खसरे ने मचाया ऐसा कहर कि अस्पताल पड़े कम! 999 मौतें, 1.66 लाख मामले… बच्चों पर मंडरा रहा सबसे बड़ा खतरा
Measles Outbreak: पड़ोसी देश बांग्लादेश इस समय खसरे के सबसे गंभीर प्रकोप से जूझ रहा है। कभी खसरा उन्मूलन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ चुके बांग्लादेश में अब हालात इतने चिंताजनक हो गए हैं कि अस्पताल मरीजों से भर गए हैं और बड़ी संख्या में बच्चे इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। मार्च 2026 से अब तक देश में संदिग्ध और पुष्ट खसरा मामलों से जुड़ी 999 मौतें दर्ज की गई हैं, जबकि संदिग्ध मामलों की संख्या 1.66 लाख से अधिक हो चुकी है। इनमें 19,835 मामले प्रयोगशाला जांच में पुष्ट बताए गए हैं।
सबसे चिंता की बात यह है कि इस संकट का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक टीकाकरण में आई कमी ने बड़ी संख्या में बच्चों को संक्रमण के प्रति असुरक्षित बना दिया है। पांच साल से कम उम्र के बच्चे शुरुआती दौर में सामने आए मामलों का बड़ा हिस्सा रहे हैं। वहीं नौ महीने से कम उम्र के शिशु विशेष रूप से जोखिम में हैं, क्योंकि इस उम्र के कई बच्चे नियमित टीकाकरण की निर्धारित खुराक के दायरे में अभी पूरी तरह नहीं आते।
999 मौतों ने बढ़ाई चिंता
बांग्लादेश के स्वास्थ्य अधिकारियों के आंकड़ों के मुताबिक, 8 सितंबर तक खसरे से जुड़े संदिग्ध और पुष्ट मामलों से मौतों की संयुक्त संख्या 999 पहुंच गई। इनमें 100 मौतें प्रयोगशाला जांच से पुष्ट खसरे से जुड़ी हैं, जबकि बाकी मौतें संदिग्ध मामलों से संबंधित बताई गई हैं। इसी अवधि में संदिग्ध खसरा मामलों की संख्या 1,66,461 तक पहुंच गई।
आंकड़े बताते हैं कि यह महज कुछ इलाकों तक सीमित संक्रमण नहीं है। बांग्लादेश में मार्च के मध्य से शुरू हुआ यह प्रकोप लगातार कई महीनों से बना हुआ है। स्वास्थ्य व्यवस्था पर इसका दबाव लगातार बढ़ रहा है और बड़ी संख्या में मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा है।
15 मार्च से अब तक 1.46 लाख से ज्यादा संदिग्ध खसरा मरीजों को अस्पताल में भर्ती किया जा चुका है। इनमें से बड़ी संख्या में मरीज इलाज के बाद ठीक होकर घर लौट चुके हैं, लेकिन लगातार नए मरीजों के सामने आने से अस्पतालों पर दबाव कम नहीं हो पा रहा है।
आखिर अचानक इतना क्यों फैला खसरा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस बीमारी को टीकाकरण के जरिए काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है, वह बांग्लादेश में इतनी तेजी से कैसे फैल गई?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे सबसे बड़ा कारण टीकाकरण में पैदा हुई कमी और इम्युनिटी गैप है। वर्ष 2024 और 2025 के दौरान राजनीतिक अस्थिरता के बीच नियमित टीकाकरण कार्यक्रम प्रभावित हुए। इसके अलावा वैक्सीन की उपलब्धता और खरीद व्यवस्था में बदलाव से भी सप्लाई पर असर पड़ा।
नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में बच्चे समय पर टीके की खुराक नहीं ले सके। जिन बच्चों का टीकाकरण छूट गया, वे खसरे के वायरस के संपर्क में आने पर आसानी से संक्रमित हो सकते थे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अप्रैल के आकलन में भी बांग्लादेश में टीकाकरण से जुड़ी कमियों और बड़ी संख्या में संवेदनशील बच्चों को प्रकोप का प्रमुख जोखिम बताया गया था। उस समय देश के 64 में से 58 जिलों में संक्रमण की रिपोर्ट सामने आ चुकी थी।
बच्चों के लिए क्यों ज्यादा खतरनाक है खसरा?
खसरा बेहद संक्रामक वायरल बीमारी है। यह संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने और सांस के जरिए निकलने वाली बूंदों से तेजी से फैल सकता है। अगर किसी समुदाय में पर्याप्त लोगों को टीका न लगा हो तो संक्रमण बहुत तेजी से फैलने की क्षमता रखता है।
छोटे बच्चों के लिए इसका खतरा अधिक हो सकता है। खसरे में तेज बुखार, शरीर पर लाल चकत्ते, खांसी, नाक बहना और आंखों में लालिमा जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ मामलों में बीमारी गंभीर रूप लेकर निमोनिया, मस्तिष्क से जुड़ी जटिलताओं और अन्य गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है।
बांग्लादेश में मौजूदा संकट के दौरान पांच साल से कम उम्र के बच्चे विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं। शुरुआती चरण में सामने आए मामलों में इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी तक बताई गई थी।
नौ महीने से कम उम्र के बच्चों पर भी नजर
मौजूदा प्रकोप में एक बड़ी चुनौती उन बच्चों को लेकर है जो अभी नियमित खसरा टीकाकरण की उम्र के शुरुआती चरण में हैं। नौ महीने से कम उम्र के बच्चों को संक्रमण से बचाना इसलिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि उनमें नियमित टीकाकरण की सुरक्षा अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती।
ऐसे बच्चों के आसपास रहने वाले लोगों का टीकाकरण और संक्रमण की स्थिति में समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि टीकाकरण से छूटे बच्चों की पहचान कर उन्हें वैक्सीन से जोड़ना इस प्रकोप को नियंत्रित करने की दिशा में अहम कदम है।
सरकार ने शुरू किया बड़ा वैक्सीनेशन अभियान
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बांग्लादेश में अप्रैल से आपातकालीन खसरा-रूबेला टीकाकरण अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान का लक्ष्य करीब 1.8 करोड़ बच्चों को कवर करना था।
स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अभियान के बाद 1.97 करोड़ से ज्यादा बच्चों को टीका लगाया जा चुका है। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आपातकालीन अभियान पर्याप्त नहीं होगा। नियमित टीकाकरण व्यवस्था को मजबूत करना और जिन बच्चों का टीकाकरण छूट गया है, उन्हें पकड़कर टीका देना भी जरूरी है।
यानी चुनौती सिर्फ वर्तमान संक्रमण को रोकने की नहीं है, बल्कि भविष्य में दोबारा ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था में स्थायी सुधार करने की भी है।
अस्पतालों में जगह की कमी
खसरे के बढ़ते मामलों ने बांग्लादेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव डाल दिया है। स्थिति इसलिए और मुश्किल हो गई है क्योंकि देश में इसी समय डेंगू के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
ढाका के कई अस्पतालों में मरीजों की संख्या क्षमता से ज्यादा पहुंच गई है। कुछ अस्पतालों में खसरा मरीजों के लिए निर्धारित बेड भर जाने के बाद अतिरिक्त मरीजों का इलाज फर्श पर करने तक की स्थिति सामने आई है। एक सरकारी अस्पताल के अधिकारी के अनुसार अस्पताल की निर्धारित क्षमता करीब 1,350 मरीजों की थी, लेकिन वहां 2,350 से ज्यादा मरीजों का इलाज चल रहा था।
ऐसे में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। बाल चिकित्सा से जुड़ी जरूरी सुविधाओं और कुछ मेडिकल सप्लाई की कमी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
खसरे के साथ डेंगू ने बढ़ाई मुश्किल
बांग्लादेश की समस्या केवल खसरे तक सीमित नहीं है। देश में डेंगू के मामले भी बढ़ रहे हैं। सितंबर की शुरुआत में डेंगू मरीजों की अस्पताल में भर्ती संख्या तेजी से बढ़ी और स्वास्थ्य व्यवस्था पर दोहरी मार पड़ी।
एक तरफ खसरे से संक्रमित बच्चों की संख्या बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ डेंगू के मरीज भी अस्पताल पहुंच रहे हैं। इससे बेड, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और अन्य चिकित्सा संसाधनों पर दबाव और ज्यादा बढ़ गया है।
खसरे से बचाव का सबसे बड़ा हथियार वैक्सीनेशन
खसरा अत्यधिक संक्रामक बीमारी जरूर है, लेकिन इसे रोकने के सबसे प्रभावी तरीकों में टीकाकरण शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि दो खुराक वाला टीकाकरण कार्यक्रम समुदाय में सुरक्षा मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मौजूदा संकट ने यह भी दिखाया है कि कुछ समय के लिए टीकाकरण कार्यक्रम में आई रुकावट का असर कई महीनों या वर्षों बाद बड़े प्रकोप के रूप में सामने आ सकता है।
बांग्लादेश में अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों का जोर उन बच्चों तक पहुंचने पर है जिनका टीकाकरण किसी वजह से छूट गया है। इसके साथ ही लोगों में जागरूकता बढ़ाना और नियमित टीकाकरण कार्यक्रम को लगातार मजबूत बनाए रखना जरूरी माना जा रहा है।
भारत के लिए भी क्या है सबक?
बांग्लादेश में सामने आया यह संकट दक्षिण एशिया के दूसरे देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। संक्रामक बीमारियां सीमाओं को नहीं मानतीं और किसी भी देश में टीकाकरण कवरेज कमजोर होने पर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
हालांकि बांग्लादेश में सामने आए आंकड़ों को भारत की स्थिति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन विशेषज्ञों के लिए यह जरूर एक उदाहरण है कि बच्चों के नियमित टीकाकरण में किसी भी तरह की बड़ी कमी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
फिलहाल बांग्लादेश में चुनौती बेहद बड़ी है। 999 मौतें और 1.66 लाख से ज्यादा संदिग्ध मामले यह बताने के लिए काफी हैं कि खसरे का यह प्रकोप सामान्य मौसमी बीमारी नहीं रह गया है। अस्पतालों पर बढ़ता दबाव और बच्चों में संक्रमण की बड़ी हिस्सेदारी ने सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आपातकालीन टीकाकरण अभियान के बाद संक्रमण की रफ्तार कितनी तेजी से कम होती है और क्या बांग्लादेश अपनी नियमित टीकाकरण व्यवस्था को इतना मजबूत कर पाता है कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो।

कोई टिप्पणी नहीं