भारत की अर्थव्यवस्था ने पकड़ी ऐसी रफ्तार! 2003-07 का रिकॉर्ड भी टूटने वाला है? IMF-World Bank ने बढ़ाया अनुमान
नई दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर सकारात्मक तस्वीर सामने आई है। दुनिया की प्रमुख आर्थिक संस्थाओं ने भारत की विकास दर के अनुमानों में बढ़ोतरी की है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक यानी ADB जैसे बड़े संस्थानों का मानना है कि भारत आने वाले समय में भी मजबूत आर्थिक विकास दर्ज कर सकता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत की मौजूदा विकास दर अगर आने वाले वर्षों में भी इसी रफ्तार से बनी रहती है, तो देश पिछले दो दशकों के सबसे मजबूत विकास दौरों में से एक को पीछे छोड़ सकता है। खासतौर पर 2003 से 2007 के बीच दर्ज की गई तेज आर्थिक वृद्धि के साथ भारत के मौजूदा प्रदर्शन की तुलना की जा रही है।
आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस तुलना का महत्व केवल प्रतिशत के आंकड़े में नहीं है। आज भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2000 के दशक की शुरुआत की तुलना में कई गुना बड़ा है। ऐसे में 7 फीसदी की विकास दर का मतलब अब अर्थव्यवस्था में वास्तविक उत्पादन की कहीं बड़ी वृद्धि है।
IMF, विश्व बैंक और ADB ने क्यों बढ़ाया भरोसा?
भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर सकारात्मक संकेत तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपने विकास अनुमानों में बदलाव करती हैं।
कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक पॉलिसी यानी KIEP में भारत और दक्षिण एशिया टीम के प्रमुख क्युंगहून किम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर भारत की विकास दर से जुड़े आंकड़ों और रुझानों पर चर्चा की। उनके मुताबिक IMF, विश्व बैंक और ADB द्वारा भारत के विकास अनुमान बढ़ाया जाना एक महत्वपूर्ण संकेत है।
इन संस्थाओं के अनुमान अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इनके आकलन में एक बात समान दिखाई देती है—भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार को लेकर भरोसा मजबूत हुआ है।
विश्व बैंक के अनुमान में 2026-27 के लिए भारत की विकास दर करीब 7.1 फीसदी रहने की उम्मीद जताई गई है। पहले यह अनुमान करीब 6.6 फीसदी था। वहीं 2027-28 के लिए विकास दर करीब 7.2 फीसदी रहने का अनुमान सामने आया है।
IMF ने भी 2026-27 के लिए अपने अनुमान को करीब 6.5 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया है। अगले वित्त वर्ष के लिए भी करीब 7 फीसदी की विकास दर का अनुमान रखा गया है।
ADB ने 2026-27 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान करीब 6.6 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी किया है। हालांकि अगले वित्त वर्ष के लिए उसका अनुमान करीब 7.3 फीसदी से घटकर 7.1 फीसदी किया गया है।
इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक संस्थाएं भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अभी भी काफी आशावादी हैं।
महामारी के झटके के बाद भारत की जबरदस्त वापसी
भारत की मौजूदा आर्थिक कहानी को समझने के लिए कोरोना महामारी के दौर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महामारी के दौरान आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई थीं और भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 5.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी।
इसके बाद 2021 में अर्थव्यवस्था ने जोरदार वापसी की और विकास दर करीब 9.7 फीसदी रही।
लेकिन भारत की असली उपलब्धि केवल महामारी के बाद की इस तेज रिकवरी में नहीं है। इसके बाद भी देश की आर्थिक विकास दर कई वर्षों तक मजबूत बनी रही।
क्युंगहून किम के आकलन के मुताबिक, 2021 के बाद लगातार चार वर्षों तक भारत की विकास दर सालाना 7 फीसदी से अधिक रही। यही कारण है कि जैसे-जैसे तिमाही GDP के आंकड़े सामने आते गए, आर्थिक विशेषज्ञों और संस्थाओं को अपने पहले के अनुमानों को कई बार संशोधित करना पड़ा।
यह स्थिति किसी एक तिमाही की तेजी से अलग है। लगातार कई वर्षों तक ऊंची विकास दर बनाए रखना किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए आसान नहीं होता।
2003-07 के रिकॉर्ड के बेहद करीब भारत
भारत के आर्थिक इतिहास में 2003 से 2007 का दौर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में देश ने लगातार तेज आर्थिक विकास दर्ज किया था और भारत को दुनिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाने लगा था।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2003 से 2007 के बीच भारत की औसत वार्षिक विकास दर करीब 7.89 फीसदी रही थी।
इसके मुकाबले 2021 से 2025 के बीच भारत की औसत वार्षिक विकास दर करीब 7.83 फीसदी रही। यानी दोनों दौरों के बीच अंतर बेहद मामूली है।
अगर आने वाले समय में भारत 7 फीसदी से अधिक की विकास दर बनाए रखने में सफल रहता है, तो लंबी अवधि के औसत के लिहाज से मौजूदा दौर 2003-07 के प्रदर्शन को पीछे छोड़ सकता है।
यही वह आंकड़ा है जिसने भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बढ़ाई है।
इस बार कहानी पहले से बड़ी क्यों है?
भारत के मौजूदा आर्थिक प्रदर्शन की सबसे महत्वपूर्ण बात केवल विकास दर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का विशाल आकार है।
2007 के आसपास भारत की GDP करीब 1 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ी अधिक थी। अब भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुंच चुकी है।
इसका सीधा मतलब यह है कि आज 7 फीसदी की विकास दर से अर्थव्यवस्था में जितना अतिरिक्त उत्पादन जुड़ता है, वह दो दशक पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा है।
यानी अगर 2000 के दशक में 7 फीसदी की वृद्धि महत्वपूर्ण थी, तो आज इतने बड़े आर्थिक आधार पर 7 फीसदी की वृद्धि का वैश्विक प्रभाव भी अधिक हो सकता है।
भारत जितना बड़ा आर्थिक केंद्र बनेगा, वैश्विक व्यापार, निवेश और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर उसका प्रभाव भी उतना ही बढ़ेगा।
भारत के लिए रोजगार और निवेश सबसे बड़ी चुनौती
तेज GDP ग्रोथ निश्चित रूप से अच्छी खबर है, लेकिन केवल विकास दर बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। भारत जैसे विशाल देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे।
देश की करीब 1.4 अरब आबादी को देखते हुए रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, सेवा क्षेत्र और नई तकनीकों में निवेश बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा।
अगर आर्थिक विकास के साथ रोजगार और आय के अवसर बढ़ते हैं तो घरेलू खपत और मजबूत हो सकती है। भारत की बड़ी घरेलू बाजार क्षमता पहले से ही उसकी आर्थिक ताकत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्या भारत 2030 तक बन सकता है दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था?
भारत के सामने अब एक और बड़ा लक्ष्य है—दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ना।
अगर भारत आने वाले वर्षों में लगातार 7 फीसदी या उससे अधिक की वास्तविक आर्थिक वृद्धि बनाए रखता है, तो इस लक्ष्य की दिशा में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है।
हालांकि किसी देश की वैश्विक रैंकिंग केवल GDP की विकास दर से तय नहीं होती। इसमें विनिमय दर, महंगाई, अन्य देशों की आर्थिक वृद्धि और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसलिए 2030 के आसपास भारत के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना को एक अनुमान के रूप में देखना चाहिए, निश्चित परिणाम के रूप में नहीं।
वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत के लिए बड़ा मौका
भारत की आर्थिक वृद्धि ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया की अर्थव्यवस्था कई तरह की चुनौतियों से गुजर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक अनिश्चितता, ब्याज दरों में बदलाव और वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव जैसी परिस्थितियां बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही हैं।
ऐसे माहौल में भारत का अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन निवेशकों और वैश्विक कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण संकेत बन सकता है।
भारत अगर बुनियादी ढांचे में निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, ऊर्जा, सेवा क्षेत्र और घरेलू खपत को मजबूती देता है तो विकास की मौजूदा रफ्तार को आगे बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
अभी कई चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं
भारत की आर्थिक कहानी सकारात्मक जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन इसके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं।
रोजगार की गुणवत्ता, ग्रामीण आय, निजी निवेश, उत्पादकता, महंगाई, वैश्विक व्यापार और असमान आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर लगातार काम करना होगा।
सिर्फ GDP का आंकड़ा बढ़ने से यह साबित नहीं होता कि हर परिवार की आर्थिक स्थिति समान रूप से बेहतर हो गई है। विकास का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा जब रोजगार, आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में भी सुधार देखने को मिले।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर आने वाले तिमाही GDP आंकड़ों और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं के अगले अनुमानों पर रहेगी। अगर भारत की विकास दर उम्मीद से बेहतर बनी रहती है, तो IMF, विश्व बैंक और दूसरी संस्थाएं एक बार फिर अपने अनुमानों को संशोधित कर सकती हैं।
यही वजह है कि भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया के आर्थिक विश्लेषकों के लिए खास चर्चा का विषय बनी हुई है।
भारत की अर्थव्यवस्था ने महामारी के बाद जिस मजबूती से वापसी की है, उसने देश को एक महत्वपूर्ण आर्थिक मुकाम पर पहुंचा दिया है। 2021-2025 के दौरान करीब 7.83 फीसदी की औसत वार्षिक विकास दर भारत को 2003-07 के करीब ले आती है, जब औसत वृद्धि करीब 7.89 फीसदी रही थी।
अगर आने वाले वर्षों में भी भारत 7 फीसदी या उससे अधिक की विकास दर बनाए रखने में सफल रहता है, तो वह अपने पुराने तेज विकास के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ सकता है।
हालांकि इसके लिए लगातार निवेश, रोजगार सृजन, उत्पादकता में सुधार और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता जरूरी होगी।
फिलहाल IMF, विश्व बैंक और ADB के बढ़े हुए अनुमान भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत जरूर हैं। लेकिन असली परीक्षा आने वाले वर्षों में होगी—क्या भारत इस रफ्तार को सिर्फ बनाए रखता है या इसे और तेज करके दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह और मजबूत करता है?

कोई टिप्पणी नहीं