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आज इजरायल में होगा बड़ा फैसला! नेतन्याहू की कुर्सी पर संकट या फिर सत्ता में वापसी? गाजा-ईरान युद्ध के बीच दुनिया की नजरें चुनाव पर



तेल अवीव: इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। यह चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ देश की सुरक्षा नीति, गाजा युद्ध, ईरान के साथ तनाव, अमेरिका के साथ संबंध और घरेलू राजनीति की दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद इजरायल में होने वाला पहला राष्ट्रीय चुनाव है।

इजरायल की संसद को नेसेट (Knesset) कहा जाता है और इसमें 120 सीटें हैं। चुनाव में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। इसके बाद सीटों के आधार पर सरकार बनाने के लिए गठबंधन की प्रक्रिया शुरू होती है। किसी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। मौजूदा चुनाव में कई दलों के बीच मुकाबले और किसी एक खेमे के स्पष्ट बहुमत की अनिश्चितता के कारण चुनाव के बाद गठबंधन वार्ता बेहद अहम हो सकती है।

नेतन्याहू के लिए क्यों अहम है यह चुनाव?

बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे हैं। वह 2009 से अधिकांश समय प्रधानमंत्री रहे हैं और उनकी लिकुड पार्टी इस चुनाव में भी प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल है।

इस चुनाव में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह मौजूदा राजनीतिक गठबंधन के साथ सत्ता में वापसी कर पाएंगे या विपक्षी दल सरकार बनाने की कोशिश करेंगे। रॉयटर्स के अनुसार चुनावी मुकाबले में नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट, पूर्व रक्षा मंत्री अविगडोर लिबरमैन और अन्य प्रमुख नेता हैं।

हालांकि चुनावी सर्वेक्षणों को परिणाम नहीं माना जा सकता, हालिया सर्वेक्षणों में किसी एक खेमे को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का स्पष्ट रास्ता नहीं दिखा है। ऐसे में छोटे दलों की भूमिका और चुनाव के बाद गठबंधन वार्ता महत्वपूर्ण हो सकती है।

ट्रंप के साथ रिश्ते को नेतन्याहू ने बनाया चुनावी मुद्दा

चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने संबंधों को नेतन्याहू ने प्रमुखता से पेश किया है। उन्होंने सुरक्षा और ईरान से जुड़े खतरे को लेकर अमेरिका के समर्थन को अपनी राजनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

चुनाव से एक दिन पहले नेतन्याहू ने ट्रंप के समर्थन का हवाला देते हुए ईरान के खिलाफ भविष्य में सैन्य कार्रवाई की संभावना का संकेत दिया। रॉयटर्स के मुताबिक ट्रंप ने भी इजरायली मतदाताओं से नेतन्याहू को समर्थन देने की अपील की थी। हालांकि अमेरिकी प्रशासन की ओर से ईरान को लेकर अलग-अलग स्तर पर बयान भी सामने आए हैं, इसलिए इस मुद्दे पर आगे की नीति चुनाव के बाद की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

वहीं विपक्षी नेता नेतन्याहू की इस रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट ने उनके प्रचार को लेकर आलोचना की और कहा कि अमेरिका इजरायल के मतदाताओं द्वारा चुने गए किसी भी नेता के साथ काम कर सकता है।

गाजा युद्ध बना चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल ने गाजा में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया था। इसके बाद से देश की राजनीति में सुरक्षा और युद्ध प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।

नेतन्याहू सरकार को एक ओर युद्ध के दौरान उठाए गए सैन्य कदमों के लिए समर्थन मिला है, वहीं दूसरी ओर 7 अक्टूबर के हमले से पहले की सुरक्षा व्यवस्था और युद्ध के संचालन को लेकर आलोचना भी हुई है। चुनाव में मतदाता इस बात पर भी विचार कर रहे हैं कि मौजूदा सरकार ने युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों को किस तरह संभाला।

विपक्ष के प्रमुख चेहरे गादी आइजेनकोट और नफ्ताली बेनेट भी सुरक्षा को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भी ईरान और हमास को लेकर कड़े सुरक्षा रुख की बात करते हैं। इसलिए चुनाव में अंतर केवल सुरक्षा नीति का नहीं, बल्कि युद्ध के बाद की रणनीति, सरकार के संचालन और राजनीतिक गठबंधन की दिशा का भी हो सकता है।

सरकार बनाने में छोटे दलों की भूमिका अहम

इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था में किसी एक पार्टी के लिए अकेले बहुमत हासिल करना कठिन होता है। इसलिए चुनाव के बाद गठबंधन सरकार बनना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है।

नेतन्याहू के संभावित सहयोगियों में दक्षिणपंथी और धार्मिक दल शामिल हैं। इनमें इतामार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच से जुड़े दल भी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी तरफ विपक्षी खेमे में भी कई अलग-अलग राजनीतिक समूह हैं।

इसके अलावा अरब समुदाय से जुड़े राजनीतिक दल भी सीटों के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि प्रमुख यहूदी दलों के नेताओं ने अरब दलों के साथ गठबंधन को लेकर अलग-अलग रुख अपनाया है। ऐसे में यदि किसी भी खेमे को 61 सीटों का स्पष्ट समर्थन नहीं मिलता है तो चुनाव के बाद की बातचीत काफी जटिल हो सकती है।

ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी नजर

इजरायल और ईरान के बीच तनाव पिछले वर्षों में लगातार अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। चुनाव अभियान के दौरान ईरान का खतरा भी प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा है।

नेतन्याहू अपने सुरक्षा रिकॉर्ड और ईरान के खिलाफ कठोर रुख को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाते रहे हैं। दूसरी ओर उनके विरोधियों का कहना है कि सुरक्षा नीति को केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं किया जा सकता और युद्ध के बाद राजनीतिक समाधान तथा क्षेत्रीय रणनीति पर भी ध्यान देना जरूरी है।

इस चुनाव के परिणाम का प्रभाव केवल इजरायल की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रह सकता, क्योंकि ईरान, गाजा, लेबनान और व्यापक पश्चिम एशिया की स्थिति से अमेरिका तथा अन्य देशों के रणनीतिक हित जुड़े हैं।

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है इजरायल का चुनाव

इजरायल के चुनाव पर भारत की भी नजर है। भारत और इजरायल के संबंध पिछले वर्षों में रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, तकनीक, नवाचार और व्यापार सहित कई क्षेत्रों में विस्तारित हुए हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देश रणनीतिक साझेदार हैं। वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाया गया था। फरवरी 2026 में भी दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क हुआ और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

रक्षा क्षेत्र में भारत-इजरायल सहयोग

भारत और इजरायल के संबंधों का एक प्रमुख आधार रक्षा सहयोग है। दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक, सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग और सैन्य क्षेत्र से जुड़े संपर्क लंबे समय से जारी हैं।

भारत के लिए इजरायल से मिलने वाली रक्षा और निगरानी तकनीक महत्वपूर्ण रही है। इसलिए इजरायल में नई सरकार बनने की स्थिति में भारत यह देखेगा कि रक्षा उद्योग और सुरक्षा सहयोग को लेकर नई सरकार की प्राथमिकताएं क्या रहती हैं।

हालांकि इजरायल में सरकार बदलने की स्थिति में भी भारत-इजरायल संबंधों में तत्काल बड़े बदलाव की संभावना को केवल चुनाव परिणाम के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। दोनों देशों के बीच संस्थागत और रणनीतिक संबंध कई क्षेत्रों में विकसित हो चुके हैं।

कृषि और जल क्षेत्र में भी मजबूत साझेदारी

भारत-इजरायल संबंध केवल रक्षा तक सीमित नहीं हैं। कृषि और जल प्रबंधन में भी दोनों देशों ने कई परियोजनाएं विकसित की हैं।

विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच कृषि सहयोग के तहत कई Centres of Excellence स्थापित किए गए हैं। 2024-26 के लिए छठी तीन वर्षीय कार्ययोजना भी जारी है। इसके अलावा जल संसाधन प्रबंधन में भी दोनों देशों के बीच सहयोग चल रहा है।

इसलिए इजरायल की नई सरकार की आर्थिक और तकनीकी प्राथमिकताओं का असर भारत के साथ चल रहे सहयोग पर भी पड़ सकता है।

व्यापार और तकनीक पर भी रहेगी नजर

भारत और इजरायल के बीच व्यापार में हीरे, पेट्रोलियम उत्पाद और रसायनों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, हाई-टेक उत्पाद, संचार प्रणालियों और चिकित्सा उपकरणों जैसे क्षेत्रों की हिस्सेदारी भी रही है। विदेश मंत्रालय के फरवरी 2026 के दस्तावेज के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 3.75 अरब डॉलर रहा, हालांकि क्षेत्रीय सुरक्षा परिस्थितियों और व्यापार व्यवधानों का असर पड़ा।

इसके अलावा दोनों देशों के बीच नवाचार, अनुसंधान और तकनीकी सहयोग भी जारी है। ऐसे में भारत के लिए चुनाव के बाद बनने वाली सरकार की आर्थिक और तकनीकी नीति महत्वपूर्ण रहेगी।

चुनाव के बाद क्या होगा?

27 अक्टूबर को मतदान समाप्त होने के बाद शुरुआती एग्जिट पोल सामने आ सकते हैं, लेकिन वास्तविक सरकार बनने की तस्वीर तुरंत साफ होना जरूरी नहीं है। चुनावी व्यवस्था में 120 सीटों के अनुपातिक आवंटन के बाद राष्ट्रपति संबंधित दलों से बातचीत करके उस नेता को सरकार बनाने का मौका देते हैं जिसके पास बहुमत जुटाने की सबसे अधिक संभावना हो। सरकार बनाने के लिए गठबंधन वार्ता की प्रक्रिया में समय लग सकता है।

यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद भी इजरायल की राजनीति में कई दिनों तक बातचीत और राजनीतिक समीकरणों का दौर जारी रह सकता है।

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल क्या?

भारत के लिए मुख्य सवाल यह होगा कि इजरायल की अगली सरकार रक्षा, तकनीक, कृषि, जल और व्यापार जैसे क्षेत्रों में मौजूदा सहयोग को किस तरह आगे बढ़ाती है। इसके साथ ही गाजा, ईरान और व्यापक पश्चिम एशिया में तनाव को लेकर नई सरकार की नीति भी नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण होगी।

भारत एक ओर इजरायल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत करता रहा है, वहीं फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी उसका अपना ऐतिहासिक और कूटनीतिक रुख है। इसलिए क्षेत्रीय संघर्षों के बीच भारत के लिए संतुलित विदेश नीति बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा।

फिलहाल 27 अक्टूबर का चुनाव नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ इजरायल की अगली सरकार की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण चरण है। हालांकि अंतिम राजनीतिक तस्वीर केवल मतदान से नहीं, बल्कि 120 सदस्यीय नेसेट में सीटों के वितरण और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ता से स्पष्ट होगी।

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