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न दर्द, न कोई बड़ा संकेत… फिर भी अंदर से खराब हो सकता है लिवर, इन लोगों को रहना होगा सावधान



आज की बदलती जीवनशैली में फैटी लिवर एक तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। खास बात यह है कि शुरुआती दौर में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते और कई लोगों को लंबे समय तक पता ही नहीं चलता कि उनके लिवर में जरूरत से ज्यादा वसा जमा हो रही है। यही वजह है कि इसे कई बार “साइलेंट” बीमारी भी कहा जाता है।

फैटी लिवर की एक प्रमुख स्थिति नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) रही है, जिसे अब चिकित्सा क्षेत्र में कई मामलों में मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें लिवर की कोशिकाओं में अतिरिक्त फैट जमा हो जाता है। कुछ मरीजों में यह केवल फैट जमा होने तक सीमित रहता है, जबकि कुछ मामलों में सूजन और लिवर को नुकसान पहुंचने की स्थिति विकसित हो सकती है।

अगर बीमारी बढ़ती जाए और लिवर में लंबे समय तक सूजन व क्षति बनी रहे, तो फाइब्रोसिस यानी लिवर में निशान पड़ने की समस्या हो सकती है। गंभीर मामलों में यह सिरोसिस और आगे चलकर लिवर फेल्योर या लिवर कैंसर जैसी जटिलताओं से जुड़ सकती है।

आखिर क्यों बढ़ रहा है फैटी लिवर का खतरा?

फैटी लिवर का संबंध केवल शराब से नहीं है। शरीर में बढ़ती अतिरिक्त चर्बी, इंसुलिन रेजिस्टेंस, टाइप-2 डायबिटीज, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स, हाई ब्लड प्रेशर तथा कम शारीरिक गतिविधि जैसे कई मेटाबॉलिक कारण इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

इसके अलावा खानपान में ज्यादा कैलोरी, मीठे पेय, अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन और अस्वास्थ्यकर वसा का अधिक सेवन भी वजन और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

किन लोगों को फैटी लिवर का सबसे ज्यादा खतरा?

1. मोटापा और पेट की अतिरिक्त चर्बी

शरीर का बढ़ता वजन फैटी लिवर के सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल है। खासकर पेट और कमर के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़ी हो सकती है।

जब शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो ग्लूकोज और फैट के मेटाबॉलिज्म में बदलाव आ सकता है। इसका असर लिवर पर भी पड़ता है और वहां फैट जमा होने का जोखिम बढ़ सकता है।

इसलिए केवल वजन कम करना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि कमर की चर्बी, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को भी नियंत्रित रखना जरूरी है।

2. टाइप-2 डायबिटीज वाले लोग

टाइप-2 डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस का फैटी लिवर से मजबूत संबंध है। डायबिटीज में शरीर के अंदर शुगर और फैट के इस्तेमाल की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिससे लिवर में वसा जमा होने का खतरा बढ़ता है।

अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज के साथ मोटापा, हाई ट्राइग्लिसराइड्स या हाई ब्लड प्रेशर भी है, तो उसे अपने लिवर की सेहत को लेकर विशेष सतर्क रहना चाहिए।

3. दिनभर बैठे रहने वाले लोग

आजकल ऑफिस का काम, लंबे समय तक मोबाइल या कंप्यूटर का इस्तेमाल और शारीरिक गतिविधि की कमी आम हो गई है। लंबे समय तक निष्क्रिय रहना वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है।

नियमित शारीरिक गतिविधि फैटी लिवर के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। तेज चाल से पैदल चलना, साइकिल चलाना, तैराकी, योग या अपनी क्षमता के अनुसार अन्य शारीरिक गतिविधियां दिनचर्या का हिस्सा बनाई जा सकती हैं।

4. गलत खानपान की आदत

फैटी लिवर के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में अस्वास्थ्यकर खानपान भी महत्वपूर्ण है। अत्यधिक मीठे पेय, ज्यादा चीनी, बार-बार फास्ट फूड, अत्यधिक कैलोरी और अस्वास्थ्यकर वसा का सेवन वजन तथा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

आहार में हरी सब्जियां, अन्य सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, फल और बेहतर गुणवत्ता वाले प्रोटीन स्रोत शामिल किए जा सकते हैं। मीठे पेय और अधिक मात्रा में चीनी वाले खाद्य-पदार्थों को सीमित करना भी महत्वपूर्ण है।

5. हाई ब्लड प्रेशर और असामान्य कोलेस्ट्रॉल

फैटी लिवर केवल लिवर की समस्या नहीं है। इसका संबंध शरीर की अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं से भी हो सकता है। हाई ब्लड प्रेशर, हाई ट्राइग्लिसराइड्स, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और बढ़ी हुई ब्लड शुगर जैसी स्थितियां फैटी लिवर के जोखिम से जुड़ी हैं।

इसलिए केवल लिवर की जांच कराने के बजाय पूरे मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है।

6. PCOS, स्लीप एप्निया और अन्य स्थितियां

कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी फैटी लिवर के जोखिम से जुड़ी हो सकती हैं। इनमें पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) और कुछ हार्मोनल या मेटाबॉलिक स्थितियां शामिल हैं। स्लीप एप्निया जैसे विकार भी मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के साथ जुड़े हो सकते हैं।

कुछ दवाएं भी लिवर पर असर डाल सकती हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉक्टर द्वारा दी गई दवा खुद से बंद कर दी जाए। यदि किसी दवा को लेकर चिंता हो तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

फैटी लिवर के लक्षण हमेशा दिखाई नहीं देते

फैटी लिवर की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआती चरण में अक्सर कोई खास लक्षण नहीं होता। कुछ लोगों को थकान या पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में असहजता महसूस हो सकती है, लेकिन केवल लक्षणों के आधार पर बीमारी की पहचान नहीं की जा सकती।

इसीलिए जिन लोगों में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य कोलेस्ट्रॉल या अन्य मेटाबॉलिक जोखिम मौजूद हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए।

बचाव के लिए क्या करें?

रोजाना शारीरिक गतिविधि बढ़ाएं

नियमित व्यायाम को जीवनशैली का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है। तेज चाल से चलना, साइकिलिंग, तैराकी या अन्य एरोबिक गतिविधियां की जा सकती हैं।

सामान्य वयस्कों के लिए सप्ताह में लगभग 150 मिनट मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि का लक्ष्य रखा जा सकता है। हालांकि, किसी बीमारी या अन्य स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम करना चाहिए।

वजन को नियंत्रित रखें

अगर किसी व्यक्ति का वजन ज्यादा है, तो धीरे-धीरे वजन कम करना लिवर के लिए फायदेमंद हो सकता है। शरीर के वजन में कुछ प्रतिशत की कमी भी लिवर में जमा फैट को कम करने में मदद कर सकती है।

हालांकि, तेजी से वजन घटाने के बजाय सुरक्षित और टिकाऊ तरीके से वजन कम करना बेहतर माना जाता है।

प्लेट में शामिल करें ये चीजें

आहार में हरी सब्जियां, अन्य सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, फल और बेहतर गुणवत्ता वाले प्रोटीन स्रोत शामिल किए जा सकते हैं।

संतृप्त वसा और ट्रांस फैट की मात्रा सीमित करना तथा स्वस्थ वसा को प्राथमिकता देना उपयोगी हो सकता है। मीठे सॉफ्ट ड्रिंक, अत्यधिक चीनी वाले पेय और जरूरत से ज्यादा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना भी महत्वपूर्ण है।

शराब से दूरी रखना क्यों जरूरी है?

भले ही किसी व्यक्ति को नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर की समस्या हो, लेकिन लिवर को अतिरिक्त नुकसान से बचाने के लिए शराब से दूरी रखना महत्वपूर्ण हो सकता है। पहले से लिवर की बीमारी मौजूद होने पर शराब लिवर को और नुकसान पहुंचा सकती है।

इसलिए यदि फैटी लिवर की समस्या सामने आती है, तो शराब के सेवन को लेकर डॉक्टर से स्पष्ट सलाह लेना बेहतर है।

हेपेटाइटिस से भी बचाव जरूरी

लिवर को स्वस्थ रखने के लिए हेपेटाइटिस जैसी वायरल बीमारियों से बचाव भी महत्वपूर्ण है। हेपेटाइटिस बी का टीका किन लोगों के लिए जरूरी है, यह व्यक्ति की उम्र, जोखिम और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर कर सकता है।

इसलिए डॉक्टर से सलाह लेकर टीकाकरण की स्थिति की जानकारी लेना उचित है।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर किसी व्यक्ति को लगातार थकान, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में असहजता, मोटापा, डायबिटीज, हाई ट्राइग्लिसराइड्स या अन्य मेटाबॉलिक समस्याएं हैं, तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

डॉक्टर जरूरत के अनुसार मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक जांच, ब्लड टेस्ट और लिवर की इमेजिंग जैसी जांचों की सलाह दे सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फैटी लिवर का मतलब हमेशा गंभीर लिवर डैमेज नहीं होता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं है। शुरुआती चरण में जीवनशैली में सुधार करके बीमारी को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।

फैटी लिवर आज सिर्फ उम्रदराज लोगों की समस्या नहीं है। बढ़ता वजन, पेट की चर्बी, डायबिटीज, खराब खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी इसके जोखिम को बढ़ा सकती है।

अच्छी बात यह है कि स्वस्थ जीवनशैली, वजन नियंत्रण, नियमित शारीरिक गतिविधि और संतुलित खानपान लिवर की सेहत सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इसलिए अगर आप लंबे समय से बैठे रहने वाली जीवनशैली जी रहे हैं, खानपान में लापरवाही बरतते हैं या आपका वजन लगातार बढ़ रहा है, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें। समय रहते अपनी जीवनशैली में बदलाव करना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से जांच कराना लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

 यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय निदान या उपचार का विकल्प न मानें। यदि आपको फैटी लिवर, डायबिटीज, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर या लिवर से संबंधित कोई समस्या है, तो योग्य चिकित्सक से व्यक्तिगत सलाह लें।

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