टीबी की दवा पूरी… फिर भी लौट आई बीमारी! नई स्टडी में 7% मरीजों को लेकर बड़ा खुलासा, इलाज के बाद मंडराता रहा खतरा
नई दिल्ली: आमतौर पर माना जाता है कि टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस का इलाज पूरा होने के बाद बीमारी का खतरा खत्म हो जाता है। लेकिन भारत में हुई एक नई स्टडी ने इस धारणा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, टीबी का इलाज पूरा कर चुके मरीजों में भी बीमारी दोबारा लौट सकती है और इलाज खत्म होने के शुरुआती महीनों में ऐसे मरीजों की विशेष निगरानी बेहद जरूरी हो सकती है।
महाराष्ट्र के पुणे में छह सरकारी टीबी क्लीनिकों में की गई इस स्टडी में 1,076 टीबी सर्वाइवर्स और उनके 3,309 घरेलू संपर्कों को शामिल किया गया। इन लोगों की इलाज पूरा होने के बाद 18 महीने तक निगरानी की गई। शोधकर्ताओं ने यह भी जांचा कि मरीजों की निगरानी के लिए घर जाकर स्क्रीनिंग करना ज्यादा प्रभावी है या फोन के जरिए फॉलो-अप करना।
रिसर्च में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि इलाज पूरा करने के बाद भी करीब 7 प्रतिशत टीबी सर्वाइवर्स में बीमारी दोबारा सामने आई। इसके अलावा मरीजों के घरेलू संपर्कों में भी नए टीबी मामले पाए गए। यह अध्ययन टीबी के इलाज के बाद लंबे समय तक निगरानी की जरूरत की ओर इशारा करता है।
इलाज पूरा होने के बाद भी क्यों बना रहता है खतरा?
टीबी एक गंभीर संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। इसका इलाज कई महीनों तक चलने वाली दवाओं के जरिए किया जाता है। मरीजों के लिए निर्धारित पूरा उपचार लेना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
लेकिन नई स्टडी से संकेत मिलता है कि इलाज पूरा हो जाने के बाद हर मरीज के लिए जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता।
कुछ लोगों में बीमारी दोबारा सक्रिय हो सकती है। इसे रिकरेंट टीबी कहा जाता है। यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने इलाज के बाद की निगरानी को भी टीबी नियंत्रण की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की जरूरत बताई है।
1,076 टीबी मरीजों पर हुई निगरानी
यह अध्ययन पुणे के छह सरकारी टीबी क्लीनिकों में किया गया था। इसमें इलाज पूरा कर चुके 1,076 टीबी सर्वाइवर्स को शामिल किया गया।
इसके अलावा उनके घरों में रहने वाले 3,309 लोगों को भी अध्ययन में शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने इन लोगों की स्थिति पर 18 महीने तक नजर रखी।
अध्ययन का उद्देश्य सिर्फ यह पता लगाना नहीं था कि इलाज के बाद टीबी दोबारा आती है या नहीं, बल्कि यह भी देखना था कि इलाज पूरा होने के बाद मरीजों और उनके परिवार के सदस्यों की स्क्रीनिंग किस तरीके से ज्यादा प्रभावी ढंग से की जा सकती है।
7 प्रतिशत मरीजों में दोबारा मिली टीबी
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही रहा कि इलाज पूरा कर चुके करीब 7 प्रतिशत टीबी सर्वाइवर्स में बीमारी दोबारा सामने आई।
रिपोर्ट के अनुसार कुल 75 टीबी सर्वाइवर्स में दोबारा टीबी पाई गई। यह आंकड़ा इस बात को रेखांकित करता है कि इलाज पूरा होने के बाद मरीजों को पूरी तरह निगरानी से बाहर कर देना हमेशा उचित नहीं हो सकता।
विशेषज्ञों के लिए यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि टीबी के इलाज की सफलता को केवल दवा का कोर्स पूरा होने तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। मरीज की आगे की स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
शुरुआती छह महीने क्यों हैं अहम?
स्टडी में सामने आया कि टीबी दोबारा लौटने वाले मामलों में बीमारी की वापसी का समय काफी महत्वपूर्ण था। रिपोर्ट के अनुसार दोबारा टीबी सामने आने का मध्य समय इलाज पूरा होने के करीब छह महीने के भीतर था।
इसका मतलब यह है कि इलाज पूरा होने के बाद शुरुआती महीनों में मरीजों की स्थिति पर खास ध्यान देना उपयोगी हो सकता है।
अगर इस दौरान लगातार खांसी, बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना या अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें तो मरीज को डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
हालांकि इन लक्षणों का मतलब हमेशा टीबी की वापसी नहीं होता। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है।
घर के लोगों में भी मिला संक्रमण
इस अध्ययन का एक और महत्वपूर्ण पहलू मरीजों के घरेलू संपर्कों से जुड़ा है।
शोध में शामिल 3,309 घरेलू संपर्कों में लगभग 1 प्रतिशत लोगों में नए टीबी मामले सामने आए। इससे यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि टीबी से प्रभावित व्यक्ति के परिवार के सदस्यों की समय पर स्क्रीनिंग कितनी जरूरी है।
एक ही घर में लंबे समय तक रहने वाले लोगों में संक्रमण का जोखिम हो सकता है। इसलिए अगर परिवार में किसी व्यक्ति को टीबी होती है तो अन्य सदस्यों में भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच की जरूरत पड़ सकती है।
घर जाकर जांच करना ज्यादा प्रभावी?
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में दो अलग-अलग तरीकों की तुलना की।
पहला तरीका था फोन के जरिए मरीजों से संपर्क करना, जबकि दूसरा तरीका था स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा घर जाकर स्क्रीनिंग करना।
अध्ययन में फोन आधारित स्क्रीनिंग को एक व्यावहारिक और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले विकल्प के रूप में देखा गया। हालांकि घर जाकर की गई स्क्रीनिंग ने टीबी की दोबारा वापसी वाले मामलों को पहचानने में बेहतर प्रदर्शन किया।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर मरीज के घर स्वास्थ्यकर्मी को भेजना ही एकमात्र समाधान है। बल्कि मरीजों की संख्या, उपलब्ध संसाधन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
फोन से फॉलो-अप भी हो सकता है उपयोगी
भारत जैसे बड़े देश में हर टीबी मरीज के घर जाकर बार-बार स्क्रीनिंग करना संसाधनों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
ऐसे में फोन के जरिए फॉलो-अप एक उपयोगी विकल्प बन सकता है। स्वास्थ्यकर्मी मरीज से उसके लक्षणों के बारे में पूछ सकते हैं और अगर कोई चिंताजनक लक्षण सामने आए तो उसे आगे जांच के लिए बुलाया जा सकता है।
अध्ययन में फोन आधारित रणनीति को भी महत्वपूर्ण बताया गया है क्योंकि इसे बड़े स्तर पर लागू करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
टीबी सिर्फ बीमारी नहीं, इलाज के बाद भी चुनौती
टीबी से ठीक होने के बाद भी कुछ मरीजों में फेफड़ों की क्षमता और स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर रह सकता है।
नई स्टडी में मरीजों के लिए पोस्ट-टीबी केयर यानी इलाज पूरा होने के बाद स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
शोध में पोर्टेबल लंग फंक्शन टेस्ट का इस्तेमाल भी किया गया। इससे मरीजों के फेफड़ों की स्थिति को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
इस तरह की निगरानी केवल बीमारी दोबारा आने का पता लगाने के लिए नहीं, बल्कि इलाज के बाद मरीज के संपूर्ण स्वास्थ्य को समझने के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
टीबी के मरीजों को किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए?
टीबी के इलाज के बाद अगर किसी व्यक्ति में फिर से कुछ पुराने या नए लक्षण दिखाई दें तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
इनमें लंबे समय तक रहने वाली खांसी, बुखार, रात में पसीना आना, बिना कारण वजन कम होना, भूख कम लगना और लगातार कमजोरी जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं।
अगर किसी व्यक्ति को पहले टीबी हो चुकी है और बाद में ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि केवल लक्षणों के आधार पर टीबी की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए डॉक्टर आवश्यक जांच की सलाह दे सकते हैं।
क्या इसका मतलब है कि हर टीबी मरीज की बीमारी वापस आएगी?
बिल्कुल नहीं।
स्टडी में 7 प्रतिशत मरीजों में बीमारी दोबारा सामने आने का मतलब यह नहीं है कि इलाज पूरा करने वाले हर व्यक्ति को फिर से टीबी हो जाएगी।
इस आंकड़े का मतलब केवल इतना है कि एक महत्वपूर्ण हिस्से में इलाज के बाद भी बीमारी की वापसी का जोखिम देखा गया।
इसलिए मरीजों को डरने के बजाय चिकित्सकीय सलाह और फॉलो-अप को गंभीरता से लेना चाहिए।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां टीबी का बोझ काफी ज्यादा है। ऐसे में टीबी उन्मूलन की दिशा में सिर्फ नए मरीजों की पहचान और उपचार ही पर्याप्त नहीं है।
इलाज पूरा कर चुके मरीजों में बीमारी की वापसी और उनके घरेलू संपर्कों में संक्रमण की पहचान भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
अगर इलाज के बाद दोबारा होने वाले मामलों को शुरुआती चरण में पहचान लिया जाए तो मरीज को समय पर चिकित्सा सहायता मिल सकती है और संक्रमण के आगे फैलने की संभावना को भी कम करने में मदद मिल सकती है।
इसी वजह से शोधकर्ताओं ने पोस्ट-ट्रीटमेंट सर्विलांस को नियमित टीबी देखभाल का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
मरीज खुद से दवा शुरू न करें
अगर किसी व्यक्ति में इलाज पूरा होने के बाद टीबी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं तो उसे अपने स्तर पर पुरानी दवाएं दोबारा शुरू नहीं करनी चाहिए।
टीबी की दवाएं डॉक्टर की निगरानी में ही ली जानी चाहिए। गलत तरीके से दवा लेने या बीच में इलाज छोड़ने से कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
किसी भी संदिग्ध लक्षण की स्थिति में मरीज को स्वास्थ्य केंद्र या डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
परिवार के सदस्यों को भी रहना चाहिए सतर्क
अगर घर में किसी व्यक्ति को टीबी हो चुकी है तो परिवार के दूसरे सदस्यों को भी लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए।
लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना या कमजोरी जैसी समस्या होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।
खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से कमजोर स्वास्थ्य वाले लोगों के मामले में लापरवाही नहीं करनी चाहिए।
पुणे में हुई इस स्टडी ने टीबी को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है—इलाज पूरा होना बेहद जरूरी है, लेकिन कुछ मरीजों के लिए इलाज खत्म होने के बाद की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो सकती है।
अध्ययन में 1,076 टीबी सर्वाइवर्स और 3,309 घरेलू संपर्कों को 18 महीने तक फॉलो किया गया। इसमें करीब 7 प्रतिशत टीबी सर्वाइवर्स में बीमारी दोबारा सामने आई, जबकि घरेलू संपर्कों में भी नए संक्रमण पाए गए।
रिसर्च ने यह भी संकेत दिया कि बीमारी दोबारा लौटने वाले मामलों की पहचान के लिए इलाज के बाद शुरुआती महीनों में विशेष निगरानी उपयोगी हो सकती है। घर जाकर स्क्रीनिंग ने दोबारा टीबी के मामलों की पहचान में बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि फोन आधारित फॉलो-अप को बड़े स्तर पर लागू करने के लिहाज से व्यावहारिक विकल्प माना गया।
इस स्टडी का सबसे बड़ा संदेश मरीजों के लिए यही है कि टीबी का इलाज पूरा करने के बाद भी अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें। अगर बीमारी से जुड़े लक्षण दोबारा दिखाई दें तो समय पर डॉक्टर से संपर्क करें। वहीं परिवार के सदस्यों को भी जरूरत पड़ने पर जांच और चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।
टीबी से लड़ाई सिर्फ दवा का कोर्स पूरा करने तक सीमित नहीं है—इलाज के बाद सही निगरानी और समय पर जांच भी इस लड़ाई का अहम हिस्सा हो सकती है।

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