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जवानी में ही जोड़ों का दर्द दे रहा है दस्तक! सुबह उठते ही अकड़न और सीढ़ियों पर चटकने की आवाज कहीं इस गंभीर बीमारी का संकेत तो नहीं?



आज के दौर में बदलती जीवनशैली ने लोगों की दिनचर्या को काफी हद तक आरामतलब बना दिया है। घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना, लगातार मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल, शारीरिक गतिविधियों में कमी, बढ़ता वजन और खानपान की खराब आदतें अब केवल उम्रदराज लोगों के लिए ही समस्या नहीं रह गई हैं। कम उम्र के लोगों में भी जोड़ों में दर्द, अकड़न और लचीलेपन की कमी जैसी शिकायतें तेजी से सामने आ रही हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब कम उम्र में होने वाले जोड़ों के दर्द को गंभीरता से लेने की सलाह दे रहे हैं।

जोड़ों में सूजन, दर्द और अकड़न को अक्सर आर्थराइटिस से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि हर तरह का जोड़ों का दर्द आर्थराइटिस नहीं होता, लेकिन लंबे समय तक रहने वाला दर्द और लगातार बढ़ती अकड़न किसी समस्या का संकेत जरूर हो सकती है। समय पर पहचान और जीवनशैली में बदलाव से कई मामलों में परेशानी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

12 अक्टूबर को मनाए जाने वाले विश्व आर्थराइटिस दिवस के अवसर पर डॉ. विपुल विजय, सीनियर कंसल्टेंट, आर्थोपेडिक्स, ज्वाइंट रिप्लेसमेंट एंड स्पोर्ट्स मेडिसिन, इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली ने जोड़ों की सेहत को लेकर महत्वपूर्ण बातें साझा की हैं।

क्या युवाओं को भी हो सकता है आर्थराइटिस?

आर्थराइटिस को आमतौर पर उम्र बढ़ने से जुड़ी समस्या माना जाता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है कि यह केवल बुजुर्गों में ही हो। आर्थराइटिस जोड़ों में सूजन और उससे जुड़ी समस्याओं का एक व्यापक समूह है। इसमें दर्द, अकड़न, सूजन और जोड़ की गतिविधि प्रभावित होने जैसी परेशानियां हो सकती हैं।

उम्र बढ़ना, आनुवंशिक कारण, पुरानी चोट, शरीर का बढ़ता वजन और प्रतिरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी इसके संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं। आजकल निष्क्रिय जीवनशैली भी जोड़ों की समस्या को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक बन गई है।

लगातार कई घंटे बैठकर काम करने से मांसपेशियों की ताकत कम हो सकती है। जब जोड़ों को सहारा देने वाली मांसपेशियां कमजोर पड़ती हैं तो रोजमर्रा के कामों के दौरान जोड़ों पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि युवाओं को भी अपनी शारीरिक सक्रियता पर ध्यान देना जरूरी है।

आर्थराइटिस को समझना क्यों जरूरी है?

जोड़ों की समस्याओं को मोटे तौर पर अलग-अलग कारणों के आधार पर समझा जाता है। उम्र और जीवनशैली से जुड़ा जोड़ों का क्षरण एक प्रकार की समस्या हो सकता है। वहीं किसी पुरानी चोट के बाद कम उम्र में जोड़ में बदलाव आना दूसरी स्थिति हो सकती है।

रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारी भी जोड़ों को प्रभावित कर सकती है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही ऊतकों पर हमला करने लगती है। ऐसे मामलों में समय पर चिकित्सकीय जांच और उपचार बेहद महत्वपूर्ण होता है।

इसलिए केवल दर्द को देखकर स्वयं यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि व्यक्ति को आर्थराइटिस ही है। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है।

युवाओं में जोड़ों के दर्द की बड़ी वजह क्या है?

आज बड़ी संख्या में युवा डेस्क जॉब करते हैं। ऑफिस में लगातार छह से आठ घंटे तक बैठना, कंप्यूटर स्क्रीन की ओर झुककर काम करना और काम के दौरान पर्याप्त ब्रेक नहीं लेना शरीर की मांसपेशियों और जोड़ों पर असर डाल सकता है।

गलत पोस्चर भी परेशानी को बढ़ा सकता है। लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने से मांसपेशियों में खिंचाव और अकड़न महसूस हो सकती है। इसके अलावा विटामिन-डी और विटामिन बी12 की कमी भी कुछ लोगों में मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़ी शिकायतों के साथ सामने आ सकती है।

जिम या खेलकूद के दौरान बिना पर्याप्त वार्मअप के व्यायाम करना भी चोट का कारण बन सकता है। कई बार छोटी चोट पर ध्यान नहीं दिया जाता और बाद में उसी स्थान पर लगातार दर्द या असहजता महसूस होने लगती है।

इन संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

जोड़ों की समस्या की शुरुआत कई बार मामूली लक्षणों से होती है। यदि इन संकेतों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए तो समस्या बढ़ सकती है।

कुछ प्रमुख संकेतों में शामिल हैं—

  • जोड़ों में लगातार या बार-बार दर्द होना।

  • सुबह उठने के बाद लंबे समय तक जकड़न रहना।

  • जोड़ के आसपास सूजन दिखाई देना।

  • सीढ़ियां चढ़ते या उतरते समय दर्द होना।

  • घुटने से चटकने या आवाज आने के साथ दर्द होना।

  • चलने-फिरने में परेशानी महसूस होना।

  • पहले की तुलना में जोड़ का लचीलापन कम होना।

  • सामान्य गतिविधियों के दौरान जल्दी थकान या असहजता होना।

विशेष रूप से यदि सुबह उठने के बाद जकड़न 30 मिनट से अधिक समय तक रहती है, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सक से सलाह लेना बेहतर है।

वजन बढ़ना भी जोड़ों के लिए खतरे की घंटी

शरीर का बढ़ता वजन घुटनों और पैरों के जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। वजन अधिक होने पर चलने, सीढ़ियां चढ़ने और उठने-बैठने जैसी सामान्य गतिविधियों के दौरान घुटनों पर पड़ने वाला भार बढ़ जाता है।

इसलिए जोड़ों को स्वस्थ रखने के लिए वजन को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण है। इसके लिए अचानक बहुत कठिन व्यायाम शुरू करने के बजाय धीरे-धीरे शारीरिक गतिविधि बढ़ानी चाहिए।

रोजाना 30 से 45 मिनट सक्रिय रहें

जोड़ों की सेहत के लिए पूरी तरह आराम करना हमेशा सही तरीका नहीं है। नियमित और उचित शारीरिक गतिविधि मांसपेशियों को मजबूत रखने में मदद कर सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार प्रतिदिन 30 से 45 मिनट तक टहलना, साइकिल चलाना या तैराकी जैसी गतिविधियां अपनाई जा सकती हैं। हालांकि यदि किसी व्यक्ति को पहले से गंभीर दर्द या चोट है, तो व्यायाम का चुनाव चिकित्सक या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह से करना बेहतर होगा।

नियमित गतिविधि का एक और फायदा यह है कि इससे शरीर का वजन नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।

ऑफिस में हर 45 मिनट में लें छोटा ब्रेक

जो लोग लगातार कंप्यूटर पर काम करते हैं, उन्हें लंबे समय तक एक ही मुद्रा में नहीं बैठे रहना चाहिए। लगभग हर 45 मिनट में कुछ समय के लिए उठकर चलना और शरीर को हल्का स्ट्रेच करना उपयोगी हो सकता है।

कुर्सी पर बैठने की ऊंचाई, कंप्यूटर स्क्रीन की स्थिति और पैरों की मुद्रा भी सही होनी चाहिए। सही पोस्चर लंबे समय तक काम करने के दौरान शरीर पर पड़ने वाले अनावश्यक दबाव को कम करने में मदद कर सकता है।

खानपान का भी जोड़ों की सेहत से संबंध

हड्डियों और मांसपेशियों की मजबूती के लिए संतुलित आहार जरूरी है। भोजन में दूध, दही, हरी सब्जियां, दालें, सूखे मेवे और अखरोट जैसे पोषक खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।

कैल्शियम और अन्य जरूरी पोषक तत्व हड्डियों की सेहत के लिए महत्वपूर्ण हैं। वहीं अत्यधिक जंक फूड, बहुत ज्यादा तली-भुनी चीजें और मीठे पेय पदार्थों का सेवन कम करना चाहिए।

पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है। शरीर में पानी की पर्याप्त मात्रा बनाए रखना सामान्य शारीरिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण है और जोड़ों के आसपास मौजूद संरचनाओं के सामान्य कामकाज में भी इसकी भूमिका होती है।

अचानक दर्द होने पर क्या करें?

यदि किसी जोड़ में अचानक दर्द या सूजन हो जाए तो प्रभावित हिस्से पर सीमित अवधि के लिए आइस पैक लगाया जा सकता है। सामान्य तौर पर दिन में दो-तीन बार लगभग 15 मिनट तक बर्फ की सिकाई राहत देने में मदद कर सकती है।

वहीं लंबे समय से चल रहे दर्द और सुबह की अकड़न में गर्म सिकाई कुछ लोगों को आराम दे सकती है। हालांकि लगातार दर्द का इलाज केवल सिकाई तक सीमित नहीं होना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना डॉक्टर की सलाह के बार-बार पेनकिलर लेना उचित नहीं है। कुछ दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक या गलत तरीके से इस्तेमाल पेट और किडनी समेत शरीर के अन्य हिस्सों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

मांसपेशियों को मजबूत करना भी जरूरी

जोड़ों को स्वस्थ रखने के लिए केवल जोड़ पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उसके आसपास की मांसपेशियों को मजबूत रखना भी महत्वपूर्ण है।

क्वाड्रिसेप्स और कोर-स्ट्रेंथनिंग जैसी एक्सरसाइज मांसपेशियों की ताकत बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। लेकिन इन्हें सही तकनीक के साथ करना जरूरी है। यदि पहले से दर्द या चोट मौजूद है तो फिजियोथेरेपिस्ट की देखरेख में व्यायाम सीखना ज्यादा सुरक्षित विकल्प हो सकता है।

सही जूते पहनना भी जरूरी

विशेषकर घुटने, पैर या टखने की परेशानी वाले लोगों को जूतों का चयन सावधानी से करना चाहिए। आरामदायक और पर्याप्त सपोर्ट देने वाले जूते रोजमर्रा की गतिविधियों में मदद कर सकते हैं।

बहुत देर तक उकड़ू बैठना या लगातार पालथी मारकर बैठना भी उन लोगों के लिए असहजता बढ़ा सकता है जिन्हें पहले से घुटनों या जोड़ों की परेशानी है। इसलिए लंबे समय तक ऐसी स्थिति में बैठने से बचना बेहतर है।

कब डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

यदि जोड़ों का दर्द लगातार दो सप्ताह से अधिक समय तक बना हुआ है, बार-बार लौट रहा है या इसके साथ सूजन और चलने-फिरने में परेशानी हो रही है, तो इसे सामान्य दर्द समझकर टालना नहीं चाहिए।

खासकर यदि व्यक्ति को चलने में कठिनाई हो रही हो, जोड़ बहुत ज्यादा सूज गया हो या दर्द लगातार बढ़ रहा हो, तो हड्डी और जोड़ विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।

समय पर जांच कराने से दर्द के वास्तविक कारण का पता लगाने और उपयुक्त उपचार शुरू करने में मदद मिल सकती है।

जोड़ों की सेहत केवल उम्र पर निर्भर नहीं करती। हमारी रोजमर्रा की गतिविधियां, वजन, खानपान, पोस्चर, व्यायाम और चोट से बचाव भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आरामतलब जीवनशैली के कारण कम उम्र में भी मांसपेशियों की कमजोरी और जोड़ों से जुड़ी शिकायतें बढ़ सकती हैं।

इसलिए हर दिन कुछ समय शारीरिक गतिविधि के लिए निकालना, लंबे समय तक लगातार बैठने से बचना, संतुलित भोजन करना और वजन को नियंत्रित रखना जरूरी है। सबसे अहम बात यह है कि लंबे समय तक रहने वाले दर्द या सूजन को केवल घरेलू उपायों के भरोसे न छोड़ें। सही समय पर विशेषज्ञ से सलाह लेना जोड़ों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

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