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SIR पर एक बयान ने बढ़ा दी सियासी हलचल! NDA ने किया स्वागत, विपक्ष ने CEC से इस्तीफा क्यों मांगा?



नई दिल्ली: Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर देश की राजनीति में विवाद और तेज हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से 26 सितंबर 2026 को जारी विस्तृत स्पष्टीकरण के बाद जहां सत्तारूढ़ NDA के नेताओं ने आयोग के बयान का स्वागत करते हुए इसे भ्रम दूर करने वाला बताया, वहीं कांग्रेस समेत कई विपक्षी नेताओं ने आयोग की सफाई को अपर्याप्त बताते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई है। इस पूरे विवाद का केंद्र चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद, SIR से जुड़े फैसलों की प्रक्रिया और मतदाता सूची में बदलाव से संबंधित सवाल हैं।

चुनाव आयोग ने अपने बयान में कहा है कि SIR से संबंधित फैसले पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शामिल हैं। आयोग ने यह भी कहा कि 24 जून 2025 को जारी SIR संबंधी आदेश को तीनों आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी और बाद में उससे जुड़े कुछ पहलुओं को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप आगे बढ़ाया गया।

चंद्रबाबू नायडू ने चुनाव आयोग की सफाई का किया स्वागत

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू ने चुनाव आयोग के संयुक्त स्पष्टीकरण का स्वागत किया। TDP केंद्र की NDA सरकार में प्रमुख सहयोगी दलों में शामिल है। नायडू ने आयोग की ओर से जारी बयान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे SIR को लेकर पैदा हुई गलतफहमियों को दूर करने में मदद मिलेगी।

नायडू की प्रतिक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे पहले TDP समेत NDA के कुछ सहयोगी दलों ने चुनाव आयोग से SIR को लेकर उठ रहे सवालों पर स्पष्टता देने की अपेक्षा की थी। आयोग की ओर से तीनों आयुक्तों के संयुक्त रूप से सामने आने के बाद नायडू ने इसे संवैधानिक संस्थानों की विश्वसनीयता से जोड़कर देखा।

चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर भी वर्तमान में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त तथा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

चिराग पासवान बोले—जनता की चिंताओं का जवाब मिलना जरूरी

केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने भी चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि SIR को लेकर जनता के मन में जो सवाल और चिंताएं सामने आई थीं, उन्हें चुनाव आयोग के समक्ष रखना जरूरी था और आयोग से अपेक्षा थी कि वह इनका स्पष्ट जवाब दे।

चिराग के मुताबिक आयोग ने अपने बयान में SIR की प्रक्रिया, तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच निर्णय प्रक्रिया और कैबिनेट सचिव से संबंधित पत्राचार के बारे में स्थिति स्पष्ट की है। उनका कहना है कि इस तरह की स्पष्टता से चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के विश्वास को मजबूती मिल सकती है।

हालांकि विपक्ष का कहना है कि आयोग की सफाई ने उठाए गए सभी सवालों का समाधान नहीं किया है। यही वजह है कि SIR विवाद राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।

एकनाथ शिंदे ने राहुल गांधी से माफी की मांग की

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने चुनाव आयोग के संयुक्त बयान के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्षी दलों पर निशाना साधा। शिंदे ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग में कथित मतभेद को लेकर विपक्ष ने जो सवाल उठाए थे, वे आयोग के संयुक्त बयान के बाद टिकते नहीं हैं।

उन्होंने राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं से जनता से माफी मांगने की मांग की। शिंदे का कहना था कि संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने से पहले उपलब्ध तथ्यों को देखना चाहिए।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि शिंदे के ये बयान राजनीतिक प्रतिक्रिया हैं। विपक्ष इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और SIR तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अपनी आपत्तियां लगातार सामने रख रहा है।

BJP अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस पर साधा निशाना

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी चुनाव आयोग की सफाई के बाद विपक्ष पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि SIR को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाने से पहले चुनाव आयोग के बयान को देखा जाना चाहिए।

नबीन ने दावा किया कि SIR से जुड़े सभी फैसले पूरे आयोग की सहमति से लिए गए थे। उन्होंने विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का आरोप लगाया और कहा कि चुनावी प्रक्रिया में जीत और हार दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।

उनकी प्रतिक्रिया में यह भी कहा गया कि विपक्ष उन चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता है जब परिणाम उसके पक्ष में नहीं आते। यह BJP का राजनीतिक तर्क है, जबकि विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है।

उपेंद्र कुशवाहा ने भी आयोग की सफाई को सराहा

पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने भी चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि SIR विवाद के बीच आयोग से स्पष्टता की अपेक्षा की जा रही थी और अब आयोग ने इस विषय पर अपना पक्ष सामने रखा है।

कुशवाहा ने लोगों से अपील की कि वे किसी भी दावे को स्वीकार करने से पहले उसके तथ्य और स्रोत की जांच करें। SIR जैसे विषय का सीधा संबंध मतदाता सूची से है, इसलिए इससे जुड़े दावों की पुष्टि करना महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस ने कहा—सफाई से सवाल खत्म नहीं हुए

दूसरी तरफ कांग्रेस ने चुनाव आयोग की सफाई को पर्याप्त नहीं माना। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आयोग के बयान की आलोचना करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई।

कांग्रेस का कहना है कि आयोग का स्पष्टीकरण उन सवालों का पूरी तरह जवाब नहीं देता जो SIR की प्रक्रिया और आयोग के भीतर कथित असहमति को लेकर उठे हैं। पार्टी ने SIR को रोकने की मांग भी की है।

विवाद की पृष्ठभूमि में एक रिपोर्ट का उल्लेख किया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी आपत्तियों की संख्या 14 बताई गई थी और इनमें SIR से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। चुनाव आयोग ने इसका जवाब देते हुए कहा कि संबंधित टिप्पणियां मुख्य रूप से ड्राफ्ट चरण में उठाए गए operational queries, inputs और suggestions थीं तथा अंतिम निर्णय पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए।

Form 6 को लेकर भी विवाद

SIR विवाद में Form 6 भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। Form 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाता का नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। चुनाव आयोग ने अपने हालिया स्पष्टीकरण में कहा कि SIR के दौरान Form 6 में किए गए बदलावों को लेकर जो प्रक्रिया अपनाई गई, वह कानूनी ढांचे के तहत थी और संबंधित बदलावों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के संदर्भ में भी स्पष्ट किया गया है।

कांग्रेस का आरोप है कि Form 6 से जुड़े बदलावों को लेकर आयोग के भीतर ही आपत्तियां उठाई गई थीं। पार्टी का कहना है कि इस मामले में और अधिक पारदर्शिता जरूरी है। दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे।

ओवैसी ने SIR को लेकर अलग सवाल उठाए

AIMIM प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी SIR पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने SIR को अपनी राजनीतिक व्याख्या में “बैकडोर NRC” कहा और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाया।

ओवैसी ने खास तौर पर इस बात पर सवाल उठाया कि आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कथित मतभेदों की खबरें सामने क्यों आईं और कैबिनेट सचिव को पत्र भेजे जाने की वजह क्या थी। हालांकि चुनाव आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि कैबिनेट सचिव को भेजा गया पत्र आयोग की किसी नीति से संबंधित नहीं था, बल्कि आयोग में प्रतिनियुक्ति पर तैनात एक अधिकारी की कार्यप्रणाली से संबंधित था।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी चर्चा में

SIR को लेकर विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इससे संबंधित प्रक्रियाओं और मतदाता सूची में नामों की स्थिति को लेकर न्यायिक स्तर पर भी सवाल उठे हैं।

हाल ही में दिल्ली में SIR प्रक्रिया के दौरान जारी किए गए कुछ नोटिसों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाए और मतदाताओं को जवाब देने के तरीकों को आसान बनाने के सुझाव दिए। इससे साफ है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं।

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर SIR-2026 के लिए मतदाताओं को अपनी पिछली SIR सूची में नाम खोजने और नोटिस से संबंधित दस्तावेज जमा करने की ऑनलाइन सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

आगे क्या होगा?

SIR को लेकर अब दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव सामने हैं। NDA के सहयोगी दल और BJP का कहना है कि चुनाव आयोग ने तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति और निर्णय प्रक्रिया को स्पष्ट कर दिया है। दूसरी ओर कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि आयोग की सफाई उनके सवालों का पर्याप्त जवाब नहीं देती और प्रक्रिया को लेकर अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता है।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि चुनाव आयोग स्वयं SIR से जुड़े अपने निर्णयों को सर्वसम्मत बता रहा है, जबकि विपक्षी दल आयोग की कार्यप्रणाली और कुछ प्रक्रियागत फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं। इसलिए आगे की बहस इस बात पर केंद्रित रहने की संभावना है कि SIR के दौरान मतदाता सूची में बदलाव कैसे किए जा रहे हैं, पात्र मतदाताओं के लिए आपत्ति और सुधार की प्रक्रिया कितनी आसान है और आयोग अपनी निर्णय प्रक्रिया को किस तरह सार्वजनिक करता है।

SIR का मुद्दा आने वाले समय में राजनीतिक बहस के साथ-साथ चुनावी प्रक्रिया, मतदाता अधिकार और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े सवालों के केंद्र में बना रह सकता है।

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