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यूपी में जमीन-मकान खरीदने वालों के लिए बड़ा बदलाव! रजिस्ट्री के बाद अब नहीं लगानी पड़ेगी दफ्तरों की दौड़, सरकार ने शुरू की खास तैयारी

 


उत्तर प्रदेश में जमीन या मकान खरीदने की तैयारी कर रहे लोगों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। योगी सरकार संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद होने वाली नामांतरण यानी दाखिल-खारिज की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने की दिशा में काम कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने के बाद रजिस्ट्री कराने वाले व्यक्ति को नामांतरण के लिए अलग से सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम हो सकती है।

सरकार ऐसी डिजिटल व्यवस्था तैयार करने पर काम कर रही है, जिसमें संपत्ति की रजिस्ट्री होते ही उससे जुड़ी आवश्यक जानकारी संबंधित राजस्व विभाग, नगर निकाय या विकास प्राधिकरण तक डिजिटल माध्यम से पहुंच सके। इसके बाद संबंधित रिकॉर्ड में नए मालिक का नाम दर्ज करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकेगा।

हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह व्यवस्था अभी पूरे उत्तर प्रदेश में लागू नहीं हुई है। सरकार फिलहाल इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट और जरूरी तकनीकी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं की तैयारी कर रही है।

रजिस्ट्री के बाद अपने आप होगा नामांतरण?

लखनऊ में 26 अक्टूबर को मुख्य सचिव एसपी गोयल की अध्यक्षता में स्टाम्प एवं पंजीयन विभाग की समीक्षा बैठक हुई। बैठक में संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद स्वतः नामांतरण, यूनिक प्रॉपर्टी आईडी, जमीन के दस्तावेजों का ऑनलाइन सत्यापन और साइबर तहसील जैसी व्यवस्थाओं पर चर्चा की गई।

सरकार का उद्देश्य रजिस्ट्री और संपत्ति से जुड़े अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड को डिजिटल माध्यम से आपस में जोड़ना है। मौजूदा व्यवस्था में रजिस्ट्री के बाद संपत्ति के रिकॉर्ड को अपडेट कराने के लिए कई मामलों में खरीदार को अलग प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

प्रस्तावित डिजिटल व्यवस्था में रजिस्ट्री के समय दर्ज की गई जानकारी संबंधित विभागों तक पहुंचाई जा सकेगी। इससे नामांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में आसानी हो सकती है।

हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि भविष्य में हर संपत्ति का नामांतरण पूरी तरह स्वतः होगा या कुछ मामलों में अधिकारी द्वारा दस्तावेजों और स्वामित्व की जांच जरूरी रहेगी। अंतिम नियम और एसओपी तैयार होने के बाद ही इसकी तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।

जमीन खरीदारों को क्या फायदा होगा?

अगर प्रस्तावित व्यवस्था सफल होती है और प्रदेश में लागू की जाती है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा जमीन और मकान खरीदने वाले लोगों को मिल सकता है।

अभी कई मामलों में व्यक्ति को रजिस्ट्री कराने के बाद संबंधित राजस्व कार्यालय या स्थानीय निकाय में अपना नाम दर्ज कराने के लिए अलग से प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। इसे आम भाषा में दाखिल-खारिज या नामांतरण कहा जाता है।

नई व्यवस्था में रजिस्ट्री से संबंधित जरूरी जानकारी डिजिटल माध्यम से संबंधित विभाग तक पहुंच सकती है। इससे आवेदन करने, दस्तावेज जमा करने और रिकॉर्ड अपडेट कराने में लगने वाला समय कम हो सकता है।

इससे सरकारी कार्यालयों में अनावश्यक दौड़-भाग कम होने के साथ-साथ रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।

यूपी की 56.57 लाख संपत्तियां पोर्टल पर दर्ज

बैठक में प्रदेश की संपत्तियों के डिजिटल रिकॉर्ड से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी भी सामने आई। बताया गया कि उत्तर प्रदेश के ई-नगरसेवा पोर्टल पर करीब 56.57 लाख संपत्तियों का रिकॉर्ड दर्ज है।

इन संपत्तियों के लिए 17 अंकों की यूनिक प्रॉपर्टी आईडी तैयार की जा रही है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से संपत्ति कर के निर्धारण और उसकी वसूली के लिए किया जाता है।

दूसरी ओर कृषि भूमि की पहचान खसरा संख्या के आधार पर होती है। आबादी की भूमि के लिए 13 अंकों की यूनिक आईडी वाली घरौनी तैयार की जा रही है।

सरकार अलग-अलग विभागों में मौजूद संपत्ति रिकॉर्ड को एक व्यवस्थित डिजिटल सिस्टम से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। अगर ये रिकॉर्ड आपस में बेहतर तरीके से जुड़ते हैं, तो भविष्य में संपत्ति की पहचान और स्वामित्व सत्यापन की प्रक्रिया आसान हो सकती है।

10 नगर निकायों में खास तैयारी

नगरीय संपत्तियों के रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने के लिए नक्शा परियोजना के तहत 10 नगर निकायों का चयन किया गया है। इनमें गोरखपुर नगर निगम, झांसी नगर निगम, नवाबगंज (बाराबंकी), हरदोई और चित्रकूटधाम के नगर निकाय भी शामिल हैं।

इन स्थानों पर ई-नगरसेवा पोर्टल और नक्शा परियोजना के तहत तैयार की जा रही यूनिक प्रॉपर्टी आईडी को आपस में जोड़ने की तैयारी की जा रही है।

नक्शा परियोजना के तहत अर्बन प्रॉपर्टी कार्ड तैयार किए जाएंगे। इन कार्डों से शहरी संपत्तियों के स्वामित्व संबंधी जानकारी के सत्यापन में मदद मिलने की उम्मीद है।

चयनित 10 नगर निकायों में परियोजना से संबंधित काम को 31 दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

यहां यह समझना जरूरी है कि 31 दिसंबर 2026 की तारीख स्वतः नामांतरण व्यवस्था को पूरे प्रदेश में लागू करने की अंतिम तारीख नहीं है। यह चयनित नगर निकायों में परियोजना से जुड़े कार्यों को पूरा करने का लक्ष्य है।

लखनऊ विकास प्राधिकरण में होगा पायलट प्रोजेक्ट

रजिस्ट्री के बाद स्वतः नामांतरण की व्यवस्था को लागू करने से पहले इसका परीक्षण किया जाएगा। इसके लिए अलग-अलग विभागों से पायलट संस्थाओं का चयन किया जाना है।

आवास एवं शहरी नियोजन विभाग ने इसके लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी एलडीए को पायलट संस्था के रूप में चुना है।

इसके अलावा राजस्व विभाग कुछ राजस्व गांवों का चयन करेगा। नगर विकास विभाग कम से कम एक नगर निकाय को इस परीक्षण से जोड़ेगा। औद्योगिक विकास विभाग यमुना औद्योगिक विकास प्राधिकरण या किसी अन्य उपयुक्त प्राधिकरण को पायलट के लिए चुन सकता है।

इन संस्थाओं को स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग की डिजिटल प्रणाली से जोड़ा जाएगा। इसके जरिए यह जांचा जाएगा कि रजिस्ट्री के बाद संपत्ति से जुड़ी जानकारी संबंधित विभाग तक कितनी आसानी और तेजी से पहुंचाई जा सकती है।

जमीन बेचते समय दस्तावेजों का सत्यापन जरूरी

सरकार की इस पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संपत्ति के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों का सत्यापन भी है। जमीन की खरीद-बिक्री में फर्जी दस्तावेज, गलत स्वामित्व और रिकॉर्ड में गड़बड़ी जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं।

इन्हें रोकने के लिए संबंधित विभागों से मान्य स्वामित्व दस्तावेजों की पहचान करने को कहा गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन बेचने के अधिकार की प्रथम दृष्टया पुष्टि के लिए खतौनी और घरौनी को महत्वपूर्ण दस्तावेज माना गया है।

वहीं शहरी क्षेत्रों और विकास प्राधिकरणों से जुड़ी संपत्तियों में आवंटन पत्र, रजिस्ट्री, बैनामा और लीज डीड जैसे दस्तावेज स्वामित्व की पुष्टि में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संपत्ति का रिकॉर्ड अपडेट करते समय सही व्यक्ति के नाम पर ही प्रक्रिया आगे बढ़े।

रजिस्ट्री और दाखिल-खारिज एक नहीं हैं

जमीन या मकान खरीदने वाले लोगों के लिए रजिस्ट्री और नामांतरण के बीच का अंतर समझना बेहद जरूरी है।

रजिस्ट्री संपत्ति की खरीद-बिक्री से संबंधित दस्तावेज का कानूनी पंजीकरण है। जब खरीदार और विक्रेता के बीच बिक्री का दस्तावेज पंजीकृत होता है, तो संपत्ति के हस्तांतरण का कानूनी दस्तावेज तैयार होता है।

दूसरी ओर नामांतरण या दाखिल-खारिज संबंधित राजस्व या स्थानीय निकाय के रिकॉर्ड में नए मालिक का नाम दर्ज करने की प्रक्रिया है।

इसलिए केवल रजिस्ट्री हो जाने का मतलब यह नहीं है कि हर मामले में राजस्व रिकॉर्ड अपने आप अपडेट हो गया। सरकार की प्रस्तावित पहल इसी अलग प्रक्रिया को रजिस्ट्री के डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ने की दिशा में है।

अभी आम लोगों को क्या करना चाहिए?

चूंकि स्वतः नामांतरण की व्यवस्था अभी पूरे प्रदेश में लागू नहीं हुई है, इसलिए जमीन या मकान खरीदने वाले लोगों को मौजूदा नियमों के अनुसार ही नामांतरण की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।

जब तक संबंधित विभाग आधिकारिक रूप से नई व्यवस्था लागू नहीं करते, तब तक यह मान लेना सही नहीं होगा कि रजिस्ट्री के बाद नाम अपने आप रिकॉर्ड में दर्ज हो जाएगा।

खरीदारों को रजिस्ट्री के साथ-साथ अपने संपत्ति रिकॉर्ड, खसरा-खतौनी, घरौनी या संबंधित निकाय के दस्तावेजों को भी सुरक्षित रखना चाहिए। किसी भी संपत्ति की खरीद से पहले स्वामित्व और रिकॉर्ड का सत्यापन कराना भी महत्वपूर्ण है।

कब से लागू होगी नई व्यवस्था?

फिलहाल सरकार ने स्वतः नामांतरण की व्यवस्था को पूरे उत्तर प्रदेश में लागू करने की कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की है।

राजस्व अभिलेखों के ऑनलाइन सत्यापन और रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया तय करने के लिए महानिरीक्षक निबंधन की अध्यक्षता में 5 अक्टूबर 2026 को एक समिति गठित की गई थी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर राजस्व विभाग मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार करेगा।

इसके बाद पायलट प्रोजेक्ट के जरिए व्यवस्था का परीक्षण किया जाएगा। परीक्षण में सामने आने वाली तकनीकी और प्रशासनिक समस्याओं को दूर करने के बाद ही इसे व्यापक स्तर पर लागू करने को लेकर फैसला लिया जा सकता है।

संपत्ति खरीदने वालों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

अगर यह व्यवस्था सफलतापूर्वक लागू होती है तो उत्तर प्रदेश में जमीन और मकान की खरीद-बिक्री से जुड़ी सरकारी प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आ सकता है। रजिस्ट्री, राजस्व रिकॉर्ड, नगर निकाय और विकास प्राधिकरणों के रिकॉर्ड को डिजिटल माध्यम से जोड़ने से संपत्ति की पहचान और स्वामित्व सत्यापन आसान हो सकता है।

इससे खरीदारों के लिए नामांतरण की प्रक्रिया सरल होने, रिकॉर्ड अपडेट होने में लगने वाला समय कम होने और सरकारी कार्यालयों के चक्कर घटने की उम्मीद है।

हालांकि, इस पूरी व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अलग-अलग विभागों के डिजिटल रिकॉर्ड कितनी प्रभावी तरीके से आपस में जुड़ते हैं और स्वामित्व से जुड़े विवादों या अपूर्ण दस्तावेजों की स्थिति में जांच की प्रक्रिया कैसी रखी जाती है।

फिलहाल इसे रजिस्ट्री के बाद नामांतरण को आसान बनाने की तैयारी के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि पूरे उत्तर प्रदेश में लागू हो चुकी व्यवस्था के रूप में। पायलट प्रोजेक्ट, समिति की रिपोर्ट और एसओपी तैयार होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आम लोगों को इसका लाभ कब से और किस रूप में मिलेगा।

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