में घंटों बैठकर काम करना, पैदल चलना कम होना और नियमित व्यायाम न करना आम हो गया है। शारीरिक निष्क्रियता भी टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल है।

नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर को ग्लूकोज और इंसुलिन के बेहतर इस्तेमाल में मदद कर सकती है। इसलिए रोजाना सक्रिय रहना डायबिटीज की रोकथाम की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

4. परिवार में डायबिटीज का इतिहास

अगर माता-पिता या भाई-बहन को टाइप-2 डायबिटीज है तो व्यक्ति में इसका जोखिम बढ़ सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि परिवार में डायबिटीज होने पर बीमारी निश्चित रूप से होगी, लेकिन व्यक्ति को अपने वजन, खान-पान, शारीरिक गतिविधि और नियमित जांच पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

5. उम्र बढ़ना

उम्र बढ़ने के साथ टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम भी बढ़ सकता है। हालांकि आज यह बीमारी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। टाइप-2 डायबिटीज बच्चों और युवाओं में भी देखी जा सकती है, खासकर जब अन्य जोखिम कारक मौजूद हों।

क्या दुबले-पतले लोगों को डायबिटीज नहीं होती?

यह भी एक बड़ा मिथक है कि केवल मोटे लोगों को डायबिटीज होती है। ऐसा नहीं है।

अधिक वजन और मोटापा टाइप-2 डायबिटीज के महत्वपूर्ण जोखिम कारक हैं, लेकिन बीमारी केवल वजन पर निर्भर नहीं करती। परिवार का इतिहास, आनुवंशिक जोखिम, उम्र, शारीरिक निष्क्रियता और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारक भी भूमिका निभाते हैं। इसलिए दुबले व्यक्ति को भी डायबिटीज हो सकती है।

यही कारण है कि केवल शरीर का वजन देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को डायबिटीज का खतरा है या नहीं।

टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज एक जैसी नहीं

डायबिटीज को समझने के लिए टाइप-1 और टाइप-2 के बीच अंतर जानना भी जरूरी है।

टाइप-1 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त इंसुलिन बनाना बंद कर देता है और इसके लिए रोजाना इंसुलिन लेना जरूरी होता है। WHO के अनुसार टाइप-1 डायबिटीज का कारण और इसे रोकने का तरीका अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है। दूसरी तरफ टाइप-2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं करता और बाद में पर्याप्त इंसुलिन उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।

इसलिए टाइप-1 डायबिटीज को भी केवल मीठा खाने का नतीजा मानना वैज्ञानिक रूप से गलत है।

डायबिटीज के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

डायबिटीज का एक बड़ा खतरा यह है कि शुरुआती चरण में कई लोगों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। टाइप-2 डायबिटीज के लक्षण कई वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हो सकते हैं और कुछ लोगों को बीमारी का पता तब चलता है जब कोई जांच कराई जाती है या कोई जटिलता सामने आती है।

संभावित लक्षणों में बार-बार पेशाब आना, बहुत ज्यादा प्यास लगना, ज्यादा भूख लगना, थकान, धुंधला दिखाई देना, हाथ-पैर में झनझनाहट या सुन्नपन, घाव का देर से भरना और बिना कोशिश के वजन कम होना शामिल हो सकते हैं।

इनमें से कोई लक्षण होने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति को निश्चित रूप से डायबिटीज है। इसकी पुष्टि ब्लड टेस्ट से ही की जाती है।

ब्लड शुगर की जांच क्यों जरूरी?

क्योंकि डायबिटीज लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के रह सकती है, इसलिए जोखिम वाले लोगों में नियमित स्वास्थ्य जांच महत्वपूर्ण है। WHO के अनुसार शुरुआती पहचान के लिए ब्लड ग्लूकोज की जांच महत्वपूर्ण है।

डॉक्टर व्यक्ति की स्थिति के अनुसार फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज, HbA1c या अन्य आवश्यक जांचों की सलाह दे सकते हैं। किसी एक घरेलू रीडिंग या लक्षण के आधार पर खुद से डायबिटीज का निदान करना सही तरीका नहीं है।

अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, वजन अधिक है, शारीरिक गतिविधि कम है या डॉक्टर ने प्रीडायबिटीज का संकेत दिया है, तो जांच के बारे में चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।

प्रीडायबिटीज को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

प्रीडायबिटीज ऐसी स्थिति है जिसमें ब्लड ग्लूकोज सामान्य से अधिक होता है, लेकिन डायबिटीज के स्तर तक नहीं पहुंचा होता। यह भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज के बढ़े हुए जोखिम का संकेत हो सकता है। हालांकि प्रीडायबिटीज का मतलब यह नहीं कि डायबिटीज निश्चित रूप से होगी।

यही वह चरण है जहां जीवनशैली में बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वजन को नियंत्रित करना, नियमित शारीरिक गतिविधि और संतुलित खान-पान अपनाना जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

डायबिटीज से बचाव के लिए क्या करें?

टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को कम करने के लिए रोजमर्रा की आदतों में सुधार महत्वपूर्ण है। WHO नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन बनाए रखने, संतुलित भोजन और तंबाकू से बचने को महत्वपूर्ण मानता है। WHO कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि प्रति सप्ताह की सलाह देता है।

NIDDK के अनुसार जिन लोगों का वजन अधिक है, उनके लिए शुरुआती वजन का लगभग 5 से 7 प्रतिशत कम करना भी टाइप-2 डायबिटीज को रोकने या देर से विकसित होने में मदद कर सकता है। इसके साथ नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ खान-पान अपनाना महत्वपूर्ण है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को एक ही डाइट या व्यायाम योजना अपनानी चाहिए। उम्र, वजन, दूसरी बीमारियां, दवाएं और व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार योजना अलग हो सकती है।

तो क्या मीठा बिल्कुल छोड़ देना चाहिए?

डायबिटीज के संदर्भ में सबसे जरूरी बात संतुलन है। यह कहना कि मीठा खाने से ही डायबिटीज होती है, गलत है; लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि अत्यधिक चीनी और मीठे पेय पदार्थों को बिना चिंता के लिया जाए।

अधिक कैलोरी वाला खान-पान वजन बढ़ाने में योगदान कर सकता है और अधिक वजन टाइप-2 डायबिटीज का महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। इसलिए रोजमर्रा के खान-पान में पोषण, मात्रा और कुल कैलोरी पर ध्यान देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

मीठे पेय पदार्थों की जगह पानी को प्राथमिकता देना और संतुलित आहार लेना स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा हो सकता है।

डायबिटीज को लेकर सबसे बड़ा सच

डायबिटीज को केवल “मीठा खाने की बीमारी” कहना इस जटिल बीमारी को बहुत छोटा करके देखने जैसा है। इसके पीछे आनुवंशिक कारणों से लेकर इंसुलिन रेजिस्टेंस, अधिक वजन, शारीरिक निष्क्रियता, उम्र और गर्भावस्था से जुड़े कुछ जोखिम कारक तक कई कारण हो सकते हैं।

भारत में डायबिटीज से प्रभावित लोगों की संख्या भी बहुत बड़ी है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने का अनुमान है। IDF के अनुसार 2024 में भारत में 20-79 वर्ष की उम्र के लगभग 89.8 मिलियन यानी 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज के साथ रह रहे थे।

इसलिए केवल मिठाई छोड़ना पर्याप्त रणनीति नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन, संतुलित खान-पान, धूम्रपान से दूरी और जरूरत के अनुसार समय पर जांच—ये सभी डायबिटीज के जोखिम को कम करने और बीमारी को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण हैं।

डायबिटीज से बचने या उसे नियंत्रित करने के लिए सबसे जरूरी बात डर नहीं, बल्कि सही जानकारी है। अगर आपको डायबिटीज के लक्षण हैं या आप जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर उचित ब्लड टेस्ट कराना बेहतर है। किसी घरेलू नुस्खे या केवल चीनी बंद करने के आधार पर बीमारी का इलाज करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

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