थाली में खाना है, फिर भी पोषण की कमी! मोटापा और कम वजन को लेकर सामने आई चौंकाने वाली तस्वीर
नई दिल्ली: भारत में पोषण और स्वास्थ्य को लेकर एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो पहली नजर में विरोधाभासी जरूर लगती है, लेकिन इसके पीछे बदलती जीवनशैली और असमान पोषण व्यवस्था की बड़ी भूमिका है। देश में जहां एक तरफ मोटापा और ओवरवेट लोगों की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ कम वजन और कुपोषण की समस्या भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यानी भारत एक साथ ओवरन्यूट्रिशन और अंडरन्यूट्रिशन की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है।
हाल ही में जारी National Family Health Survey-6 यानी NFHS-6 के निष्कर्षों ने वयस्कों में बढ़ते overweight और obesity को एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने रखा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, NFHS-6 सर्वे 2023-24 के दौरान किया गया था और इसमें देश के 715 जिलों के करीब 6.79 लाख परिवारों को शामिल किया गया।
सरकार ने भी NFHS-6 के विश्लेषण में वयस्कों में बढ़ते lifestyle-related risks और undernutrition के साथ rising overweight/obesity को भारत के लिए dual burden बताया है।
महिलाओं और पुरुषों में बढ़ा ओवरवेट और मोटापे का बोझ
NFHS-6 के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की आयु वाली महिलाओं में 30.7 प्रतिशत महिलाएं overweight या obese पाई गईं। इसी आयु वर्ग के पुरुषों में यह आंकड़ा 27.3 प्रतिशत रहा। सरकार के अनुसार यह NFHS-5 की तुलना में बढ़ोतरी को दर्शाता है।
इस बदलाव को केवल वजन बढ़ने की सामान्य समस्या के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अधिक वजन और मोटापा आगे चलकर कई गैर-संचारी रोगों यानी Non-Communicable Diseases के जोखिम से जुड़े हो सकते हैं। इनमें टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय संबंधी बीमारियां शामिल हैं।
यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब वजन को केवल दिखावट या शरीर के आकार से जोड़कर देखने के बजाय इसे लंबे समय की स्वास्थ्य स्थिति के संदर्भ में देखने पर जोर देते हैं।
दूसरी तरफ कम वजन की समस्या भी खत्म नहीं हुई
भारत की चुनौती सिर्फ बढ़ते मोटापे तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों में अभी भी पर्याप्त और संतुलित पोषण तक पहुंच एक बड़ी समस्या है।
हालिया रिपोर्टों में NFHS-6 के आंकड़ों के आधार पर यह बात सामने आई है कि overweight और obesity बढ़ने के साथ कम BMI यानी below-normal body weight की समस्या में वह गिरावट नहीं आई जिसकी उम्मीद की जा रही थी। इसी वजह से भारत में पोषण की स्थिति को एक दोहरी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
इसका मतलब यह है कि एक ही देश में कुछ लोग जरूरत से ज्यादा कैलोरी और कम पोषक भोजन की वजह से मोटापे का सामना कर रहे हैं, जबकि दूसरी आबादी को पर्याप्त कैलोरी, प्रोटीन, विटामिन और मिनरल तक नहीं मिल पा रहे हैं।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
भारत में खान-पान की आदतें पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली हैं। शहरों में लंबे समय तक बैठकर काम करना, स्क्रीन टाइम बढ़ना, पैदल चलने और शारीरिक गतिविधि में कमी, बाहर का खाना, मीठे पेय, पैकेज्ड फूड और अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन जैसी आदतें वजन बढ़ने की समस्या से जुड़ी हो सकती हैं।
दूसरी तरफ कम आय वाले परिवारों में भोजन की मात्रा के साथ-साथ भोजन की गुणवत्ता भी चुनौती हो सकती है। पेट भरने वाला भोजन उपलब्ध होने के बावजूद उसमें पर्याप्त प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, विटामिन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।
यानी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कितना खा रहा है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि वह क्या खा रहा है।
सिर्फ ज्यादा खाना ही मोटापे की वजह नहीं
अक्सर मोटापे को केवल ज्यादा खाना खाने से जोड़ दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। खान-पान के साथ शारीरिक गतिविधि, नींद, तनाव, आनुवंशिक कारण, कुछ मेडिकल स्थितियां और दवाएं भी वजन को प्रभावित कर सकती हैं।
उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति रोजाना लंबे समय तक बैठकर काम करता है और उसकी शारीरिक गतिविधि बेहद कम है, तो सामान्य मात्रा में खाना खाने के बावजूद वजन बढ़ सकता है।
इसी तरह बच्चों और युवाओं में मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी के सामने ज्यादा समय बिताने की वजह से outdoor physical activity कम हो सकती है।
बच्चों में भी बदल रही पोषण की तस्वीर
पोषण की समस्या केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है। हालिया स्वास्थ्य चर्चाओं में बच्चों में एक ऐसी स्थिति पर भी ध्यान दिया जा रहा है जिसमें बच्चा वजन में ज्यादा हो सकता है, लेकिन उसके शरीर को जरूरी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहे होते।
ऐसा तब हो सकता है जब भोजन में कैलोरी तो ज्यादा हो, लेकिन प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम और अन्य micronutrients पर्याप्त न हों। उदाहरण के तौर पर ज्यादा chips, sugary drinks और fast food खाने से कैलोरी मिल सकती है, लेकिन जरूरी पोषक तत्वों की कमी रह सकती है।
यही वजह है कि बच्चों के मामले में केवल वजन या शरीर देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है।
उत्तर प्रदेश में भी पोषण की चुनौती
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी पोषण की स्थिति को लेकर तस्वीर मिश्रित है। NFHS-6 के अनुसार राज्य में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में stunting यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई की दर में कमी आई है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक UP में child stunting करीब 31.5 प्रतिशत दर्ज की गई है।
वहीं छोटे बच्चों के आहार की गुणवत्ता को लेकर अभी भी चुनौती बनी हुई है। NFHS-6 के अनुसार उत्तर प्रदेश में 6 से 23 महीने की उम्र के केवल 17.1 प्रतिशत बच्चों को पर्याप्त आहार मिलने की बात सामने आई है। यह आंकड़ा NFHS-5 के 5.9 प्रतिशत से बेहतर जरूर है, लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि बड़ी संख्या में बच्चों को अभी भी recommended dietary diversity और पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है।
मोटापा और कम वजन दोनों खतरनाक क्यों?
कम वजन का मतलब हमेशा सिर्फ दुबला शरीर नहीं होता। अगर शरीर को लंबे समय तक पर्याप्त ऊर्जा और पोषक तत्व नहीं मिलते हैं तो कमजोरी, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी, बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं और अन्य स्वास्थ्य परेशानियां हो सकती हैं।
दूसरी तरफ अत्यधिक वजन बढ़ना metabolic health को प्रभावित कर सकता है और डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर तथा हृदय संबंधी बीमारियों जैसे जोखिमों से जुड़ा है।
इसलिए किसी व्यक्ति को केवल इसलिए स्वस्थ नहीं माना जा सकता कि उसका वजन कम है या वह बाहर से पतला दिखाई देता है। इसी तरह केवल सामान्य दिखने वाले वजन के आधार पर भी पूरी स्वास्थ्य स्थिति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
डायबिटीज का आंकड़ा भी बढ़ा
NFHS-6 के आंकड़ों में सिर्फ मोटापे की समस्या ही सामने नहीं आई है। सरकार के अनुसार 15 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में high या very high blood sugar level अथवा blood sugar नियंत्रित करने वाली दवा लेने वालों का अनुपात भी बढ़ा है।
महिलाओं में यह संकेतक NFHS-5 के 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत और पुरुषों में 15.6 प्रतिशत से बढ़कर 20.9 प्रतिशत हुआ।
यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत में lifestyle-related health risks पर ध्यान देना लगातार जरूरी होता जा रहा है।
क्या सिर्फ डाइट बदलने से समस्या हल हो जाएगी?
डाइट निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेले डाइट से हर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। एक स्वस्थ जीवनशैली में संतुलित भोजन के साथ पर्याप्त शारीरिक गतिविधि, अच्छी नींद और नियमित स्वास्थ्य जांच भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भोजन में साबुत अनाज, दालें, फल, सब्जियां, दूध या उपयुक्त विकल्प, नट्स और बीज जैसे पोषक खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। वहीं अत्यधिक मीठे पेय, बहुत ज्यादा प्रोसेस्ड फूड और जरूरत से ज्यादा तला-भुना भोजन सीमित करना उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या किसी बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरतें अलग हो सकती हैं।
भारत के सामने है ‘डबल बर्डन’ की चुनौती
NFHS-6 की तस्वीर यह बताती है कि भारत की पोषण संबंधी चुनौती अब केवल भूख या कम वजन तक सीमित नहीं है। देश को एक तरफ undernutrition और दूसरी तरफ overweight तथा obesity—दोनों समस्याओं से एक साथ निपटना होगा।
सरकार ने भी NFHS-6 के निष्कर्षों में बढ़ती lifestyle diseases, behavioural risks और undernutrition के साथ rising overweight/obesity को प्रमुख उभरती स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल किया है।
यानी आने वाले समय में स्वास्थ्य नीतियों के सामने चुनौती सिर्फ लोगों को पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की नहीं होगी, बल्कि सही मात्रा में सही पोषण वाला भोजन उपलब्ध कराने की भी होगी।
थाली का संतुलन ही सबसे बड़ा सवाल
भारत में मोटापा और कम वजन का एक साथ मौजूद रहना यह बताता है कि सिर्फ कैलोरी की उपलब्धता को स्वास्थ्य का पैमाना नहीं बनाया जा सकता। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भोजन में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन, मिनरल और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का संतुलन होना जरूरी है।
एक तरफ जहां लोगों को अनहेल्दी और अत्यधिक कैलोरी वाले भोजन से बचने की जरूरत है, वहीं कम वजन या कुपोषण से जूझ रहे लोगों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।
यही भारत की नई पोषण चुनौती है—कुछ लोग जरूरत से ज्यादा कैलोरी ले रहे हैं, जबकि कुछ लोगों तक जरूरी पोषण अभी भी पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच रहा।
यह खबर NFHS-6 और सरकारी/प्रकाशित रिपोर्टों में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई है। किसी व्यक्ति का स्वस्थ वजन उसकी उम्र, लंबाई, लिंग, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य कारकों पर निर्भर करता है। वजन घटाने या बढ़ाने के लिए किसी भी कठोर डाइट या सप्लीमेंट का इस्तेमाल डॉक्टर या योग्य पोषण विशेषज्ञ की सलाह के बिना न करें।

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