मोदी-जिनपिंग-पुतिन की तस्वीर ने दुनिया को चौंकाया! हाथों में हाथ, क्या बन रहा है नया ‘वर्ल्ड ऑर्डर’?
दुनिया इस समय कई बड़े युद्धों, तनाव और बदलते शक्ति समीकरणों के दौर से गुजर रही है। अलग-अलग क्षेत्रों में जारी संघर्षों का असर केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार, व्यापार और कूटनीति पर दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में जब भारत, रूस और चीन जैसे तीन बड़े देशों के शीर्ष नेता एक साथ नजर आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से पूरी दुनिया की नजर उस तस्वीर और उसके पीछे छिपे कूटनीतिक संदेश पर टिक जाती है।
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक साथ सामने आई तस्वीर इसी वजह से चर्चा में है। तस्वीर में तीनों नेता बेहद गर्मजोशी के साथ नजर आ रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी दोनों नेताओं का हाथ थामे दिखाई देते हैं। देखने में यह एक सामान्य मुलाकात का क्षण लग सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों के लिए ऐसे दृश्य का अपना अलग महत्व होता है।
भारत, रूस और चीन तीनों ही ब्रिक्स के प्रमुख देशों में शामिल हैं और वैश्विक राजनीति में इनकी भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में तीनों नेताओं का एक साथ आना केवल फोटो का क्षण नहीं, बल्कि बदलती दुनिया में संवाद, सहयोग और बहुध्रुवीय व्यवस्था की संभावनाओं से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
तस्वीर में दिखी तीनों नेताओं की गर्मजोशी
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मोदी, जिनपिंग और पुतिन की मुलाकात ने खास तौर पर ध्यान खींचा। तस्वीर में तीनों नेताओं के बीच सहजता और गर्मजोशी दिखाई देती है। प्रधानमंत्री मोदी बीच में खड़े हैं और उनके दोनों ओर शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन नजर आते हैं।
मोदी का दोनों नेताओं के हाथ पकड़ना तस्वीर को और ज्यादा खास बना देता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं की बॉडी लैंग्वेज और मुलाकातों की तस्वीरें कई बार अपने आप में कूटनीतिक संदेश का माध्यम बन जाती हैं। हालांकि किसी तस्वीर के आधार पर देशों के बीच रिश्तों में बड़े बदलाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन ऐसी तस्वीरें संवाद और संपर्क के माहौल को जरूर दर्शाती हैं।
इस तस्वीर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर चर्चा शुरू हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस तस्वीर को अपने सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया, जिसके बाद इसकी राजनीतिक और कूटनीतिक व्याख्या होने लगी।
क्यों खास है मोदी-जिनपिंग-पुतिन का एक साथ आना?
तीनों देशों की अपनी अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं। भारत दुनिया की प्रमुख और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। रूस ऊर्जा संसाधनों और रक्षा क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए जाना जाता है, जबकि चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग, व्यापार और आर्थिक शक्ति का बड़ा केंद्र है।
तीनों देशों के बीच कई क्षेत्रों में सहयोग के अवसर हैं, लेकिन इसके साथ-साथ उनकी अपनी चुनौतियां और अलग-अलग रणनीतिक हित भी हैं। यही कारण है कि तीनों नेताओं की किसी भी महत्वपूर्ण मुलाकात को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में देखा जाता है।
ब्रिक्स का विस्तार और वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की बढ़ती भूमिका ने भी इस समूह को पहले के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि वैश्विक संस्थाओं में विकासशील और ग्लोबल साउथ के देशों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
ऐसे में मोदी, पुतिन और जिनपिंग की एक तस्वीर को कुछ लोग उभरती बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के प्रतीक के तौर पर भी देख रहे हैं।
2025 के SCO सम्मेलन की तस्वीर की आई याद
मोदी, जिनपिंग और पुतिन की इस मुलाकात को इससे पहले सामने आए ऐसे ही एक दृश्य से भी जोड़कर देखा जा रहा है। वर्ष 2025 में चीन के तियानजिन में आयोजित SCO सम्मेलन के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी की पुतिन और जिनपिंग के साथ तस्वीर चर्चा में रही थी।
उस समय भी तीनों नेताओं की मुलाकात और उनकी बॉडी लैंग्वेज को लेकर काफी चर्चा हुई थी। अब ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान एक बार फिर तीनों नेताओं की साथ वाली तस्वीर सामने आने से उन पुराने दृश्यों की याद ताजा हो गई।
हालांकि दोनों घटनाओं का अपना अलग कूटनीतिक संदर्भ है। इसलिए केवल तस्वीरों की समानता के आधार पर देशों के बीच संबंधों में किसी निश्चित बदलाव का दावा करना उचित नहीं होगा।
ब्रिक्स घोषणापत्र पर बनी सहमति
ब्रिक्स सम्मेलन का महत्व केवल नेताओं की मुलाकात और तस्वीरों तक सीमित नहीं रहा। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के बीच विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई और साझा घोषणापत्र को आम सहमति से स्वीकार किए जाने की बात सामने आई।
घोषणापत्र को लेकर बातचीत आखिरी समय तक जारी रहने की खबरें भी सामने आईं। कुछ मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच अलग-अलग रुख होने के कारण सहमति बनाने में कूटनीतिक बातचीत महत्वपूर्ण रही।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के पहले दिन की बैठक के बाद घोषणापत्र स्वीकार किए जाने की घोषणा की। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि ब्रिक्स में शामिल देशों की राजनीतिक परिस्थितियां और विदेश नीति के हित कई मामलों में अलग-अलग हैं।
इसके बावजूद किसी साझा दस्तावेज पर सहमति बनना समूह के भीतर संवाद और बहुपक्षीय सहयोग की प्रक्रिया को दर्शाता है।
पीएम मोदी ने वैश्विक संस्थाओं में सुधार की बात कही
सम्मेलन की समापन टिप्पणी में प्रधानमंत्री मोदी ने बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बदलती दुनिया को पुरानी पड़ चुकी संस्थाओं के जरिए नहीं चलाया जा सकता और प्रतिनिधित्व, जवाबदेही तथा नियम बनाने की प्रक्रिया में सुधार जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने ग्लोबल साउथ की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उनका जोर इस बात पर रहा कि भविष्य की प्रौद्योगिकियों के विकास और उन्हें संचालित करने वाले नियमों में ग्लोबल साउथ के देशों की समान भागीदारी होनी चाहिए।
यह मुद्दा भारत की व्यापक विदेश नीति के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी की वकालत करता रहा है।
क्या यह नए वर्ल्ड ऑर्डर का संकेत है?
मोदी, जिनपिंग और पुतिन की तस्वीर सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह बदलती वैश्विक व्यवस्था की तस्वीर है?
इस सवाल का सीधा जवाब देना फिलहाल जल्दबाजी होगा। किसी भी वैश्विक शक्ति समीकरण का आकलन केवल एक तस्वीर या एक मुलाकात से नहीं किया जा सकता। इसके लिए देशों के बीच होने वाले समझौतों, व्यापारिक संबंधों, रणनीतिक सहयोग और विदेश नीति के फैसलों को लंबे समय तक देखना पड़ता है।
फिर भी यह तस्वीर उस समय सामने आई है जब दुनिया में बहुध्रुवीय व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज है। अमेरिका और यूरोप के प्रभाव के साथ-साथ चीन, भारत, रूस और अन्य उभरती शक्तियां वैश्विक राजनीति में अपनी भूमिका को और मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।
ब्रिक्स भी इसी बदलती व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। समूह में अलग-अलग क्षेत्रों और राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देशों की मौजूदगी इसे एक व्यापक वैश्विक मंच बनाती है।
भारत के लिए क्या मायने रखती है यह तस्वीर?
भारत के लिए रूस और चीन दोनों ही महत्वपूर्ण देश हैं, लेकिन दोनों के साथ भारत के रिश्तों की प्रकृति अलग है। रूस के साथ भारत के पुराने रणनीतिक और रक्षा संबंध हैं, जबकि चीन भारत का बड़ा पड़ोसी और प्रमुख आर्थिक साझेदार होने के साथ-साथ कई मुद्दों पर रणनीतिक प्रतिस्पर्धी भी है।
ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का दोनों नेताओं के साथ एक ही मंच पर दिखाई देना भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के दृष्टिकोण को भी रेखांकित करता है। भारत अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
ब्रिक्स जैसे मंच भारत को एक ही समय में रूस और चीन जैसे देशों के साथ संवाद का अवसर देते हैं, जबकि ग्लोबल साउथ के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने के लिए भी एक व्यापक मंच उपलब्ध कराते हैं।
तस्वीर का संदेश क्या है?
मोदी, जिनपिंग और पुतिन की यह तस्वीर निश्चित रूप से एक ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया को युद्ध और तनाव के बजाय संवाद की जरूरत महसूस हो रही है। तीनों नेताओं का साथ खड़ा होना कम से कम इतना संदेश जरूर देता है कि अलग-अलग रणनीतिक हित रखने वाले बड़े देशों के बीच बातचीत के रास्ते खुले रह सकते हैं।
हालांकि तस्वीर को किसी नए गठबंधन या स्थायी राजनीतिक धुरी का प्रमाण मानना सही नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिश्ते कई स्तरों पर तय होते हैं और परिस्थितियों के साथ बदलते भी रहते हैं।
फिर भी ब्रिक्स सम्मेलन की यह तस्वीर वैश्विक राजनीति के बदलते दौर की एक दिलचस्प झलक जरूर पेश करती है। एक तरफ युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव हैं, तो दूसरी तरफ भारत, रूस और चीन जैसे बड़े देशों के नेता एक मंच पर संवाद करते दिखाई दे रहे हैं।
यही वजह है कि मोदी-जिनपिंग-पुतिन की यह तस्वीर सिर्फ एक फोटो नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति, बहुध्रुवीय दुनिया और कूटनीतिक संवाद की संभावनाओं पर नई बहस का आधार बन गई है।

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