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पत्नी का शव लेकर नदी की ओर निकल पड़ा मजबूर पति! जेब में नहीं थे अंतिम संस्कार के पैसे, नर्स ने देखा तो खुला ऐसा राज कि मच गया हड़कंप



जबलपुर से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने गरीबी, स्वास्थ्य व्यवस्था और इंसानियत—तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मजदूर ने दावा किया कि इलाज के दौरान पत्नी की मौत के बाद उसके पास इतना पैसा भी नहीं बचा था कि वह उसका अंतिम संस्कार कर सके। हालात से टूट चुके पति ने कथित तौर पर शव को नदी में प्रवाहित करने का फैसला कर लिया था। इसी दौरान अस्पताल की एक नर्स की नजर उस पर पड़ गई और उसने उसे रोक लिया।

इसके बाद एक सामाजिक संस्था की मदद से महिला का अंतिम संस्कार कराया गया। घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को इलाज के दौरान किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में गरीब मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं की पर्याप्त निगरानी हो रही है।

मामला मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के मगरमुंहा गांव का बताया जा रहा है। यहां रहने वाले 51 वर्षीय मजदूर श्याम विश्वकर्मा की 41 वर्षीय पत्नी आरती विश्वकर्मा सड़क हादसे के बाद लंबे समय से इलाज करा रही थीं। परिवार के मुताबिक, करीब छह महीने पहले सड़क दुर्घटना में आरती घायल हुई थीं। उनके पैर की सर्जरी भी कराई गई थी।

डॉक्टरों ने घाव की नियमित ड्रेसिंग कराने और संक्रमण से बचाव के लिए विशेष देखभाल की सलाह दी थी। लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण परिवार के सामने इलाज जारी रखना बड़ी चुनौती बन गया।

बेटे ने मजदूरी कर जुटाए इलाज के पैसे

परिवार के मुताबिक, आरती के इलाज के लिए घर के लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार हर संभव कोशिश की। परिवार का नाबालिग बेटा भी मां के इलाज के लिए पैसे जुटाने में लग गया।

बताया गया कि उसने ढाबों और होटलों में काम किया तथा मजदूरी से मिलने वाली रकम मां के इलाज में लगाई। परिवार का दावा है कि इलाज में करीब 5 से 7 हजार रुपये खर्च होने के बावजूद आरती की हालत में सुधार नहीं हुआ।

स्थिति बिगड़ने पर उन्हें जबलपुर जिला अस्पताल के गैंगरीन वार्ड में भर्ती कराया गया। यहीं से परिवार ने सरकारी अस्पताल की व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप लगाए।

परिवार का आरोप—ड्रेसिंग के लिए मांगे जाते थे पैसे

श्याम विश्वकर्मा का आरोप है कि अस्पताल में उनकी पत्नी के घाव की ड्रेसिंग के लिए हर बार 100 रुपये मांगे जाते थे। परिवार का कहना है कि शुरुआती दो दिनों तक उन्होंने किसी तरह यह रकम दी, लेकिन बाद में उनके पास पैसे खत्म हो गए।

श्याम के मुताबिक, जब वह ड्रेसिंग के लिए पैसे नहीं दे सके तो कथित तौर पर उनकी पत्नी की ड्रेसिंग नहीं की गई। परिवार का दावा है कि करीब 48 घंटे तक ड्रेसिंग नहीं होने के बाद घाव की स्थिति बेहद खराब हो गई और उसमें कीड़े पड़ गए।

इसके बाद आरती की हालत और बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई।

हालांकि, ड्रेसिंग के बदले पैसे मांगने और ड्रेसिंग न करने के इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अस्पताल प्रशासन की जांच और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में क्या हुआ था।

पत्नी की मौत के बाद टूट गया परिवार

आरती की मौत के बाद परिवार के सामने एक और बड़ी समस्या खड़ी हो गई। श्याम के पास अंतिम संस्कार के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे।

आर्थिक तंगी और पत्नी को खोने के सदमे के बीच वह कथित तौर पर शव लेकर अस्पताल से बाहर निकलने लगा। परिवार के मुताबिक, उसके पास अंतिम संस्कार कराने तक के पैसे नहीं थे।

इसी दौरान अस्पताल की एक नर्स की नजर उस पर पड़ गई। नर्स ने उसे रोका और उसकी स्थिति के बारे में पूछा।

श्याम ने कथित तौर पर अपनी आर्थिक मजबूरी बताते हुए कहा कि उसके पास पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं हैं। इसी मजबूरी में उसने शव को मां नर्मदा में प्रवाहित करने का मन बना लिया था।

यह बात सामने आते ही अस्पताल में मौजूद लोगों के बीच हड़कंप मच गया और परिवार की मदद के प्रयास शुरू हुए।

स्वास्थ्य विभाग ने क्या कहा?

मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने भी इसे संज्ञान में लिया।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नवीन कोठारी के अनुसार, गैंगरीन वार्ड में ड्रेसिंग का काम करने वाले कर्मचारियों को इसके लिए अलग से भत्ता दिया जाता है। ऐसे में अगर मरीज या उसके परिवार से ड्रेसिंग के नाम पर अतिरिक्त पैसे मांगे गए हैं, तो यह गंभीर मामला हो सकता है।

अधिकारी ने कहा कि यदि अवैध वसूली के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं या इस संबंध में लिखित शिकायत मिलती है, तो संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इस बयान के बाद अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि अस्पताल में मरीजों की ड्रेसिंग किस प्रक्रिया के तहत की गई और क्या परिवार से वास्तव में किसी तरह की राशि मांगी गई थी।

सामाजिक संस्था ने आगे बढ़कर की मदद

जब परिवार की आर्थिक स्थिति और अंतिम संस्कार के लिए पैसे न होने की जानकारी सामने आई तो अस्पताल के कर्मचारियों ने सामाजिक संस्था गरीब नवाज कमेटी से संपर्क किया।

संस्था के इनायत अली अपने साथियों के साथ अस्पताल पहुंचे। उन्होंने परिवार को मदद का भरोसा दिया और अंतिम संस्कार की व्यवस्था की।

सबसे खास बात यह रही कि संस्था ने महिला का अंतिम संस्कार उसके धर्म के अनुसार हिंदू रीति-रिवाजों से कराया। गौरीघाट मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार संपन्न कराया गया।

इस दौरान संस्था के सदस्यों ने परिवार को आर्थिक और भावनात्मक सहारा भी दिया।

इनायत अली ने कहा कि अगर समय रहते श्याम को नहीं रोका जाता तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी। उनके मुताबिक, परिवार की आर्थिक मजबूरी को देखते हुए सबसे पहले अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना जरूरी था।

घटना ने खड़े किए कई बड़े सवाल

यह घटना केवल एक गरीब परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि इसके जरिए स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कई सवाल सामने आते हैं।

सबसे पहला सवाल यह है कि अगर सरकारी अस्पताल में किसी प्रक्रिया के लिए मरीज से पैसे मांगे जाते हैं तो उसकी निगरानी कौन करता है? दूसरा सवाल यह है कि बेहद गरीब परिवारों को इलाज और दवाओं के अलावा अंतिम संस्कार जैसी आपात स्थिति में किस तरह की सहायता उपलब्ध कराई जाती है?

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आर्थिक तंगी के कारण किसी मरीज का इलाज प्रभावित होना चाहिए?

अगर परिवार के आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला बेहद गंभीर होगा। वहीं बिना जांच के किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

गरीब परिवारों के लिए इलाज बन जाता है बड़ी चुनौती

भारत में सरकारी अस्पताल गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। लेकिन इलाज के दौरान दवाओं, जांच, आने-जाने और दूसरी जरूरतों का खर्च कई परिवारों के लिए भारी पड़ सकता है।

ऐसे परिवारों में बीमारी केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं रहती, बल्कि आर्थिक संकट भी बन जाती है। लंबे समय तक इलाज चलने पर परिवार की रोज की कमाई प्रभावित होती है और कई बार घर के दूसरे सदस्यों को भी काम छोड़कर मरीज की देखभाल करनी पड़ती है।

श्याम और आरती की कहानी इसी आर्थिक मजबूरी की एक बेहद दर्दनाक तस्वीर सामने रखती है।

अब जांच से साफ होगी सच्चाई

फिलहाल इस मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि ड्रेसिंग के लिए पैसे मांगने के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि आरती की चिकित्सा स्थिति क्या थी, इलाज के दौरान कौन-कौन सी प्रक्रियाएं की गईं और उनकी मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था।

अगर किसी कर्मचारी की लापरवाही या अवैध वसूली सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। दूसरी ओर अगर आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो तथ्यों को स्पष्ट रूप से सामने रखना भी जरूरी होगा।

लेकिन इस पूरी घटना का सबसे मानवीय पहलू यह है कि एक परिवार गरीबी के कारण अपनी पत्नी और मां को खोने के बाद उसके अंतिम संस्कार तक के लिए असहाय हो गया था। ऐसे समय में अस्पताल की नर्स का उसे रोकना और सामाजिक संस्था का आगे आकर अंतिम संस्कार कराना इंसानियत की एक मिसाल जरूर बन गया।

आरती की मौत के कारण और अस्पताल में लगाए गए आरोपों की अंतिम सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन यह घटना इतना जरूर बताती है कि गरीब परिवार के लिए बीमारी केवल इलाज का सवाल नहीं होती—कई बार यह उसके पूरे परिवार के अस्तित्व की परीक्षा बन जाती है।

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