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जिसे रोज टॉयलेट में बहा देते हैं, वही निकला खेती का ‘लिक्विड गोल्ड’! वैज्ञानिकों के इस प्रयोग ने दुनिया को चौंकाया



दुनिया भर में खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और इसमें फर्टिलाइजर की कीमत एक बड़ी चिंता बनती जा रही है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्वों पर आधारित खाद आधुनिक कृषि के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन इनके उत्पादन और सप्लाई पर ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन की स्थिति का असर पड़ता है। सितंबर 2026 में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फर्टिलाइजर सप्लाई को लेकर दबाव बना हुआ है। भारत में भी फर्टिलाइजर उद्योग को सल्फर जैसी जरूरी कच्ची सामग्री की महंगी और सीमित आपूर्ति जैसी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

इसी बीच वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ एक ऐसे संसाधन पर ध्यान दे रहे हैं, जिसे इंसान रोजाना टॉयलेट में फ्लश करके नाली में बहा देता है। यह संसाधन है मानव यूरिन यानी पेशाब। सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन यूरिन में पौधों के लिए जरूरी नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम और कई अन्य पोषक तत्व मौजूद होते हैं। दुनिया के कई हिस्सों में वैज्ञानिक अब इसे अलग करके सुरक्षित तरीके से कृषि में इस्तेमाल करने की तकनीक पर काम कर रहे हैं।

इस पूरी प्रक्रिया को आम तौर पर “Peecycling” यानी यूरिन से पोषक तत्वों को वापस कृषि चक्र में लाने की प्रक्रिया कहा जाता है। अमेरिका के Rich Earth Institute जैसे संगठन वर्षों से इस दिशा में शोध और खेतों में परीक्षण कर रहे हैं। उनके परीक्षणों में यूरिन से तैयार उर्वरक का इस्तेमाल कई फसलों में किया गया है और कुछ परिस्थितियों में पैदावार सिंथेटिक खाद के बराबर पाई गई है।

आखिर यूरिन में ऐसा क्या है जिसे वैज्ञानिक ‘लिक्विड गोल्ड’ कह रहे हैं?

मानव शरीर भोजन से जरूरी पोषक तत्वों का इस्तेमाल करता है और अतिरिक्त नाइट्रोजन तथा अन्य तत्वों का एक हिस्सा यूरिन के जरिए बाहर निकालता है। यही कारण है कि यूरिन में पौधों के लिए उपयोगी पोषक तत्वों की अच्छी मात्रा मिलती है।

Rich Earth Institute के अनुसार मानव यूरिन में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम के साथ-साथ कई सेकेंडरी और माइक्रोन्यूट्रिएंट भी पाए जाते हैं। उनके 2026 के किसान गाइड में संग्रहित यूरिन के एक नमूने का लगभग 0.6-0.1-0.2 NPK अनुपात बताया गया है, हालांकि वास्तविक पोषक तत्वों की मात्रा व्यक्ति, पानी की मात्रा, संग्रह और अन्य परिस्थितियों के आधार पर बदल सकती है।

यूरिन की खासियत यह है कि इसमें मौजूद पोषक तत्व पहले से ही पौधों के लिए अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध रूप में होते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे सिर्फ अपशिष्ट के रूप में देखने के बजाय संसाधन के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावना तलाश रहे हैं।

सीवेज में सिर्फ थोड़ा सा यूरिन, लेकिन पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा

टॉयलेट में यूरिन को पानी के साथ फ्लश करने के बाद यह सीवेज सिस्टम का हिस्सा बन जाता है। इसके बाद नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्वों को दोबारा अलग करने के लिए ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ती है।

Rich Earth Institute के मुताबिक, यूरिन मानव अपशिष्ट में मौजूद फर्टिलाइजर पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा अपने साथ ले जाता है। संस्थान के अनुसार रोजाना फ्लश किए जाने वाले नाइट्रोजन का लगभग 80-85 प्रतिशत और फास्फोरस का करीब 66 प्रतिशत हिस्सा यूरिन से जुड़ा हो सकता है।

यही कारण है कि source separation यानी टॉयलेट के स्तर पर यूरिन को बाकी अपशिष्ट से अलग करने की अवधारणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

अगर यूरिन को शुरुआत में ही अलग कर लिया जाए तो उसमें मौजूद पोषक तत्वों को बाद में प्रोसेस करके खाद में बदलना आसान हो सकता है। इसके अलावा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पर नाइट्रोजन और फास्फोरस हटाने का दबाव भी कम किया जा सकता है।

हजारों साल पुराना है यूरिन को खाद की तरह इस्तेमाल करने का विचार

मानव यूरिन का खेती में इस्तेमाल कोई पूरी तरह आधुनिक खोज नहीं है। इतिहास में अलग-अलग सभ्यताओं ने मानव और पशु अपशिष्ट को कृषि में वापस इस्तेमाल किया है। आधुनिक सीवेज सिस्टम आने से पहले मानव समाज के पास कचरे और पोषक तत्वों को खेतों में वापस पहुंचाने के स्थानीय तरीके मौजूद थे।

लेकिन औद्योगिक युग में स्थिति बदल गई। शहरों में बड़े पैमाने पर सीवेज सिस्टम बने और मानव अपशिष्ट को कृषि संसाधन की जगह कचरे के रूप में देखा जाने लगा।

इसके बाद बीसवीं सदी में सिंथेटिक फर्टिलाइजर ने कृषि को पूरी तरह बदल दिया। विशेष रूप से Haber-Bosch प्रक्रिया के जरिए बड़े पैमाने पर नाइट्रोजन खाद का उत्पादन संभव हुआ। इससे कृषि उत्पादकता बढ़ाने में बड़ी मदद मिली, लेकिन इसके साथ ऊर्जा खपत, कार्बन उत्सर्जन और संसाधनों के अत्यधिक दोहन से जुड़े सवाल भी सामने आए।

केमिकल खाद की जगह यूरिन कितना बड़ा विकल्प बन सकता है?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। वैज्ञानिक अभी यह नहीं कह रहे कि दुनिया की पूरी खेती को अचानक यूरिन से मिलने वाली खाद से चलाया जा सकता है।

बल्कि शोध का उद्देश्य यह देखना है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पोषक तत्वों को वापस कृषि चक्र में कैसे लाया जाए।

नाइट्रोजन फर्टिलाइजर का औद्योगिक उत्पादन काफी ऊर्जा मांगता है। दूसरी तरफ फास्फोरस फर्टिलाइजर के लिए खनन किए जाने वाले फॉस्फेट रॉक के भंडार सीमित प्राकृतिक संसाधन हैं। ऐसे में यूरिन से इन पोषक तत्वों का कुछ हिस्सा वापस हासिल करना एक circular nutrient economy का हिस्सा बन सकता है।

यानी किसान खेत से फसल पैदा करें, इंसान फसल खाए, शरीर अतिरिक्त पोषक तत्वों को यूरिन के माध्यम से बाहर निकाले और उन्हीं पोषक तत्वों को फिर से खेत तक पहुंचा दिया जाए।

यह मॉडल प्राकृतिक पोषक चक्र के ज्यादा करीब है।

महंगे फर्टिलाइजर के दौर में क्यों बढ़ रही है दिलचस्पी?

फर्टिलाइजर की कीमतें केवल किसानों की स्थानीय मांग और आपूर्ति पर निर्भर नहीं करतीं। प्राकृतिक गैस, ऊर्जा कीमतें, खनिज संसाधन, समुद्री परिवहन, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियां भी इन पर असर डालती हैं।

हालिया वैश्विक परिस्थितियों में फर्टिलाइजर सप्लाई को लेकर दबाव फिर चर्चा में है। सितंबर 2026 की रिपोर्टों में भारत के लिए सल्फर सप्लाई और कीमतों को नई चुनौती बताया गया है, जबकि अमेरिका और अन्य देशों में पोटाश तथा अन्य फर्टिलाइजर की वैश्विक सप्लाई को लेकर भी व्यापारिक गतिविधियां जारी हैं।

ऐसे समय में स्थानीय संसाधनों से कुछ मात्रा में पोषक तत्व हासिल करना किसानों और नगर निकायों के लिए रणनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है।

यूरिन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसका उत्पादन किसी खदान, कारखाने या आयातित कच्चे माल पर निर्भर नहीं है। इंसानी आबादी जहां है, वहां यूरिन भी मौजूद है।

घर के टॉयलेट से लेकर बड़े स्टेडियम तक बदल सकता है सिस्टम

यूरिन को खाद में बदलने के लिए सबसे पहली जरूरत है इसे सामान्य फ्लशिंग सिस्टम से अलग करना।

इसके लिए urine-diverting toilets विकसित किए गए हैं। इनमें यूरिन और ठोस मानव अपशिष्ट अलग-अलग रास्तों से जाते हैं। इससे यूरिन को अपेक्षाकृत साफ रूप में संग्रहित किया जा सकता है और बाद में उसका उपचार किया जा सकता है।

सार्वजनिक यूरिनल भी इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं क्योंकि वहां बड़ी संख्या में लोगों का यूरिन एक जगह इकट्ठा किया जा सकता है।

Rich Earth Institute अमेरिका में सामुदायिक स्तर पर यूरिन संग्रह और उससे उर्वरक तैयार करने का कार्यक्रम चला रहा है। संस्थान के अनुसार वह हर वर्ष स्थानीय किसान साझेदारों को 12,000 गैलन से अधिक urine-derived fertilizer उपलब्ध करा रहा है।

यानी यह सिर्फ लैब में चल रहा प्रयोग नहीं है। कुछ जगहों पर इसे वास्तविक कृषि व्यवस्था में भी आजमाया जा रहा है।

खेतों में हुए प्रयोगों में क्या सामने आया?

इस तकनीक को लेकर सबसे अहम सवाल यही है कि क्या यूरिन से तैयार खाद वास्तव में फसल उगा सकती है?

Rich Earth Institute के कई वर्षों के परीक्षणों में इसका जवाब कई फसलों के मामले में सकारात्मक रहा है। संस्थान ने घास, मक्का, फूल, भांग, अंजीर और अन्य पौधों पर urine-derived fertilizer का परीक्षण किया है।

कुछ परीक्षणों में यूरिन से खाद पाने वाली फसलों की पैदावार सिंथेटिक खाद से उगाई गई फसलों के समान रही। संस्थान ने ड्रिप इरिगेशन के जरिए urine fertigation का भी परीक्षण किया है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर फसल, हर मिट्टी और हर जलवायु में परिणाम समान होंगे। यूरिन की पोषक संरचना बदलती है और इसे सही मात्रा, सही समय और सही तरीके से इस्तेमाल करना जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल—क्या यूरिन से उगी फसल सुरक्षित है?

यही इस पूरी तकनीक का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।

मानव यूरिन में पोषक तत्वों के साथ कुछ दवाओं के अवशेष और अन्य माइक्रोपॉल्यूटेंट मौजूद हो सकते हैं। इसी कारण वैज्ञानिक urine-derived fertilizer की सुरक्षा पर लगातार शोध कर रहे हैं।

2026 की एक वैज्ञानिक समीक्षा ने भी दवाओं, हार्मोन, रोगजनकों और अन्य contaminants की मौजूदगी को महत्वपूर्ण शोध विषय बताया है।

Rich Earth Institute भी pharmaceuticals के संभावित अवशेषों पर अध्ययन कर रहा है। उसके शोध के अनुसार अब तक किए गए अध्ययनों में पौधों के ऊतकों में पाए गए कुछ pharmaceutical residues की मात्रा बहुत कम रही है, लेकिन इस क्षेत्र में शोध अभी जारी है।

इसलिए बिना किसी प्रक्रिया या स्थानीय खाद्य-सुरक्षा नियमों की जानकारी के मानव यूरिन को सीधे खाद के रूप में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना उचित नहीं माना जाना चाहिए।

सैनिटाइजेशन और प्रोसेसिंग है सबसे जरूरी कदम

बड़े स्तर पर इस्तेमाल के लिए यूरिन को सुरक्षित तरीके से संभालना जरूरी है। इसके लिए pasteurization, storage, stabilization और nutrient concentration जैसी तकनीकों पर काम हो रहा है।

Rich Earth Institute ने सामुदायिक स्तर पर सैनिटाइज्ड यूरिन तैयार करने के लिए pasteurization प्रणाली विकसित की है। इसके अलावा concentrated urine fertilizer और nitrogen stabilization जैसी तकनीकों पर भी शोध जारी है।

प्रोसेसिंग का एक फायदा यह भी है कि यूरिन में पानी की मात्रा काफी अधिक होती है। अगर इसे बिना प्रोसेस किए लंबी दूरी तक ले जाया जाए तो परिवहन और भंडारण की लागत बढ़ सकती है। इसलिए भविष्य में ऐसी तकनीकें महत्वपूर्ण हो सकती हैं जो पोषक तत्वों को कम मात्रा में अधिक concentrated fertilizer के रूप में उपलब्ध कराएं।

क्या यह खेती का भविष्य बन सकता है?

यूरिन से खाद बनाने की तकनीक को लेकर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। लेकिन इसे अभी किसी जादुई समाधान के रूप में देखना सही नहीं होगा।

इस मॉडल की सफलता के लिए अलग टॉयलेट सिस्टम, पाइपलाइन, संग्रह केंद्र, सैनिटाइजेशन, गुणवत्ता परीक्षण, परिवहन, किसान प्रशिक्षण और स्पष्ट नियामकीय व्यवस्था की जरूरत होगी।

इसके अलावा लोगों की मानसिक झिझक भी एक बड़ी चुनौती है। जिस चीज को समाज दशकों से “कचरा” समझता आया है, उसे दोबारा संसाधन मानने में समय लग सकता है।

फिर भी इसका मूल विचार बेहद महत्वपूर्ण है—जिस पोषक तत्व को हम आज सीवेज में बहा रहे हैं, उसे दोबारा खेत तक पहुंचाया जा सकता है।

भविष्य की खेती शायद केवल ज्यादा खाद बनाने पर निर्भर न हो, बल्कि पहले से मौजूद पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से recycle करने पर भी निर्भर करे। अगर वैज्ञानिक सुरक्षा, लागत और बड़े पैमाने पर संग्रह की समस्याओं का समाधान कर लेते हैं, तो टॉयलेट से निकलने वाला यह “लिक्विड गोल्ड” आने वाले वर्षों में circular agriculture का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

यानी जिस चीज को आज हम फ्लश करके खत्म समझते हैं, हो सकता है कल वही खेतों के लिए एक मूल्यवान संसाधन बन जाए।

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