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खत्म होने जा रही रूस-यूक्रेन जंग! 4 देशों ने भेजा प्रस्ताव, भारत के प्रपोजल पर कीव राजी



नई दिल्ली। रूस और यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी युद्ध को खत्म करने की कोशिशों में भारत की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। यूक्रेन ने कहा है कि उसे युद्धविराम और तनाव कम करने के लिए चार देशों से प्रस्ताव मिले हैं, जिनमें भारत, अमेरिका, तुर्किये और मिस्र शामिल हैं। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने भारत के प्रस्ताव को इन चार पहलों में सबसे व्यापक बताया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने पहली बार इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने की इच्छा का संकेत दिया है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान निकालने के लिए अलग-अलग स्तर पर कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। यूक्रेन का कहना है कि वह ऊर्जा क्षेत्र और ब्लैक सी में युद्धविराम के प्रस्ताव पर विचार करने को तैयार है। साथ ही कीव ने लाइन ऑफ कॉन्टैक्ट यानी अग्रिम मोर्चे पर बिना शर्त युद्धविराम की संभावना पर भी अपनी तैयारी जाहिर की है। हालांकि किसी भी व्यापक समझौते के लिए रूस की सहमति और दोनों पक्षों के बीच ठोस बातचीत जरूरी होगी।

चार देशों के प्रस्तावों में भारत की पहल सबसे व्यापक

यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने हालिया प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि इस समय चार प्रस्तावों पर चर्चा चल रही है। इनमें भारत का प्रस्ताव, अमेरिका का प्रस्ताव, तुर्किये की पहल और मिस्र की पहल शामिल हैं।

सिबिहा के मुताबिक, भारत का प्रस्ताव सबसे व्यापक है। उनके अनुसार भारत ने पहली बार इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाने की इच्छा जताई है। हालांकि भारत की ओर से सार्वजनिक रूप से प्रस्ताव की पूरी विस्तृत रूपरेखा सामने नहीं रखी गई है, लेकिन यूक्रेन के बयान से संकेत मिलता है कि इसमें ऊर्जा और ब्लैक सी से जुड़े मुद्दों को एक साथ देखने की कोशिश की गई है।

यूक्रेन के अनुसार, उसका रुख यह है कि अगर ऊर्जा क्षेत्र और ब्लैक सी से संबंधित युद्धविराम पर कोई सहमति बनती है तो दोनों हिस्सों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक जुड़े हुए पैकेज के रूप में देखा जाना चाहिए।

ऊर्जा और बंदरगाहों पर हमले रोकने की मांग

यूक्रेन के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि केवल युद्ध के मैदान में गोलीबारी रोकना पर्याप्त नहीं होगा। कीव चाहता है कि किसी ऊर्जा युद्धविराम में ऊर्जा प्रतिष्ठानों के साथ-साथ बंदरगाहों और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले भी रोके जाएं।

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युद्ध के दौरान ऊर्जा और परिवहन से जुड़ा बुनियादी ढांचा लगातार प्रभावित हुआ है। यूक्रेन के लिए बिजली उत्पादन, ऊर्जा आपूर्ति और बंदरगाहों की सुरक्षा घरेलू अर्थव्यवस्था के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी महत्वपूर्ण है।

सिबिहा ने कहा कि यूक्रेन ऊर्जा और ब्लैक सी युद्धविराम के लिए तैयार है, लेकिन दोनों को एक साथ जोड़कर देखना चाहता है। इसके अलावा कीव ने लाइन ऑफ कॉन्टैक्ट पर बिना शर्त युद्धविराम के विकल्प पर भी विचार करने की बात कही है।

तुर्किये और मिस्र का फोकस ब्लैक सी और अनाज पर

यूक्रेन के मुताबिक, तुर्किये और मिस्र की ओर से भी ब्लैक सी में युद्धविराम से जुड़े प्रस्ताव सामने आए हैं। इन पहलों का मुख्य उद्देश्य समुद्री मार्गों को सुरक्षित बनाना और यूक्रेनी अनाज के निर्यात के लिए परिस्थितियां बेहतर करना है।

ब्लैक सी यूक्रेन के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र है। युद्ध के कारण यहां व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और अनाज निर्यात को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी रही हैं। यूक्रेन से होने वाला अनाज निर्यात दुनिया के कई देशों की खाद्य आपूर्ति से जुड़ा है।

मिस्र के लिए भी यूक्रेनी अनाज की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। इसलिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा और खाद्य आपूर्ति को लेकर किसी भी युद्धविराम पहल का व्यापक अंतरराष्ट्रीय असर हो सकता है।

अमेरिका का प्रस्ताव ऊर्जा युद्धविराम पर केंद्रित

चार प्रस्तावों में अमेरिका की पहल भी शामिल है। यूक्रेन के विदेश मंत्री के अनुसार अमेरिकी प्रस्ताव का मुख्य फोकस ऊर्जा क्षेत्र पर हमले रोकने से जुड़ा है।

ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने की चर्चा रूस-यूक्रेन युद्ध में पहले भी कूटनीतिक प्रयासों का हिस्सा रही है। अमेरिका की पहल पर यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बातचीत के दौरान भी चर्चा होने की जानकारी सामने आई है।

इस तरह चारों प्रस्तावों में कुछ समान मुद्दे दिखाई देते हैं, लेकिन उनके दायरे अलग हैं। तुर्किये और मिस्र का जोर समुद्री और अनाज से जुड़े मुद्दों पर है, जबकि अमेरिका की पहल ऊर्जा क्षेत्र पर केंद्रित है। भारत के प्रस्ताव को यूक्रेन ने इन मुद्दों को व्यापक रूप से जोड़ने वाली पहल बताया है।

जेलेंस्की और पुतिन की बैठक को भी माना जा रहा अहम

यूक्रेन के विदेश मंत्री ने कहा है कि युद्धविराम किसी संभावित बैठक के परिणामों में से एक हो सकता है। उन्होंने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच संभावित बातचीत का भी उल्लेख किया।

हालांकि दोनों पक्षों के बीच किसी व्यापक राजनीतिक समझौते के लिए कई गंभीर मुद्दों पर सहमति जरूरी होगी। युद्धविराम की शर्तें, कब्जे वाले क्षेत्रों का सवाल, सुरक्षा गारंटी और भविष्य की व्यवस्था जैसे मुद्दे किसी भी बातचीत को जटिल बना सकते हैं।

इसलिए केवल किसी एक क्षेत्र में सीमित युद्धविराम और व्यापक शांति समझौते के बीच अंतर करना जरूरी है। मौजूदा प्रस्तावों को तत्काल युद्ध समाप्ति के अंतिम समझौते के रूप में नहीं देखा जा सकता। फिलहाल ये कूटनीतिक विकल्प और संभावित युद्धविराम के रास्ते हैं।

भारत लंबे समय से बातचीत की वकालत करता रहा है

भारत रूस और यूक्रेन दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान की बात करता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस और यूक्रेन के नेताओं के साथ अपनी बातचीत में युद्ध को बातचीत और कूटनीति के जरिए समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी कई मौकों पर कह चुके हैं कि भारत दोनों पक्षों के संपर्क में है और ऐसे रास्ते तलाशने की कोशिश करता है जिनसे संघर्ष को कम करने और समाधान की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिल सके।

सितंबर में जयशंकर और यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा की मुलाकात में भी शांति प्रयासों, ब्लैक सी की स्थिति और वैश्विक खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, सिबिहा ने उस बैठक में ब्लैक सी में नौवहन की स्वतंत्रता बहाल करने को वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया और भारत की भागीदारी को महत्व दिया।

ब्लैक सी क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?

रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी का महत्व केवल सैन्य दृष्टि से नहीं है। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार, अनाज निर्यात और समुद्री परिवहन के लिए भी महत्वपूर्ण है।

यूक्रेन दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादक और अनाज निर्यातकों में शामिल रहा है। इसलिए ब्लैक सी में सुरक्षित समुद्री रास्ते बहाल होने से यूक्रेनी कृषि उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच प्रभावित हो सकती है। इसका असर उन देशों पर भी पड़ सकता है जो खाद्य आयात के लिए इस क्षेत्र से होने वाले निर्यात पर निर्भर हैं।

इसी वजह से भारत सहित कई देशों की कूटनीतिक कोशिशों में ब्लैक सी की सुरक्षित नौवहन व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को महत्व दिया जा रहा है।

अब रूस के जवाब पर टिकी नजर

यूक्रेन की ओर से भारत के प्रस्ताव को व्यापक बताए जाने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल रूस की प्रतिक्रिया का है। किसी भी युद्धविराम व्यवस्था को लागू करने के लिए रूस और यूक्रेन दोनों की सहमति आवश्यक होगी।

हाल की रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि युद्ध के बीच रूस और यूक्रेन के बीच हमले जारी हैं। ऐसे माहौल में किसी सीमित या क्षेत्रीय युद्धविराम को व्यापक समझौते में बदलना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हालिया टिप्पणी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों और युद्ध समाप्त करने के प्रयासों का सकारात्मक उल्लेख किया है। यूक्रेन की ओर से भारत की पहल को व्यापक बताना और रूस की ओर से मोदी के प्रयासों का उल्लेख करना इस पूरे घटनाक्रम को कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।

क्या भारत मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा?

फिलहाल भारत की भूमिका को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यूक्रेन के विदेश मंत्री का यह बयान है कि नई दिल्ली ने पहली बार सक्रिय भूमिका निभाने की इच्छा का संकेत दिया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत औपचारिक रूप से युद्ध का मध्यस्थ बन चुका है। अभी प्रस्तावों पर चर्चा और विभिन्न पक्षों के बीच कूटनीतिक संपर्क जारी है।

भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह रूस और यूक्रेन दोनों के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल किस तरह बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए करता है। दूसरी ओर, किसी भी पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों युद्धरत पक्ष किन शर्तों पर सहमत होते हैं।

फिलहाल रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हैं। भारत, अमेरिका, तुर्किये और मिस्र के अलग-अलग प्रस्ताव सामने आने के बाद अब चर्चा केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा, ब्लैक सी में नौवहन, अनाज निर्यात और अग्रिम मोर्चे पर युद्धविराम जैसे मुद्दे एक साथ बातचीत के केंद्र में आ गए हैं।

भारत के प्रस्ताव को यूक्रेन द्वारा सबसे व्यापक बताए जाने के बाद नई दिल्ली की कूटनीतिक भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय नजरें और बढ़ गई हैं। हालांकि आगे की दिशा रूस की प्रतिक्रिया, यूक्रेन की शर्तों और संभावित उच्चस्तरीय बातचीत पर निर्भर करेगी। अभी इसे युद्ध समाप्ति की घोषणा नहीं, बल्कि संभावित शांति प्रक्रिया की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।

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