4 साल की जंग के बीच भारत ने चला ऐसा दांव, रूस-यूक्रेन के बीच अब क्या होने वाला है?
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को चार साल से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन अब भी इस संघर्ष के खत्म होने के कोई स्पष्ट संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। फरवरी 2022 में शुरू हुई इस जंग ने न सिर्फ रूस और यूक्रेन को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर भी गहरा असर डाला है। युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में सैनिकों और आम नागरिकों की मौत हुई है, जबकि लाखों लोग विस्थापित हुए हैं।
युद्ध को समाप्त कराने के लिए कई देशों ने अलग-अलग स्तर पर प्रयास किए हैं। अमेरिका ने भी संघर्ष खत्म कराने के लिए कई दौर की कूटनीतिक कोशिशें कीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद कई बार रूस और यूक्रेन पर बातचीत के लिए दबाव बनाया। कभी चेतावनी और दबाव की रणनीति अपनाई गई तो कभी सीधे बातचीत का रास्ता तलाशने की कोशिश हुई। हालांकि, अब तक ऐसा कोई समझौता सामने नहीं आया है, जिससे युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त किया जा सके।
इसी बीच भारत की ओर से रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष को कम करने के लिए एक नई पहल सामने आने की खबर है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत ने युद्ध के ऐसे पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए शांति प्रस्ताव तैयार किया है, जिनका सीधा संबंध आम लोगों, वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से है।
भारत ने क्यों उठाया शांति का कदम?
भारत लंबे समय से रूस-यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति को प्राथमिकता देने की बात करता रहा है। भारत का रुख रहा है कि युद्ध का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीतिक माध्यम से निकाला जाना चाहिए।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी कई मौकों पर कहा है कि संघर्ष का असर केवल रूस और यूक्रेन तक सीमित नहीं है। युद्ध के कारण पूरी दुनिया को ऊर्जा, खाद्य और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारत की नई पहल का उद्देश्य तत्काल किसी बड़े राजनीतिक समझौते को लागू कराना नहीं, बल्कि ऐसे कदमों के लिए सहमति बनाना है, जिनसे युद्ध के दौरान होने वाला नुकसान कम किया जा सके और महत्वपूर्ण वैश्विक आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित रखा जा सके।
जेलेंस्की से मुलाकात के बाद बढ़ी उम्मीदें
भारत की कूटनीतिक पहल के संदर्भ में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यूक्रेन यात्रा को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दौरान उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से मुलाकात की थी।
यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि भारत लंबे समय से रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को बनाए रखते हुए यूक्रेन के साथ भी संवाद बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। भारत ने किसी एक पक्ष के समर्थन के बजाय बातचीत और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है।
जयशंकर ने यूक्रेन में यह संकेत दिया था कि भारत शांति स्थापित करने की दिशा में किसी भी संभव तरीके से मदद करने के लिए तैयार है। अब भारत के प्रस्ताव को इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भारत का 3 सूत्रीय प्रस्ताव क्या है?
भारत की पहल में तीन ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है, जिनका युद्ध और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों पर सीधा असर पड़ता है।
1. ऊर्जा और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले रोकना
प्रस्ताव का पहला महत्वपूर्ण हिस्सा ऊर्जा संयंत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने से जुड़ा है।
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध में ऊर्जा प्रतिष्ठान और अन्य महत्वपूर्ण ढांचे कई बार हमलों का निशाना बने हैं। ऐसे हमलों से केवल सैन्य नुकसान नहीं होता, बल्कि आम नागरिकों की जिंदगी भी प्रभावित होती है।
बिजली संयंत्रों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और अन्य जरूरी बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने से लाखों लोगों के सामने बिजली, पानी, हीटिंग और अन्य आवश्यक सेवाओं का संकट पैदा हो सकता है।
भारत की पहल का उद्देश्य ऐसे हमलों को रोकने के लिए दोनों पक्षों के बीच न्यूनतम सहमति बनाने की दिशा में काम करना है।
2. ब्लैक सी से व्यापार और खाद्य आपूर्ति जारी रखना
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा ब्लैक सी से व्यापार और आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही से जुड़ा है।
रूस और यूक्रेन दोनों ही वैश्विक खाद्य और कृषि बाजार के लिए महत्वपूर्ण देश हैं। युद्ध के कारण ब्लैक सी क्षेत्र में समुद्री व्यापार को बड़ा झटका लगा है।
अनाज की आपूर्ति प्रभावित होने का असर दुनिया के कई देशों पर पड़ा। विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए खाद्य कीमतों और आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी।
भारत चाहता है कि ब्लैक सी के रास्ते से अनाज और ऊर्जा जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो। इससे न केवल रूस और यूक्रेन बल्कि दूसरे देशों को भी राहत मिल सकती है।
3. कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा
तीसरा मुद्दा ब्लैक सी में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा से संबंधित है।
भारत की पहल के मुताबिक, समुद्र में आने-जाने वाले व्यापारिक जहाजों को युद्ध का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि कमर्शियल शिपिंग सुरक्षित होती है तो वैश्विक व्यापार को बड़ा फायदा मिल सकता है।
युद्ध के कारण समुद्री मार्गों में जोखिम बढ़ने से बीमा लागत, परिवहन खर्च और सामान की कीमतों पर असर पड़ सकता है। इसलिए व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर किसी समझौते की दिशा में आगे बढ़ना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
अमेरिका, तुर्की और मिस्र की कोशिशों से कैसे अलग है भारत का प्रस्ताव?
रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर पहले भी कई देशों ने शांति पहल की है। तुर्की और मिस्र सहित कई देशों ने समुद्री व्यापार और अनाज की सुरक्षित आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर बातचीत को बढ़ावा देने की कोशिश की।
अमेरिका की ओर से भी ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने जैसे मुद्दों को लेकर पहल की गई। हालांकि भारत की प्रस्तावित पहल की खासियत यह बताई जा रही है कि इसमें कई महत्वपूर्ण चिंताओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है।
ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा, ब्लैक सी के जरिए व्यापार और कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा—ये तीनों मुद्दे सीधे तौर पर युद्ध के मानवीय और आर्थिक प्रभाव से जुड़े हैं।
भारत का प्रयास किसी एक पक्ष को पूरी तरह जीत दिलाने के बजाय ऐसे न्यूनतम कदमों पर सहमति बनाने का दिखाई देता है, जिनसे युद्ध के दौरान होने वाला नुकसान कम किया जा सके।
क्या भारत रूस और यूक्रेन को बातचीत की मेज पर ला पाएगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत की यह पहल वास्तव में रूस और यूक्रेन को किसी समझौते तक पहुंचाने में मदद कर पाएगी?
रूस और यूक्रेन के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर मतभेद हैं। क्षेत्रीय नियंत्रण, सुरक्षा गारंटी और भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था जैसे मुद्दे किसी भी शांति समझौते को बेहद कठिन बनाते हैं।
ऐसे में केवल ऊर्जा या समुद्री व्यापार से जुड़े समझौते से युद्ध पूरी तरह समाप्त होना मुश्किल है। लेकिन विशेषज्ञों के नजरिए से छोटे और सीमित समझौते व्यापक शांति वार्ता का रास्ता खोल सकते हैं।
यदि दोनों पक्ष ऊर्जा संयंत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने, व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा करने और ब्लैक सी में व्यापार जारी रखने पर सहमत होते हैं, तो इससे आपसी विश्वास बहाल करने की दिशा में एक शुरुआत हो सकती है।
ट्रंप की कोशिशों के बाद भारत की भूमिका क्यों अहम?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कई बार रूस और यूक्रेन दोनों पर बातचीत के लिए दबाव बनाने की कोशिश की।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से अलग-अलग स्तर पर वार्ता और दबाव की रणनीति अपनाई गई। ट्रंप ने रूस के साथ बातचीत के रास्ते तलाशे और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ भी कई दौर की बातचीत की।
इसके बावजूद युद्ध का कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आया।
यही वजह है कि भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत के रूस के साथ लंबे समय से मजबूत संबंध हैं और साथ ही यूक्रेन के साथ भी उसके राजनयिक संबंध हैं। भारत दोनों पक्षों से संवाद करने की स्थिति में है।
भारत ने अब तक युद्ध के दौरान किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की है।
दुनिया की नजर भारत की पहल पर
रूस-यूक्रेन युद्ध का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं है। ऊर्जा की कीमतों, खाद्य आपूर्ति, समुद्री व्यापार और वैश्विक सप्लाई चेन पर इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में देखा गया है।
ऐसे में भारत की तीन सूत्रीय पहल यदि किसी स्तर पर दोनों देशों के बीच सहमति बनाने में सफल होती है तो इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत का प्रस्ताव युद्ध को खत्म कर देगा। रूस और यूक्रेन के बीच अंतिम राजनीतिक समझौता अभी भी बेहद जटिल दिखाई देता है।
फिर भी भारत की पहल इस लंबे संघर्ष में एक अलग तरह का रास्ता जरूर खोल सकती है—ऐसा रास्ता जिसमें पहले छोटे और व्यावहारिक मुद्दों पर सहमति बनाई जाए और उसके बाद बड़े राजनीतिक समाधान की ओर बढ़ा जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रूस और यूक्रेन भारत के इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं? यदि दोनों पक्ष ऊर्जा और बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने, ब्लैक सी में व्यापार जारी रखने और कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा पर सहमत होते हैं, तो चार साल से अधिक समय से जारी इस युद्ध में शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

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