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HbA1c 6.1% आते ही घबरा गए? डायबिटीज की दवा शुरू करने से पहले डॉक्टर की ये बात जरूर जान लें!



अगर हाल ही में आपकी HbA1c रिपोर्ट 6.1% आई है और रिपोर्ट देखते ही आपको चिंता होने लगी है कि कहीं डायबिटीज तो नहीं हो गई, तो सबसे पहले घबराने की जरूरत नहीं है। HbA1c का 6.1 प्रतिशत होना आम तौर पर प्रीडायबिटीज की श्रेणी में आता है, न कि डायबिटीज की। हालांकि, यह शरीर में बढ़ते ब्लड शुगर की तरफ एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर है, जिसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं माना जाता।

कई लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि HbA1c 6.1 आने पर तुरंत दवा शुरू करनी चाहिए या सिर्फ खान-पान और जीवनशैली में बदलाव से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। इसका जवाब हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। दवा की जरूरत उम्र, वजन, दूसरी बीमारियों, परिवार में डायबिटीज के इतिहास और ब्लड शुगर की स्थिति समेत कई बातों पर निर्भर करती है।

सबसे पहले समझिए HbA1c क्या बताता है

HbA1c को आम भाषा में लंबे समय की ब्लड शुगर जांच कहा जाता है। सामान्य ब्लड शुगर टेस्ट में उस समय शरीर में मौजूद ग्लूकोज का स्तर पता चलता है, जबकि HbA1c पिछले लगभग 2 से 3 महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर का अंदाजा देता है।

इसी वजह से डॉक्टर कई बार किसी व्यक्ति की शुगर की स्थिति समझने के लिए केवल एक दिन की फास्टिंग या खाने के बाद की शुगर पर निर्भर नहीं रहते। HbA1c उन्हें लंबे समय का पैटर्न समझने में मदद करता है।

आम तौर पर HbA1c 5.7 प्रतिशत से कम होने पर सामान्य श्रेणी मानी जाती है। 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच का स्तर प्रीडायबिटीज की श्रेणी में आता है, जबकि 6.5 प्रतिशत या उससे अधिक होने पर डायबिटीज की संभावना मानी जाती है। हालांकि, किसी व्यक्ति में डायबिटीज का निदान डॉक्टर आमतौर पर जांच और क्लिनिकल स्थिति को देखकर करते हैं और जरूरत पड़ने पर टेस्ट दोबारा कराया जा सकता है।

इस लिहाज से 6.1% HbA1c डायबिटीज की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह जरूर बताता है कि ब्लड शुगर सामान्य से ऊपर जा रही है।

तो क्या 6.1% पर डायबिटीज की दवा लेनी होगी?

यहीं सबसे ज्यादा भ्रम होता है। HbA1c 6.1% आने का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को तुरंत डायबिटीज की दवा शुरू करनी पड़ेगी।

प्रीडायबिटीज के शुरुआती चरण में कई लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम होता है—खाने की आदतों में सुधार, नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन को नियंत्रित रखना, पर्याप्त नींद और डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय-समय पर शुगर की जांच।

अगर किसी व्यक्ति का वजन अधिक है, शारीरिक गतिविधि बहुत कम है या खान-पान में लगातार ज्यादा मीठा और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट शामिल है, तो जीवनशैली में बदलाव से ब्लड शुगर को बेहतर स्तर पर लाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि दवा की जरूरत कभी नहीं पड़ती। कुछ लोगों में डॉक्टर प्रीडायबिटीज की स्थिति में भी दवा पर विचार कर सकते हैं, खासकर तब जब डायबिटीज का जोखिम काफी ज्यादा हो। इसलिए केवल HbA1c की एक रिपोर्ट देखकर खुद से दवा शुरू या बंद करना सही तरीका नहीं है।

HbA1c 6.1 होने पर खान-पान में क्या बदलें?

अगर रिपोर्ट 6.1% आई है तो सबसे पहले अपनी रोजमर्रा की डाइट पर ध्यान देना जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि आपको खाना छोड़ देना है या पूरी तरह कार्बोहाइड्रेट बंद कर देना है।

प्लेट में सब्जियों, सलाद और प्रोटीन स्रोतों की मात्रा बढ़ाना उपयोगी हो सकता है। दाल, चना, राजमा, पनीर, अंडे या अन्य उपयुक्त प्रोटीन स्रोत व्यक्ति की जरूरत के अनुसार डाइट का हिस्सा हो सकते हैं।

वहीं मीठे पेय, ज्यादा चीनी वाली चाय-कॉफी, मिठाइयां, पैकेज्ड जूस और बार-बार स्नैकिंग को कम करना समझदारी हो सकती है। सफेद ब्रेड, मैदा और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की जगह ज्यादा फाइबर वाले विकल्प लेना भी मददगार हो सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात है मात्रा पर नियंत्रण। सिर्फ यह सोचकर कि कोई चीज घर की बनी है, उसे जरूरत से ज्यादा खाना भी ब्लड शुगर बढ़ा सकता है।

रोज की वॉक भी बन सकती है बड़ा हथियार

प्रीडायबिटीज में शारीरिक गतिविधि की भूमिका काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। अगर कोई व्यक्ति पूरे दिन बैठा रहता है तो शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता प्रभावित हो सकती है।

डॉक्टर की अनुमति और व्यक्ति की शारीरिक क्षमता के अनुसार नियमित तेज चाल से चलना, साइकिल चलाना, तैराकी या अन्य व्यायाम को दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है। लंबे समय तक बैठे रहने के बजाय बीच-बीच में उठकर चलना भी फायदेमंद आदत हो सकती है।

अगर वजन अधिक है तो डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह से धीरे-धीरे वजन कम करने पर भी ध्यान दिया जा सकता है। कई लोगों में वजन और शारीरिक गतिविधि में सुधार से ब्लड शुगर नियंत्रण बेहतर हो सकता है।

सिर्फ मीठा खाने से ही नहीं बढ़ती शुगर

एक आम धारणा है कि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का कारण सिर्फ मिठाई और चीनी है। लेकिन मामला इतना सरल नहीं है।

चावल, ब्रेड, रोटी, आलू, मैदा और दूसरे कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ भी शरीर में ग्लूकोज के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, आनुवंशिक जोखिम, उम्र और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी डायबिटीज के खतरे को प्रभावित करती हैं।

इसलिए HbA1c 6.1 आने के बाद केवल चीनी बंद करने के बजाय पूरी जीवनशैली की समीक्षा करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

क्या HbA1c 6.1 को वापस सामान्य किया जा सकता है?

कई लोगों में प्रीडायबिटीज के स्तर पर जीवनशैली में बदलाव करके ब्लड शुगर को बेहतर किया जा सकता है और डायबिटीज की ओर बढ़ने का जोखिम कम किया जा सकता है। लेकिन यह गारंटी नहीं है कि हर व्यक्ति की HbA1c तुरंत सामान्य हो जाएगी।

कुछ लोगों में आनुवंशिक और अन्य जोखिम इतने अधिक हो सकते हैं कि जीवनशैली सुधार के बावजूद डॉक्टर को अतिरिक्त उपचार की जरूरत महसूस हो। इसलिए लक्ष्य सिर्फ एक रिपोर्ट को देखकर खुश या परेशान होना नहीं, बल्कि समय के साथ शुगर के ट्रेंड को समझना होना चाहिए।

अगर रिपोर्ट पहली बार 6.1% आई है तो डॉक्टर आपकी फास्टिंग ग्लूकोज, जरूरत पड़ने पर अन्य जांच, वजन, ब्लड प्रेशर और मेडिकल हिस्ट्री देखकर आगे की योजना बना सकते हैं।

किन लोगों को ज्यादा सावधान रहना चाहिए?

अगर परिवार में माता-पिता या भाई-बहन को टाइप-2 डायबिटीज रही है, वजन अधिक है, पेट के आसपास चर्बी ज्यादा है, शारीरिक गतिविधि कम है या पहले से ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या रही है, तो 6.1% HbA1c को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

इसी तरह जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज रही हो, उनमें भी भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर से नियमित फॉलोअप करना महत्वपूर्ण है।

सबसे जरूरी बात—रिपोर्ट देखकर खुद दवा न लें

HbA1c 6.1% देखकर किसी रिश्तेदार की दवा लेना, मेडिकल स्टोर से खुद दवा शुरू करना या डॉक्टर की पुरानी दवा दोबारा लेना सही नहीं है। डायबिटीज की दवा व्यक्ति की स्थिति के अनुसार तय की जाती है।

अगर HbA1c 6.1% आया है तो इसे एक चेतावनी संकेत की तरह समझें, बीमारी की अंतिम घोषणा की तरह नहीं। खान-पान, व्यायाम, वजन और नियमित जांच पर ध्यान देकर स्थिति को बिगड़ने से रोकने की कोशिश की जा सकती है।

ध्यान रखें: HbA1c की व्याख्या व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और दूसरी जांचों के साथ की जानी चाहिए। इसलिए दवा शुरू करने, बदलने या बंद करने का फैसला डॉक्टर की सलाह के बिना न करें।

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