सितंबर में आसमान से बरसेगा भारत का नया हथियार! Su-30MKI से होगा 500 किलो के PGB-500 का टेस्ट, दुश्मनों की बढ़ेगी टेंशन?
भारत अपनी वायु शक्ति को लगातार स्वदेशी हथियारों से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में 500 किलोग्राम वर्ग के स्वदेशी प्रिसिजन-गाइडेड बमों को लड़ाकू विमानों के साथ एकीकृत करने और उनकी क्षमताओं को परखने की कोशिशें लंबे समय से चल रही हैं। उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि DRDO ने पहले ही Su-30MKI से 500 किलोग्राम श्रेणी के गाइडेड बम का सफल फ्लाइट टेस्ट किया है। ऐसे में 2026 में प्रस्तावित या रिपोर्ट किए जा रहे नए परीक्षणों को भारत की स्वदेशी प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता के अगले चरण के रूप में देखा जा सकता है।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। सितंबर-अक्टूबर 2026 में “PGB-500” नाम से होने वाले किसी विशेष परीक्षण की पुष्टि फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक DRDO या रक्षा मंत्रालय की सार्वजनिक विज्ञप्तियों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलती। इसलिए इस खबर में भविष्य के ट्रायल से जुड़ी जानकारी को संभावित/रिपोर्टेड कार्यक्रम के रूप में देखना उचित होगा, जबकि 500 किलोग्राम वर्ग के स्वदेशी गाइडेड बम और Su-30MKI से उसके परीक्षण की पुरानी आधिकारिक जानकारी उपलब्ध है।
500 किलो वर्ग के गाइडेड बम का क्या महत्व है?
प्रिसिजन-गाइडेड बम यानी ऐसे हवाई हथियार जिन्हें लक्ष्य पर अधिक सटीकता से पहुंचाने के लिए मार्गदर्शन प्रणाली से लैस किया जाता है। सामान्य बमों की तुलना में इस तरह के हथियारों का उद्देश्य लक्ष्य पर अधिक नियंत्रित और सटीक प्रभाव हासिल करना होता है।
भारत ने इस दिशा में कई वर्षों से काम किया है। रक्षा मंत्रालय की 24 मई 2019 की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार DRDO ने Su-30MKI विमान से 500 किलोग्राम वर्ग के Inertial Guided Bomb का सफल फ्लाइट टेस्ट किया था। परीक्षण राजस्थान के पोखरण टेस्ट रेंज से किया गया था और बम ने निर्धारित रेंज हासिल करते हुए लक्ष्य पर उच्च सटीकता के साथ प्रहार किया था। मंत्रालय ने यह भी बताया था कि हथियार प्रणाली अलग-अलग प्रकार के वॉरहेड ले जाने में सक्षम थी।
इससे साफ है कि 500 किलोग्राम वर्ग का गाइडेड बम भारत के लिए कोई बिल्कुल नई अवधारणा नहीं है। वर्तमान विकास का महत्व इस बात में है कि ऐसी स्वदेशी प्रणालियों को आधुनिक लड़ाकू विमान और भारतीय वायुसेना की मौजूदा ऑपरेशनल जरूरतों के अनुरूप कितना बेहतर बनाया जा सकता है।
Su-30MKI क्यों है महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म?
Su-30MKI भारतीय वायुसेना के प्रमुख मल्टी-रोल लड़ाकू विमानों में शामिल है। यह लंबी दूरी के अभियानों, एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड भूमिकाओं सहित विभिन्न प्रकार के मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
भारत पहले ही Su-30MKI को कई स्वदेशी और संयुक्त रूप से विकसित हथियार प्रणालियों के साथ जोड़ चुका है। उदाहरण के लिए, रक्षा मंत्रालय ने 2022 में Su-30MKI से BrahMos Air-Launched Missile के Extended Range Version के सफल परीक्षण की पुष्टि की थी। इस परीक्षण के बाद IAF ने Su-30MKI से जमीन और समुद्र पर लंबी दूरी के सटीक हमले की क्षमता हासिल करने की बात कही थी।
2019 में भी Su-30MKI से BrahMos के एयर-लॉन्च संस्करण का परीक्षण किया गया था। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक उस समय विमान से लॉन्च किए गए मिसाइल ने निर्धारित समुद्री लक्ष्य को सफलतापूर्वक निशाना बनाया था और इसके साथ Su-30MKI के साथ हथियार का एकीकरण पूरा हुआ था।
यानी Su-30MKI को अलग-अलग स्वदेशी हथियारों के साथ जोड़ने का भारत का अनुभव पहले से मौजूद है। इसी वजह से 500 किलोग्राम वर्ग के नए या उन्नत प्रिसिजन हथियारों के लिए भी यह विमान एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बना हुआ है।
ट्रायल में किन चीजों की जांच होती है?
किसी नए हवाई हथियार को लड़ाकू विमान पर लगाने से पहले सिर्फ उसके लक्ष्य भेदन की क्षमता नहीं देखी जाती। विमान और हथियार के बीच सुरक्षित तथा विश्वसनीय एकीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
DRDO के पुराने रिकॉर्ड से पता चलता है कि 500 किलोग्राम Precision Guided High Speed Low Drag aircraft bomb के परीक्षणों में carriage और release trials किए गए थे। इन परीक्षणों का उद्देश्य विमान के साथ हथियार के व्यवहार और अलग होने की प्रक्रिया का मूल्यांकन करना था। DRDO के जुलाई 2017 के न्यूजलेटर में बताया गया था कि परीक्षणों में हथियार के carriage parameters को जांचा गया और बाद में release के दौरान separation performance तथा stability का आकलन किया गया।
इस तरह के परीक्षणों से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि विमान पर हथियार लगाए जाने के बाद उसकी उड़ान संबंधी विशेषताओं पर अपेक्षित असर हो और हथियार को अलग करने की प्रक्रिया सुरक्षित रहे।
GPS और INS जैसी तकनीक का क्या काम?
प्रिसिजन-गाइडेड हथियारों में मार्गदर्शन प्रणाली बेहद महत्वपूर्ण होती है। उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों में भारतीय 500 किलोग्राम वर्ग के बमों के लिए INS और GPS आधारित guidance का उल्लेख मिलता है।
रक्षा मंत्रालय की 2018-19 की वार्षिक रिपोर्ट में 500 किलोग्राम General Purpose Bomb के विकास के संदर्भ में INS/GPS आधारित guidance और अन्य तकनीकी प्रणालियों का उल्लेख किया गया था।
इसके अलावा भारत में मौजूदा 500 किलोग्राम GP bombs को precision weapon में बदलने के लिए Indigenous Precision Range Extension Kit यानी IPREK की दिशा में भी काम किया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय के Make in India Defence पोर्टल पर जारी EOI के अनुसार इस किट का उद्देश्य सामान्य 500 किलोग्राम बम को precision-guided munition में बदलना है। दस्तावेज में NavIC सहित navigation और अन्य seeker technologies का भी उल्लेख है।
इससे पता चलता है कि भारत केवल एक नए बम को विकसित करने पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि मौजूदा बमों को भी आधुनिक precision capability देने के विकल्प तलाश रहा है।
मजबूत ठिकानों के खिलाफ क्षमता का सवाल
500 किलोग्राम वर्ग के हथियारों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के जमीनी लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है। पुराने DRDO दस्तावेजों में 500 किलोग्राम वर्ग के बमों के लिए विभिन्न प्रकार के ground targets का उल्लेख मिलता है।
हालांकि किसी विशेष हथियार को किसी खास लक्ष्य को नष्ट करने में कितना प्रभावी माना जाएगा, यह उसके वॉरहेड, फ्यूज, guidance, लक्ष्य की संरचना और ऑपरेशनल परिस्थितियों सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए केवल 500 किलोग्राम वजन के आधार पर किसी हथियार की वास्तविक क्षमता का अनुमान लगाना सही नहीं होगा।
यही वजह है कि परीक्षणों के दौरान हथियार के अलग-अलग तकनीकी पहलुओं का मूल्यांकन किया जाता है और उसके बाद ही इसे ऑपरेशनल उपयोग के लिए आगे बढ़ाया जाता है।
भारत के लिए स्वदेशीकरण क्यों जरूरी?
भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। स्वदेशी हथियार प्रणालियों के विकास से केवल हथियारों की उपलब्धता ही नहीं बढ़ती, बल्कि डिजाइन, उत्पादन, रखरखाव और सप्लाई चेन से जुड़ी घरेलू क्षमता भी मजबूत होती है।
Su-30MKI के मामले में भी भारत ने स्थानीय उत्पादन और स्वदेशीकरण पर काफी जोर दिया है। दिसंबर 2024 में रक्षा मंत्रालय ने HAL के साथ 12 नए Su-30MKI विमानों की खरीद का अनुबंध किया था। मंत्रालय के अनुसार इन विमानों में 62.6 प्रतिशत indigenous content होगा और इनका निर्माण HAL की नासिक डिवीजन में किया जाएगा।
इस तरह विमान के साथ स्वदेशी हथियारों और प्रणालियों का एकीकरण भारत की व्यापक आत्मनिर्भरता रणनीति का हिस्सा बनता है।
भविष्य में क्या होगा?
यदि 2026 में प्रस्तावित PGB-500 परीक्षण वास्तव में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होते हैं और सभी तकनीकी मानक पूरे करते हैं, तो उसके बाद हथियार को अगले चरण के मूल्यांकन के लिए ले जाया जा सकता है। किसी भी हथियार प्रणाली के लिए फ्लाइट टेस्ट सफल होना अंतिम चरण नहीं होता। इसके बाद उपयोगकर्ता मूल्यांकन, प्रमाणन और उत्पादन से जुड़े कई चरण हो सकते हैं।
इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी कथित 2026 परीक्षण के तुरंत बाद हथियार बड़े पैमाने पर वायुसेना में शामिल हो जाएगा। इसका फैसला परीक्षणों के परिणाम और रक्षा मंत्रालय तथा भारतीय वायुसेना की आवश्यकताओं के आधार पर होगा।
भारत की प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता की बड़ी तस्वीर
भारत की स्वदेशी प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता केवल एक बम या एक विमान तक सीमित नहीं है। Guided bombs, stand-off weapons, cruise missiles और अन्य precision systems को अलग-अलग प्लेटफॉर्म से जोड़ने की दिशा में लगातार काम हुआ है।
DRDO के पुराने परीक्षणों में Su-30MKI से 500 किलोग्राम वर्ग के guided bomb का सफल परीक्षण और बाद के वर्षों में इसी विमान से BrahMos जैसे हथियारों का सफल integration इस दिशा में भारत की प्रगति को दिखाता है।
इसका व्यापक महत्व यह है कि भारतीय वायुसेना को भविष्य में अलग-अलग मिशनों के लिए अधिक विविध और स्वदेशी हथियार विकल्प मिल सकते हैं। इससे विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता घटाने और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
PGB-500 से जुड़े सितंबर-अक्टूबर 2026 के कथित ट्रायल को लेकर आधिकारिक पुष्टि का इंतजार करना जरूरी है। लेकिन 500 किलोग्राम वर्ग के स्वदेशी guided bombs और Su-30MKI से उनके परीक्षण का भारत के पास पहले से प्रमाणित आधार मौजूद है। DRDO के पुराने परीक्षण, INS/GPS आधारित guidance पर काम और 500 किलोग्राम GP bombs को precision weapons में बदलने की योजनाएं बताती हैं कि भारत लगातार अपनी स्वदेशी सटीक हमला क्षमता विकसित कर रहा है।

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