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गर्मी बढ़ी तो बदलेगा बीमारियों का नक्शा! मच्छर-टिक अब नए इलाकों में पहुंच रहे, इन खतरनाक संक्रमणों ने बढ़ाई टेंशन



नई दिल्ली: दुनिया में बढ़ते तापमान का असर अब केवल मौसम, बारिश और गर्मी तक सीमित नहीं रह गया है। इसका प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर भी तेजी से दिखाई दे रहा है। खासकर मच्छरों और टिक जैसे रोग फैलाने वाले जीवों के फैलाव और उनके सक्रिय रहने वाले क्षेत्रों में बदलाव को लेकर विशेषज्ञों की चिंता बढ़ रही है। ताजा जानकारी के मुताबिक, गर्म होती जलवायु के कारण टिक-बॉर्न एन्सेफलाइटिस (TBE) और चिकनगुनिया जैसे संक्रमण नए भौगोलिक क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यूरोप के कुछ हिस्सों में गर्म तापमान और हल्की सर्दियों के कारण उन इलाकों का विस्तार हो रहा है, जहां टिक से फैलने वाली बीमारी TBE का जोखिम मौजूद है। इसी तरह मच्छरों से फैलने वाला चिकनगुनिया भी यूरोप और दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में चिंता का विषय बन रहा है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर गर्म मौसम में किसी बीमारी का प्रकोप निश्चित रूप से बढ़ जाएगा। बीमारी का प्रसार तापमान के अलावा मच्छरों और टिक की आबादी, बारिश, पानी की उपलब्धता, लोगों की आवाजाही, स्वास्थ्य व्यवस्था और कई अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

आखिर क्यों बढ़ रहा है इन बीमारियों का खतरा?

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में औसत तापमान बढ़ रहा है। इसके साथ मौसम के पैटर्न में भी बदलाव हो रहा है।

मच्छर और टिक जैसे जीव अपने वातावरण के तापमान और नमी से काफी प्रभावित होते हैं। अगर किसी ऐसे क्षेत्र में तापमान बढ़ता है जहां पहले ठंड के कारण इन जीवों का जीवन चक्र सीमित था, तो वहां उनके लिए ज्यादा अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।

इसी तरह अगर सर्दियां अपेक्षाकृत छोटी और कम ठंडी होती हैं तो टिक लंबे समय तक सक्रिय रह सकते हैं। यूरोप में TBE को लेकर यही चिंता सामने आई है।

विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी जलवायु परिवर्तन को वेक्टर-बोर्न यानी मच्छर और अन्य जीवों से फैलने वाली बीमारियों के बदलते जोखिम से जोड़ते रहे हैं।

TBE क्या है?

टिक-बॉर्न एन्सेफलाइटिस यानी TBE एक वायरल संक्रमण है, जो संक्रमित टिक के काटने से इंसानों में पहुंच सकता है।

यह बीमारी मुख्य रूप से यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में पाई जाती रही है। संक्रमण कई लोगों में हल्के लक्षण पैदा कर सकता है, लेकिन कुछ मामलों में यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है।

गंभीर मामलों में दिमाग या उसकी झिल्लियों में सूजन जैसी समस्या हो सकती है। यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में यह बीमारी मौजूद है, वहां इसके प्रति जागरूकता और बचाव महत्वपूर्ण माना जाता है।

जर्मनी में भी बढ़ रहा जोखिम

यूरोप में TBE के भौगोलिक विस्तार को लेकर चिंता बढ़ रही है। जर्मनी में दक्षिणी हिस्सों में पारंपरिक रूप से पाए जाने वाला यह संक्रमण अब धीरे-धीरे दूसरे क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है।

2025 में जर्मनी में TBE के 693 मामले दर्ज किए गए, जो 2001 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद तीसरा सबसे ज्यादा वार्षिक आंकड़ा था।

इसके बाद जर्मनी में बीमारी के जोखिम वाले नए क्षेत्रों को भी चिन्हित किया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक बढ़ते तापमान और हल्की सर्दियों से टिक की आबादी तथा उनके सक्रिय रहने की अवधि प्रभावित हो सकती है।

चिकनगुनिया भी पहुंच रहा नए इलाकों में

दूसरी बड़ी चिंता चिकनगुनिया को लेकर है।

चिकनगुनिया वायरस मुख्य रूप से संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है। यह बीमारी तेज बुखार और खासकर जोड़ों में गंभीर दर्द के लिए जानी जाती है।

चिकनगुनिया लंबे समय से एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में पाया जाता रहा है। लेकिन अब यूरोप में भी इसके स्थानीय संक्रमण की घटनाएं सामने आ रही हैं।

इटली और फ्रांस जैसे देशों में स्थानीय स्तर पर संक्रमण के मामले सामने आने के बाद इस बीमारी को लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों की निगरानी बढ़ी है।

मच्छरों के लिए तापमान क्यों है महत्वपूर्ण?

मच्छरों से फैलने वाले वायरस के लिए तापमान महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कारकों में से एक है।

मच्छरों का जीवन चक्र, उनकी सक्रियता और उनके शरीर में वायरस के विकसित होने की क्षमता तापमान से प्रभावित हो सकती है। इसलिए तापमान में बदलाव किसी क्षेत्र में बीमारी के संक्रमण की संभावनाओं को भी प्रभावित कर सकता है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल तापमान बढ़ने से बीमारी अपने आप फैल जाएगी। इसके लिए मच्छरों की मौजूदगी, संक्रमित व्यक्ति या वायरस की उपलब्धता और उपयुक्त पर्यावरणीय परिस्थितियां भी जरूरी होती हैं।

अत्यधिक गर्मी से कुछ जगह मच्छरों की संख्या घट भी सकती है

जलवायु परिवर्तन की तस्वीर हमेशा एक जैसी नहीं होती।

कुछ इलाकों में अत्यधिक गर्मी और सूखे के कारण मच्छरों की संख्या अस्थायी रूप से कम भी हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि बहुत ज्यादा गर्मी और पानी की कमी मच्छरों के प्रजनन के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कर सकती है।

लेकिन इसे स्थायी राहत नहीं माना जा सकता।

बारिश होने और तापमान सामान्य होने के बाद मच्छरों की संख्या फिर बढ़ सकती है। इसलिए मौसम के अलग-अलग पैटर्न बीमारी के जोखिम को अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर सकते हैं।

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है यह बदलाव

भारत पहले से ही डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों से जूझता रहा है।

ऐसे में जलवायु परिवर्तन और वेक्टर-बोर्न बीमारियों के बीच संबंध भारत के लिए भी महत्वपूर्ण विषय है।

गर्म तापमान, बारिश के पैटर्न में बदलाव, शहरी जलभराव और अनियोजित शहरीकरण जैसी परिस्थितियां मच्छरों के प्रजनन के लिए उपयुक्त वातावरण बना सकती हैं।

हालांकि किसी खास बीमारी के मामलों में भविष्य में कितना बदलाव होगा, इसका अनुमान केवल तापमान के आधार पर नहीं लगाया जा सकता।

भारत में अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में मौसम तथा मच्छरों की प्रजातियों की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए स्थानीय निगरानी और समय पर बीमारी की पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

जलवायु परिवर्तन सिर्फ संक्रमण नहीं बढ़ाता

जलवायु परिवर्तन का स्वास्थ्य पर असर इससे कहीं ज्यादा व्यापक है।

बदलता मौसम साफ हवा, सुरक्षित पानी, पर्याप्त भोजन और सुरक्षित रहने की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ गर्मी की लहरें, बाढ़, तूफान, संक्रामक रोग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।

इसका मतलब है कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल अस्पताल और दवाओं तक सीमित रखने के बजाय मौसम और पर्यावरणीय बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा।

यात्रियों के लिए क्यों जरूरी है सावधानी?

जब कोई व्यक्ति ऐसे क्षेत्र में यात्रा करता है जहां किसी विशेष मच्छर या टिक से फैलने वाली बीमारी का जोखिम मौजूद है, तो उसे स्थानीय स्वास्थ्य सलाह की जानकारी रखनी चाहिए।

जंगल, घास वाले क्षेत्रों या टिक वाले इलाकों में जाने पर शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना और उचित टिक-रोधी उपायों का इस्तेमाल मददगार हो सकता है।

मच्छर जनित बीमारियों वाले क्षेत्रों में मच्छररोधी उपाय, पूरी बांह के कपड़े और आसपास पानी जमा न होने देना महत्वपूर्ण हो सकता है।

किसी भी बीमारी के लिए व्यक्तिगत बचाव के तरीके स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों और डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपनाने चाहिए।

वैक्सीन की भूमिका भी बढ़ेगी?

कुछ संक्रमणों के लिए वैक्सीन उपलब्ध हैं। TBE के खिलाफ वैक्सीन कई जोखिम वाले क्षेत्रों में इस्तेमाल की जाती है।

चिकनगुनिया के खिलाफ भी वैक्सीन के क्षेत्र में प्रगति हुई है। हाल के वर्षों में इसके लिए वैक्सीन को लेकर कई महत्वपूर्ण विकास हुए हैं।

हालांकि किसी व्यक्ति को वैक्सीन की जरूरत है या नहीं, यह उसके रहने के स्थान, यात्रा, उम्र, स्वास्थ्य और जोखिम जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए वैक्सीन को लेकर डॉक्टर या आधिकारिक स्वास्थ्य सलाह का पालन करना चाहिए।

सिर्फ बीमारी आने के बाद इलाज काफी नहीं

बदलते मौसम के दौर में स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल मरीजों का इलाज करना नहीं, बल्कि बीमारी के फैलने से पहले उसका अनुमान लगाना भी है।

मच्छरों और टिक की आबादी पर निगरानी, बीमारी के मामलों की शुरुआती पहचान, मौसम संबंधी डेटा का इस्तेमाल और स्वास्थ्य विभागों के बीच बेहतर समन्वय भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

अगर किसी क्षेत्र में तापमान, बारिश और मच्छरों की संख्या में बदलाव के साथ संक्रमण के मामले भी बढ़ने लगें तो शुरुआती चेतावनी प्रणाली स्वास्थ्य अधिकारियों को तेजी से कार्रवाई करने में मदद कर सकती है।

आम लोगों को क्या सावधानी रखनी चाहिए?

मच्छर और टिक से फैलने वाली बीमारियों से बचने के लिए कुछ सामान्य सावधानियां अपनाई जा सकती हैं।

घर और आसपास पानी जमा न होने दें। मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी या रिपेलेंट का इस्तेमाल किया जा सकता है। बाहर जाते समय शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना भी उपयोगी हो सकता है।

अगर किसी क्षेत्र में टिक का खतरा ज्यादा है तो घास और झाड़ियों वाले इलाकों से लौटने के बाद शरीर और कपड़ों की जांच करना उपयोगी हो सकता है।

बुखार, तेज जोड़ों का दर्द, सिरदर्द, कमजोरी या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। खुद से दवा लेना या किसी वायरल पोस्ट के आधार पर इलाज शुरू करना उचित नहीं है।

विशेषज्ञों के लिए भी बढ़ी चुनौती

जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सामने एक नई चुनौती यह है कि जिन बीमारियों को पहले कुछ खास भौगोलिक क्षेत्रों तक सीमित माना जाता था, उनका जोखिम दूसरे इलाकों में भी बदल सकता है।

इसलिए स्वास्थ्य विभागों को केवल पुराने बीमारी पैटर्न पर निर्भर रहने के बजाय मौसम, पर्यावरण और बीमारी के आंकड़ों को एक साथ देखने की जरूरत होगी।

भारत जैसे विशाल देश में यह चुनौती और बड़ी है क्योंकि एक ही समय में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रकार के मौसम और संक्रमण देखने को मिल सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के बीच संबंध अब तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। गर्म होती जलवायु और बदलते मौसम के कारण TBE जैसे टिक-जनित संक्रमण नए क्षेत्रों में फैल सकते हैं, जबकि चिकनगुनिया जैसे मच्छर जनित वायरस भी ऐसे क्षेत्रों में दिखाई दे सकते हैं जहां पहले इनका जोखिम सीमित था।

जर्मनी में 2025 के दौरान 693 TBE मामले सामने आना और बीमारी के जोखिम वाले नए क्षेत्रों का चिन्हित होना इस बदलते पैटर्न का एक उदाहरण है। वहीं यूरोप में चिकनगुनिया के स्थानीय संक्रमण की घटनाएं भी निगरानी की जरूरत को रेखांकित करती हैं।

हालांकि इन घटनाओं का मतलब यह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हर जगह बीमारी का प्रकोप निश्चित रूप से बढ़ जाएगा। बीमारी का वास्तविक जोखिम तापमान के साथ-साथ मच्छरों और टिक की मौजूदगी, बारिश, पानी, लोगों की आवाजाही और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।

फिर भी बदलता मौसम स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। भविष्य में बीमारी से लड़ने के लिए सिर्फ अस्पताल और दवाएं नहीं, बल्कि मौसम की निगरानी, मच्छर-टिक नियंत्रण, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और लोगों में जागरूकता भी उतनी ही जरूरी होगी।

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