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सऊदी अरब ने ईरान के सामने खोले सारे पत्ते? हूतियों को ₹8,000 करोड़ देने की खबर से खाड़ी में मचा हड़कंप, आखिर क्यों बदली रणनीति!



तेहरान/रियाद: दशकों तक क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा को लेकर एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे सऊदी अरब और ईरान एक बार फिर बातचीत की मेज पर आमने-सामने आए हैं। पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात और लगातार बढ़ते सैन्य तनाव के बीच दोनों देशों के बीच यह संपर्क बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि इस बातचीत के पीछे केवल शांति और तनाव कम करने की कोशिश नहीं है, बल्कि खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा, तेल निर्यात, होर्मुज जलडमरूमध्य और यमन में हूती हमलों जैसे मुद्दे भी सीधे जुड़े हुए हैं।

26 अक्टूबर 2026 को सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर और तुर्की के खुफिया प्रमुख इब्राहिम कालिन भी शामिल थे। यह बैठक मक्का संयुक्त रक्षा समझौते से जुड़े देशों और ईरान के बीच उच्चस्तरीय संपर्क का हिस्सा थी। सऊदी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इस यात्रा का उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव कम करना, बातचीत के रास्ते खोलना और कूटनीतिक समाधान को बढ़ावा देना है।

लेकिन इसी बीच इजरायली मीडिया में सामने आई एक रिपोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को और ज्यादा चर्चा में ला दिया है। 'इजरायल हयोम' ने राजनयिक सूत्रों के हवाले से दावा किया कि सऊदी अरब हूती विद्रोहियों के साथ युद्धविराम के लिए ईरान के माध्यम से करीब 1 अरब डॉलर देने पर विचार कर रहा है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि रकम सऊदी रक्षा मंत्री के साथ सैन्य परिवहन विमान में लाई गई थी। हालांकि यह दावा अभी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है और सऊदी अधिकारियों ने रकम ट्रांसफर किए जाने की पुष्टि नहीं की है।

अचानक क्यों बढ़ी सऊदी-ईरान बातचीत?

सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है। दोनों देशों के बीच यमन, सीरिया, लेबनान और अन्य क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर भी मतभेद रहे हैं। लेकिन मौजूदा परिस्थितियां पहले से कहीं अधिक जटिल हैं।

यमन के हूती विद्रोही ईरान समर्थित समूह माने जाते हैं और हाल के समय में सऊदी अरब के खिलाफ हमले तेज हुए हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, हूतियों ने सऊदी अरब के एयरपोर्ट और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने वाले हमले किए हैं। ऐसे हमलों से केवल सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव नहीं बढ़ता, बल्कि दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल सऊदी अरब की ऊर्जा आपूर्ति और निर्यात पर भी असर पड़ सकता है।

दूसरी तरफ ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। तेल टैंकरों की आवाजाही में बाधा आने से वैश्विक ऊर्जा बाजार भी दबाव में है।

ऐसे में सऊदी अरब के लिए क्षेत्रीय संघर्ष को सीमित करना एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक प्राथमिकता बन गया है।

1 अरब डॉलर की रकम की रिपोर्ट ने बढ़ाया रहस्य

'इजरायल हयोम' की रिपोर्ट में दावा किया गया कि सऊदी अरब और हूतियों के बीच युद्धविराम के लिए एक वित्तीय पैकेज पर चर्चा हुई है। इसके तहत कथित तौर पर करीब 1 अरब डॉलर हूतियों को ईरान के रास्ते देने की बात सामने आई है।

रिपोर्ट में एक राजनयिक सूत्र के हवाले से यहां तक कहा गया कि सऊदी रक्षा मंत्री यह रकम सैन्य परिवहन विमान से अपने साथ लेकर तेहरान पहुंचे थे। हालांकि यह बेहद महत्वपूर्ण दावा है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

सऊदी पक्ष ने भी इस रकम को लेकर सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं की है। इसके बजाय सऊदी विदेश मंत्रालय ने अपनी आधिकारिक घोषणा में यात्रा को तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की कोशिश बताया है। इसलिए 1 अरब डॉलर वाले दावे को फिलहाल रिपोर्ट और अनाम सूत्रों पर आधारित दावा मानना ही उचित होगा।

तीन साल पुराने समझौते का भी जिक्र

इजरायली रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच विवाद का एक हिस्सा करीब तीन साल पहले हुई समझ को लागू करने से संबंधित है।

रिपोर्ट के अनुसार, उस समय संभावित शांति समझौते के तहत सऊदी अरब की ओर से हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सार्वजनिक कर्मचारियों के वेतन और नागरिक बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था पर चर्चा हुई थी।

इसके बदले हूतियों से युद्धविराम बनाए रखने और सऊदी अरब पर हमले रोकने की अपेक्षा की गई थी।

हालांकि मौजूदा स्थिति में इन पुराने समझौतों की शर्तों और किसी नए संभावित वित्तीय पैकेज के बीच संबंध को लेकर भी स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। यही कारण है कि 1 अरब डॉलर की रकम को पक्के समझौते के रूप में पेश करना जल्दबाजी होगी।

सऊदी अरब ने आधिकारिक तौर पर क्या कहा?

सऊदी विदेश मंत्रालय ने 26 अक्टूबर को जारी बयान में कहा कि रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान और मक्का संयुक्त रक्षा समझौते से जुड़े देशों के प्रतिनिधियों की तेहरान यात्रा क्षेत्र में तनाव कम करने और बातचीत को बढ़ावा देने के प्रयासों का हिस्सा है।

रियाद ने कहा कि बातचीत का उद्देश्य मौजूदा संकट में शामिल पक्षों के बीच बातचीत के रास्ते खोलना और सैन्य तनाव की वापसी को रोकना है। सऊदी अरब ने कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता कोशिशों को भी समर्थन दिया है।

यानी आधिकारिक स्तर पर सऊदी अरब ने हूतियों को 1 अरब डॉलर देने की घोषणा नहीं की है। सरकार की सार्वजनिक भाषा फिलहाल क्षेत्रीय तनाव कम करने, बातचीत और कूटनीतिक समाधान पर केंद्रित है।

ईरान के लिए भी बड़ी कूटनीतिक पहल

तेहरान में सऊदी, तुर्की और पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारियों का पहुंचना ईरान के लिए भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

रॉयटर्स के अनुसार, इन देशों के बीच अगस्त में मक्का पारस्परिक रक्षा समझौता हुआ था और यह बैठक उस समझौते से जुड़े देशों तथा ईरान के बीच पहली उच्चस्तरीय बातचीत में से एक है। बैठक में क्षेत्रीय गैर-आक्रामकता व्यवस्था, अमेरिका-ईरान बातचीत को फिर शुरू करने, हूती हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े तनाव जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।

ईरान इस बातचीत को क्षेत्रीय देशों के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के अवसर के रूप में देख सकता है। वहीं सऊदी अरब के लिए प्राथमिकता यह है कि क्षेत्र में ऐसा सैन्य टकराव न बढ़े जिसका सीधा असर उसकी अर्थव्यवस्था और तेल निर्यात पर पड़े।

तेल के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा मामला?

सऊदी अरब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देशों में से एक है। उसकी अर्थव्यवस्था में तेल और ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। इसलिए अगर यमन में हूती हमले सऊदी तेल प्रतिष्ठानों को प्रभावित करते हैं और साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य में टैंकरों की आवाजाही बाधित होती है, तो इसका असर केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा।

दुनिया के कई देशों को खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति मिलती है। इसलिए इस इलाके में लगातार सैन्य तनाव से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

इसी वजह से सऊदी अरब के लिए सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता दोनों एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिश को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।

हूतियों के साथ समझौता आसान नहीं

हालांकि सऊदी अरब और ईरान के बीच बातचीत शुरू होना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि हूतियों के साथ तत्काल युद्धविराम हो जाएगा।

यमन का संघर्ष कई वर्षों से अलग-अलग स्थानीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों से प्रभावित रहा है। हूती संगठन की अपनी राजनीतिक और सैन्य मांगें हैं, जबकि सऊदी अरब यमन में अपने सुरक्षा हितों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के समर्थन को महत्वपूर्ण मानता है।

ईरान की भूमिका भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। सऊदी अरब और ईरान अगर किसी समझौते की दिशा में बढ़ते हैं तो उसके लिए हूतियों की सहमति और जमीन पर वास्तविक सैन्य स्थिति दोनों महत्वपूर्ण होंगी।

मक्का रक्षा समझौते की भी परीक्षा

इस पूरी स्थिति में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच इस समझौते का उद्देश्य सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना है।

तेहरान में हुई बैठक में इन देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि सैन्य गठबंधन के साथ-साथ कूटनीतिक चैनल भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

रॉयटर्स के मुताबिक बैठक में शामिल देशों ने शांति और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है।

क्या बदलेगा पश्चिम एशिया का समीकरण?

सऊदी अरब और ईरान के बीच इस तरह का उच्चस्तरीय संपर्क पश्चिम एशिया की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत हो सकता है, लेकिन इसके वास्तविक परिणाम अभी सामने आना बाकी हैं।

अगर बातचीत के जरिए हूती हमले कम होते हैं, होर्मुज में तनाव घटता है और तेल निर्यात सामान्य होता है, तो इसका असर पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसके विपरीत अगर बातचीत विफल होती है और सैन्य तनाव बढ़ता है, तो सऊदी अरब सहित दूसरे खाड़ी देशों पर सुरक्षा दबाव और बढ़ सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1 अरब डॉलर के कथित भुगतान की खबर को अभी अंतिम समझौता नहीं माना जा सकता। यह दावा अनाम राजनयिक सूत्रों पर आधारित है और सऊदी सरकार ने रकम के ट्रांसफर की पुष्टि नहीं की है। आधिकारिक तौर पर रियाद ने बातचीत का उद्देश्य तनाव कम करना और कूटनीतिक समाधान तलाशना बताया है।

फिलहाल तेहरान में हुई यह बैठक इसलिए अहम है क्योंकि लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी रहे सऊदी अरब और ईरान एक ऐसे समय में संवाद कर रहे हैं, जब यमन, होर्मुज जलडमरूमध्य, तेल निर्यात और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का दबाव एक साथ मौजूद है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह बातचीत केवल तनाव कम करने की कोशिश तक सीमित रहती है या फिर इससे हूतियों के साथ किसी व्यापक युद्धविराम और क्षेत्रीय समझौते का रास्ता खुलता है।

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