“एक कचौड़ी, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा” पर शिवराज का बड़ा सवाल, बोले- आखिर बेटियों को ऐसा नारा लगाने की नौबत क्यों आई?
भोपाल। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया और सार्वजनिक प्रदर्शनों में चर्चा में आए नारे “एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा” पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान का बड़ा बयान सामने आया है। शनिवार को भोपाल में एक छात्रवृत्ति कार्यक्रम को संबोधित करते हुए चौहान ने इस नारे का उल्लेख किया और सवाल उठाया कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई कि बेटियों को पुरुषों के प्रति अविश्वास जताने वाले नारे लगाने पड़ रहे हैं।
चौहान ने कहा कि यह केवल किसी नारे की बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, सम्मान और उनके अनुभवों से जुड़े गंभीर सवाल हैं। उन्होंने समाज से आत्म-मंथन करने की अपील करते हुए कहा कि महिलाओं को सुरक्षित वातावरण देना केवल उनके परिवार की जिम्मेदारी नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए पूरे समाज को अपनी भूमिका निभानी होगी।
“नौबत यहां तक क्यों आ गई कि बेटियां ऐसे नारे लिख रही हैं?”
कार्यक्रम के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने महिलाओं की ओर से लगाए जा रहे वायरल नारे का जिक्र करते हुए कहा कि समाज को यह विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों बन रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बेटियां पुरुषों पर भरोसा करने में असहज महसूस करने लगें और उन्हें अपने अनुभवों को इस तरह के नारों के जरिए व्यक्त करना पड़े, तो समाज को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
इन दिनों “एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा” नारा महिला सुरक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों और सोशल मीडिया पर चर्चा में है। दिल्ली समेत कुछ अन्य स्थानों पर महिला सुरक्षा से जुड़े प्रदर्शनों के दौरान इस तरह के नारों का इस्तेमाल किए जाने की खबरें सामने आई हैं।
यह नारा सुनने में भले ही हल्का या व्यंग्यात्मक लगे, लेकिन प्रदर्शनकारियों द्वारा इसे महिला सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवालों के संदर्भ में इस्तेमाल किया जा रहा है। अलग-अलग स्थानों पर इसी अंदाज में दूसरे नारे भी सामने आए हैं।
महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ परिवार की जिम्मेदारी नहीं
शिवराज सिंह चौहान ने अपने संबोधन में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर समाज की सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं और लड़कियों को कई बार ऐसे लोगों से भी अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है जिन्हें वे पहले से जानती हैं।
इसी संदर्भ में उन्होंने पुरुषों, युवाओं और माता-पिता से आत्म-मंथन करने की अपील की। उनका कहना था कि समाज में ऐसा वातावरण बनाया जाना चाहिए जहां महिलाएं और बेटियां बिना डर के आगे बढ़ सकें और उन्हें अपने आसपास के लोगों पर भरोसा हो।
चौहान ने यह भी सवाल उठाया कि अगर समाज की आधी आबादी पुरुषों को लेकर असुरक्षित या अविश्वास की भावना महसूस करने लगे तो समाज और देश की प्रगति किस तरह संभव होगी।
उनके बयान का केंद्रीय संदेश महिलाओं की सुरक्षा को केवल किसी एक संस्था या परिवार तक सीमित न रखकर सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने पर था।
सोशल मीडिया से सड़क तक पहुंचा नारा
“एक कचौड़ी, दो समोसा…” वाला नारा पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आया है। महिला सुरक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान छात्राओं द्वारा लगाए गए नारों ने लोगों का ध्यान खींचा।
प्रदर्शनों में रोजमर्रा की भाषा, भोजन और तुकबंदी का इस्तेमाल करके महिलाओं की सुरक्षा, सार्वजनिक स्थानों पर उनकी स्वतंत्रता और उनके साथ होने वाले व्यवहार जैसे मुद्दों को उठाया गया।
अलीगढ़ समेत कुछ अन्य स्थानों पर भी इसी तरह के नारों के इस्तेमाल की खबरें सामने आई हैं। इन नारों के जरिए प्रदर्शनकारी छात्राओं और महिलाओं ने अपने अनुभवों और चिंताओं को अलग अंदाज में सामने रखने की कोशिश की।
इस तरह नारे की भाषा भले ही हास्य और तुकबंदी वाली दिखाई देती हो, लेकिन इसके पीछे उठाए जा रहे सवाल महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक व्यवहार से जुड़े हैं।
कार्यक्रम में छात्रवृत्ति का भी किया वितरण
शिवराज सिंह चौहान भोपाल में जिस कार्यक्रम में शामिल हुए, वहां ड्राइवरों के बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य आर्थिक रूप से सामान्य परिवारों के मेधावी बच्चों को पढ़ाई जारी रखने में सहायता देना था।
बताई गई छात्रवृत्ति व्यवस्था के अनुसार, कक्षा 8वीं से 10वीं तक 60 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों को सालाना 4,000 रुपये की सहायता दी जाएगी। वहीं 11वीं और 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों को 4,500 रुपये सालाना दिए जाने की बात कही गई।
इसके अलावा, 90 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को 5,000 रुपये की छात्रवृत्ति देने की जानकारी भी कार्यक्रम में दी गई।
चौहान ने कहा कि बच्चों की मदद केवल छात्रवृत्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पढ़ाई के बाद रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और कौशल विकास पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
“मामा कोचिंग क्लासेस” का किया जिक्र
कार्यक्रम के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने अपने संसदीय क्षेत्र विदिशा में शुरू की गई “मामा कोचिंग क्लासेस” का भी उल्लेख किया। इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायता देना है।
चौहान ने कहा कि सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को बेहतर मार्गदर्शन उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। उनका जोर इस बात पर है कि आर्थिक स्थिति किसी प्रतिभाशाली विद्यार्थी की पढ़ाई और करियर के रास्ते में बाधा न बने।
उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को स्किल-डेवलपमेंट कार्यक्रमों से जोड़ने की कोशिश की जाएगी, ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे नौकरी के साथ-साथ स्वरोजगार की दिशा में भी आगे बढ़ सकें।
बेटियों की सुरक्षा के साथ शिक्षा और रोजगार पर जोर
शिवराज सिंह चौहान के शनिवार के संबोधन में दो महत्वपूर्ण मुद्दे प्रमुख रूप से सामने आए—एक तरफ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का सवाल और दूसरी तरफ युवाओं की शिक्षा एवं रोजगार।
महिलाओं से जुड़े नारे पर उन्होंने समाज के पुरुष वर्ग और अभिभावकों से आत्म-मंथन करने की अपील की। वहीं छात्रवृत्ति कार्यक्रम में उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को शिक्षा के अवसर देने की बात कही।
उनके मुताबिक, बच्चों को केवल स्कूल और कॉलेज तक पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, कौशल विकास और रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
डायबिटीज को लेकर भी जताई चिंता
इससे पहले शिवराज सिंह चौहान अपने संसदीय क्षेत्र विदिशा के सांची में रिसर्च सोसाइटी फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज इन इंडिया के 11वें वार्षिक सम्मेलन में शामिल हुए थे।
इस दौरान उन्होंने डायबिटीज को स्वास्थ्य के क्षेत्र में बढ़ती चुनौती बताया और रोकथाम, जागरूकता, उपचार तथा अनुसंधान पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डायबिटीज जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को लेकर जागरूकता बढ़ाने और समय रहते रोकथाम के उपाय अपनाने पर भी उन्होंने बात रखी। इस तरह उनके हालिया कार्यक्रमों में सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे अलग-अलग मुद्दे सामने आए।
नारे ने छेड़ी बड़ी सामाजिक बहस
“एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा” जैसे नारे ने भले ही सोशल मीडिया पर अपनी अलग पहचान बनाई हो, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के बयान ने इसके पीछे छिपे सामाजिक सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
यह बहस केवल किसी एक नारे तक सीमित नहीं है। इसका संबंध इस सवाल से है कि महिलाओं को सार्वजनिक और निजी जीवन में कितना सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिल रहा है। विरोध प्रदर्शन करने वाली छात्राएं अपने तरीके से इन चिंताओं को सामने रख रही हैं, जबकि चौहान ने समाज से यह सोचने की अपील की है कि ऐसी नाराजगी और अविश्वास की स्थिति पैदा ही क्यों होती है।
महिला सुरक्षा को लेकर होने वाली इस बहस में परिवार, स्कूल, कॉलेज, समाज और प्रशासन सभी की भूमिका पर चर्चा होती रही है। ऐसे में चौहान का बयान इस बात पर जोर देता है कि महिलाओं की सुरक्षा को केवल महिलाओं का मुद्दा न मानकर सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाना चाहिए।
आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बेटियों को ऐसा माहौल कैसे दिया जाए जहां उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए डर या अविश्वास व्यक्त करने की जरूरत न पड़े और वे शिक्षा, रोजगार तथा सार्वजनिक जीवन में पूरी स्वतंत्रता के साथ आगे बढ़ सकें।

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