मोटापे को लेकर अचानक बदले इलाज के नियम! 78 एक्सपर्ट्स की बड़ी सलाह, अब हर मरीज के लिए नहीं चलेगा एक ही फॉर्मूला
नई दिल्ली: भारत में बढ़ते मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों के बीच विशेषज्ञों ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। भारतीय विशेषज्ञ संस्थाओं ने मिलकर मोटापा प्रबंधन को लेकर नई संयुक्त विशेषज्ञ सहमति जारी की है। इसमें भारत की परिस्थितियों और यहां की आबादी की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए मोटापे की पहचान, रोकथाम, इलाज और लंबे समय तक निगरानी के लिए दिशा-निर्देश दिए गए हैं।
नई सहमति तैयार करने की प्रक्रिया में 78 विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इसमें मोटापे की रोकथाम से लेकर इलाज तक कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई है। दस्तावेज में 8 प्रमुख मॉड्यूल के तहत 55 सिफारिशें शामिल की गई हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि विशेषज्ञों ने मोटापे को केवल ज्यादा वजन या व्यक्ति की इच्छाशक्ति की कमी के रूप में देखने के बजाय इसे एक दीर्घकालिक गैर-संचारी बीमारी के रूप में देखने पर जोर दिया है। साथ ही उपचार को मरीज की व्यक्तिगत जरूरतों, स्वास्थ्य स्थिति और भारतीय आबादी की शारीरिक विशेषताओं के अनुसार तय करने की बात कही गई है।
भारत में मोटापा क्यों बन रहा है बड़ी स्वास्थ्य चुनौती?
मोटापा अब केवल शरीर का वजन बढ़ने की समस्या नहीं रह गया है। इसके साथ टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर और दूसरी मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा भी जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय आबादी में पश्चिमी देशों की तुलना में कम BMI पर भी शरीर में फैट का प्रतिशत ज्यादा हो सकता है। इसका मतलब यह है कि केवल वजन या BMI देखकर किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य जोखिम का पूरा अंदाजा लगाना हमेशा पर्याप्त नहीं हो सकता।
यही कारण है कि भारत में मोटापे की पहचान और इलाज के लिए देश-विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
78 विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार की सिफारिशें
नई गाइडलाइन की खास बात इसका व्यापक विशेषज्ञ समूह है। कुल 78 विशेषज्ञों ने इस प्रक्रिया में भाग लिया।
विशेषज्ञों ने मोटापा प्रबंधन से जुड़े अलग-अलग प्रस्तावों पर चर्चा की और फिर सहमति के आधार पर अंतिम सिफारिशों को तैयार किया।
कई चरणों की समीक्षा के बाद अंतिम दस्तावेज में 55 सिफारिशों को शामिल किया गया। इसमें मोटापे की पहचान, रोकथाम, जीवनशैली में बदलाव, दवाओं, एंडोस्कोपिक उपचार, सर्जरी और फॉलो-अप जैसे विषय शामिल हैं।
मोटापा सिर्फ ‘ज्यादा खाने’ की समस्या नहीं
मोटापे को लेकर समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि व्यक्ति कम खाना शुरू कर दे और ज्यादा व्यायाम करे तो वजन कम हो जाएगा।
हालांकि विशेषज्ञ अब इस समस्या को ज्यादा व्यापक नजरिए से देखने की सलाह दे रहे हैं।
मोटापा कई जैविक, सामाजिक, पर्यावरणीय और जीवनशैली से जुड़े कारकों से प्रभावित हो सकता है। इसलिए हर मरीज के लिए एक जैसा इलाज काम करे, यह जरूरी नहीं है।
इसी वजह से नई विशेषज्ञ सहमति में मरीज के अनुसार व्यक्तिगत उपचार पर जोर दिया गया है।
अब इलाज में सिर्फ डाइट और एक्सरसाइज ही नहीं
वजन कम करने के लिए खान-पान और शारीरिक गतिविधि निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। लेकिन नई विशेषज्ञ सहमति मोटापे के इलाज को केवल इन्हीं दो चीजों तक सीमित नहीं रखती।
जरूरत के अनुसार जीवनशैली में बदलाव के साथ मोटापा प्रबंधन की दवाएं, एंडोस्कोपिक उपचार और मेटाबॉलिक या बैरिएट्रिक सर्जरी जैसे विकल्प भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को दवा या सर्जरी की जरूरत होगी। उपचार का चुनाव व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और डॉक्टर की सलाह के आधार पर किया जाना चाहिए।
मरीज के हिसाब से तय होगा इलाज
नई गाइडलाइन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि मोटापे का इलाज एक ही फॉर्मूले से सभी मरीजों के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
किसी व्यक्ति का वजन, कमर की परिधि, मेटाबॉलिक स्वास्थ्य, पहले से मौजूद बीमारियां, जीवनशैली और उपचार के प्रति प्रतिक्रिया जैसी कई चीजों को ध्यान में रखना जरूरी हो सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों ने individualized therapy पर जोर दिया है।
इसका उद्देश्य केवल वजन घटाना नहीं बल्कि मरीज के संपूर्ण स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है।
मोटापे को लेकर शर्मिंदगी नहीं, इलाज की जरूरत
मोटापे से जूझ रहे लोगों को अक्सर सामाजिक और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है। कई बार उन्हें केवल उनकी जीवनशैली या इच्छाशक्ति के आधार पर जज किया जाता है।
नई विशेषज्ञ सोच में इसके बजाय मोटापे को एक वास्तविक स्वास्थ्य समस्या के रूप में देखने और मरीज के साथ बिना भेदभाव के व्यवहार करने पर जोर दिया गया है।
ऐसे दृष्टिकोण से मरीजों को इलाज लेने और लंबे समय तक डॉक्टर की सलाह का पालन करने में मदद मिल सकती है।
भारतीय शरीर की बनावट को ध्यान में रखना क्यों जरूरी?
भारत में मोटापे का पैटर्न कई पश्चिमी आबादियों से अलग हो सकता है। भारतीय लोगों में अपेक्षाकृत कम BMI पर भी पेट के आसपास फैट और मेटाबॉलिक जोखिम देखने को मिल सकते हैं।
यही वजह है कि भारत के लिए तैयार की गई नई विशेषज्ञ सहमति में भारतीय BMI और शरीर से जुड़े मापदंडों को ध्यान में रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
अगर किसी देश में बीमारी का पैटर्न अलग है तो उसकी पहचान और उपचार की रणनीति भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार होना जरूरी है।
मोटापा और डायबिटीज का संबंध
भारत पहले से ही डायबिटीज के बढ़ते बोझ से जूझ रहा है। मोटापा और खासकर पेट के आसपास जमा अतिरिक्त फैट इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज जैसे मेटाबॉलिक जोखिमों से जुड़ा हुआ है।
इसीलिए मोटापे को नियंत्रित करना केवल वजन कम करने का मामला नहीं है। यह लंबे समय में डायबिटीज, हृदय रोग और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
दवाओं की भूमिका भी बढ़ रही है
पिछले कुछ वर्षों में मोटापा प्रबंधन के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है। वजन कम करने वाली कुछ आधुनिक दवाओं ने मोटापा उपचार को लेकर चर्चा को और बढ़ाया है।
हालांकि किसी भी वजन घटाने वाली दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।
हर दवा हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसके अलावा कुछ दवाओं के साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं। इसलिए डॉक्टर द्वारा मरीज की स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन करने के बाद ही किसी दवा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
सर्जरी कब हो सकती है विकल्प?
कुछ मरीजों में गंभीर मोटापे के साथ ऐसी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं जिनमें केवल जीवनशैली में बदलाव पर्याप्त नहीं होता।
ऐसे मामलों में मेटाबॉलिक और बैरिएट्रिक सर्जरी उपचार का विकल्प हो सकती है।
लेकिन सर्जरी को सामान्य वजन घटाने की प्रक्रिया समझना गलत होगा। इसके लिए मरीज का विस्तृत चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी होता है।
किसी भी व्यक्ति को सर्जरी की जरूरत है या नहीं, इसका निर्णय विशेषज्ञ डॉक्टर ही कर सकते हैं।
लंबे समय तक निगरानी भी जरूरी
वजन कम होने के बाद भी मोटापे का इलाज खत्म नहीं हो जाता। वजन दोबारा बढ़ने की संभावना बनी रह सकती है और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति की निगरानी जरूरी हो सकती है।
इसलिए मोटापा प्रबंधन में monitoring और follow-up महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मरीज की प्रगति, वजन में बदलाव, मेटाबॉलिक स्वास्थ्य और उपचार के प्रभावों की समय-समय पर समीक्षा करना जरूरी हो सकता है।
सिर्फ वजन घटाना लक्ष्य नहीं
विशेषज्ञों की नई सोच में मोटापा प्रबंधन का उद्देश्य केवल तराजू पर दिखाई देने वाली संख्या कम करना नहीं है।
बेहतर स्वास्थ्य, डायबिटीज और हृदय रोग जैसे जोखिमों को कम करना, शारीरिक क्षमता में सुधार और जीवन की गुणवत्ता बेहतर करना भी उपचार के महत्वपूर्ण लक्ष्य हो सकते हैं।
इसीलिए मोटापे को लंबे समय तक प्रबंधित करने के लिए जीवनशैली, चिकित्सा उपचार और नियमित निगरानी को साथ लेकर चलने की जरूरत है।
आम लोगों के लिए क्या संदेश है?
अगर किसी व्यक्ति का वजन लगातार बढ़ रहा है, कमर की परिधि बढ़ रही है या उसके साथ हाई BP, डायबिटीज या फैटी लिवर जैसी समस्याएं हैं, तो इसे केवल कॉस्मेटिक समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
डॉक्टर से सलाह लेकर वजन, BMI, कमर की परिधि और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों का मूल्यांकन कराया जा सकता है।
इसके साथ संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और लंबे समय तक टिकाऊ जीवनशैली में बदलाव मोटापा प्रबंधन के महत्वपूर्ण हिस्से बने रहेंगे।
क्या हर मोटे व्यक्ति को दवा की जरूरत होगी?
ऐसा बिल्कुल नहीं है। मोटापे का इलाज व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और जोखिम के आधार पर तय किया जाना चाहिए।
किसी व्यक्ति के लिए केवल जीवनशैली में बदलाव पर्याप्त हो सकता है, जबकि किसी दूसरे मरीज को डॉक्टर की निगरानी में दवा या अन्य उपचार की जरूरत पड़ सकती है।
इसी तरह गंभीर मोटापे और संबंधित बीमारियों वाले कुछ मरीजों में सर्जरी पर भी विचार किया जा सकता है।
इसलिए सोशल मीडिया पर देखकर खुद से वजन घटाने वाली दवाएं लेना या कोई कठोर डाइट शुरू करना उचित नहीं है।
भारत में मोटापे की बढ़ती समस्या के बीच 78 विशेषज्ञों की भागीदारी से तैयार नई संयुक्त विशेषज्ञ सहमति को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसमें 8 प्रमुख मॉड्यूल के तहत 55 सिफारिशें शामिल हैं।
इन सिफारिशों में मोटापे की पहचान, रोकथाम, जीवनशैली में बदलाव, दवाएं, एंडोस्कोपिक उपचार, सर्जरी और लंबे समय तक निगरानी जैसे कई पहलुओं को शामिल किया गया है।
सबसे अहम बात यह है कि विशेषज्ञों ने मोटापे को केवल वजन या इच्छाशक्ति की समस्या मानने के बजाय एक दीर्घकालिक बीमारी के रूप में देखने और मरीज की जरूरत के अनुसार व्यक्तिगत उपचार अपनाने पर जोर दिया है।
हालांकि किसी व्यक्ति को कौन-सा उपचार चाहिए, यह उसकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करेगा। इसलिए वजन घटाने वाली दवाएं, डाइट प्लान या सर्जरी अपने आप शुरू करने के बजाय योग्य डॉक्टर से उचित सलाह लेना जरूरी है।
भारत में मोटापा तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती बन रहा है और नई विशेषज्ञ सहमति का लक्ष्य इसी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ज्यादा व्यवस्थित और मरीज-केंद्रित उपचार व्यवस्था को बढ़ावा देना है।

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