सुबह उठते ही शरीर देता है ये 5 संकेत तो सावधान! चुपचाप लिवर में जमा हो रही हो सकती है चर्बी, ऐसे करें पहचान
आजकल बदलती जीवनशैली, खान-पान की खराब आदतों और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण फैटी लिवर की समस्या तेजी से चर्चा में है। सबसे चिंता की बात यह है कि इस समस्या के शुरुआती दौर में कई लोगों को किसी तरह का खास लक्षण महसूस नहीं होता। यही वजह है कि कई बार लोगों को फैटी लिवर का पता तब चलता है, जब वे किसी दूसरी स्वास्थ्य समस्या के लिए ब्लड टेस्ट या पेट की जांच करवाते हैं।
लिवर शरीर का बेहद महत्वपूर्ण अंग है। यह भोजन से मिलने वाले पोषक तत्वों को प्रोसेस करने, शरीर में कई जरूरी पदार्थों के मेटाबॉलिज्म और कई अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में भूमिका निभाता है। जब लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है।
हर व्यक्ति में फैटी लिवर के कारण और उसकी गंभीरता एक जैसी नहीं होती। कुछ लोगों में यह केवल लिवर में वसा जमा होने तक सीमित रह सकता है, जबकि कुछ मामलों में लिवर में सूजन और लंबे समय तक नुकसान के कारण फाइब्रोसिस जैसी समस्या विकसित हो सकती है। इसलिए शुरुआत में ही जोखिम को पहचानना और जरूरत पड़ने पर जांच कराना महत्वपूर्ण माना जाता है।
फैटी लिवर को 'साइलेंट' बीमारी क्यों कहा जाता है?
फैटी लिवर की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण बहुत हल्के हो सकते हैं या बिल्कुल दिखाई नहीं दे सकते। व्यक्ति सामान्य तरीके से अपना काम करता रहता है और उसे यह अंदाजा भी नहीं होता कि उसके लिवर में फैट जमा हो रहा है।
कुछ लोगों को लगातार थकान, कमजोरी या पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में हल्का दर्द या असहजता महसूस हो सकती है। लेकिन इन लक्षणों को केवल फैटी लिवर का संकेत मान लेना सही नहीं है, क्योंकि इनके पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।
यही कारण है कि केवल शरीर में महसूस होने वाले लक्षणों के आधार पर फैटी लिवर की पहचान करना मुश्किल हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति में इसके जोखिम बढ़ाने वाले कारक मौजूद हैं, तो डॉक्टर उसकी स्थिति के अनुसार जांच की सलाह दे सकते हैं।
किन लोगों में फैटी लिवर का खतरा ज्यादा हो सकता है?
फैटी लिवर का संबंध केवल शराब के सेवन से नहीं है। आजकल मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़े कई कारण भी लिवर में फैट जमा होने के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
शरीर का वजन बढ़ना या मोटापा
पेट के आसपास अधिक चर्बी जमा होना
टाइप-2 डायबिटीज
इंसुलिन रेजिस्टेंस
हाई ट्राइग्लिसराइड्स
हाई कोलेस्ट्रॉल
मेटाबॉलिक सिंड्रोम
शारीरिक गतिविधि की कमी
अत्यधिक कैलोरी और असंतुलित खान-पान
अगर किसी व्यक्ति में इनमें से कई जोखिम कारक एक साथ मौजूद हैं, तो उसे अपने स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत हो सकती है।
खराब खान-पान कैसे बढ़ा सकता है समस्या?
आज की व्यस्त जीवनशैली में फास्ट फूड, अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थ, मीठे पेय, ज्यादा कैलोरी वाले भोजन और शारीरिक गतिविधि की कमी आम हो गई है। लंबे समय तक ऐसी जीवनशैली वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक समस्याओं का कारण बन सकती है।
जब शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का संतुलन बिगड़ता है और मेटाबॉलिक समस्याएं विकसित होती हैं, तो लिवर में भी फैट जमा होने का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को फैटी लिवर का अकेला कारण मानना सही नहीं है। पूरी डाइट, वजन, शारीरिक गतिविधि और व्यक्ति की अन्य स्वास्थ्य स्थितियां मिलकर जोखिम को प्रभावित करती हैं।
फैटी लिवर का पता कैसे लगाया जाता है?
फैटी लिवर की पहचान के लिए डॉक्टर व्यक्ति के लक्षण, मेडिकल हिस्ट्री, जोखिम कारकों और जांच रिपोर्ट को एक साथ देखते हैं। जरूरत के अनुसार अलग-अलग जांच कराई जा सकती हैं।
1. ब्लड टेस्ट से मिल सकता है लिवर की स्थिति का संकेत
फैटी लिवर की जांच में डॉक्टर ब्लड टेस्ट की मदद ले सकते हैं। इसमें लिवर से जुड़े एंजाइम जैसे ALT और AST देखे जा सकते हैं।
इन एंजाइम के स्तर में बदलाव लिवर में किसी तरह की समस्या का संकेत दे सकता है। हालांकि केवल ALT या AST बढ़ जाने से यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति को फैटी लिवर ही है। इनकी रिपोर्ट को अन्य जानकारी और जांच के साथ समझना जरूरी होता है।
इसी वजह से अगर ब्लड टेस्ट में कुछ असामान्य दिखाई देता है तो डॉक्टर आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं।
2. पेट का अल्ट्रासाउंड
फैटी लिवर का पता लगाने के लिए एब्डॉमिनल अल्ट्रासाउंड एक सामान्य जांच है। इसमें पेट के अंदर मौजूद अंगों की तस्वीर देखने में मदद मिलती है और लिवर में फैट जमा होने के संकेत दिखाई दे सकते हैं।
अगर किसी व्यक्ति के ब्लड टेस्ट में लिवर से जुड़ी असामान्यता सामने आती है या उसके जोखिम कारक अधिक हैं, तो डॉक्टर स्थिति के अनुसार अल्ट्रासाउंड की सलाह दे सकते हैं।
हालांकि अल्ट्रासाउंड भी हर स्थिति में बीमारी की पूरी गंभीरता नहीं बताता। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दूसरे टेस्ट करा सकते हैं।
3. फाइब्रोस्कैन से लिवर की कठोरता का पता
कुछ मामलों में डॉक्टर फाइब्रोस्कैन या अन्य लिवर इलास्टोग्राफी जांच की सलाह दे सकते हैं। यह लिवर की कठोरता का आकलन करने में मदद करती है और कुछ तकनीकों के जरिए लिवर में मौजूद फैट के बारे में भी जानकारी मिल सकती है।
खास तौर पर जब डॉक्टर को लिवर में फाइब्रोसिस यानी दाग या कठोरता बढ़ने की आशंका होती है, तब ऐसी जांच उपयोगी हो सकती है।
यह जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति को फाइब्रोस्कैन की जरूरत पड़े। इसका फैसला डॉक्टर व्यक्ति की रिपोर्ट और जोखिम के आधार पर करते हैं।
4. FIB-4 से फाइब्रोसिस के जोखिम का अनुमान
लिवर की जांच में FIB-4 नामक स्कोर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कोई अलग महंगी मशीन वाली जांच नहीं है। इसमें व्यक्ति की उम्र और कुछ ब्लड टेस्ट के परिणामों का इस्तेमाल करके लिवर में महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस के जोखिम का अनुमान लगाया जाता है।
FIB-4 का उद्देश्य यह समझने में मदद करना है कि व्यक्ति में लिवर फाइब्रोसिस का जोखिम कम है या आगे मूल्यांकन की जरूरत हो सकती है।
यह स्कोर अपने आप बीमारी की अंतिम पुष्टि नहीं करता। अगर इसका परिणाम चिंताजनक आता है तो डॉक्टर आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं।
क्या फैटी लिवर हमेशा गंभीर बीमारी बन जाता है?
ऐसा जरूरी नहीं है।
फैटी लिवर वाले हर व्यक्ति में गंभीर लिवर बीमारी विकसित नहीं होती। लेकिन कुछ लोगों में समय के साथ लिवर में सूजन और फाइब्रोसिस विकसित हो सकता है। अगर लिवर को लंबे समय तक नुकसान पहुंचता रहे तो स्थिति गंभीर भी हो सकती है।
यही कारण है कि फैटी लिवर की जानकारी सामने आने पर घबराने की बजाय उसके कारणों और जोखिम को समझना जरूरी है।
अगर वजन अधिक है, डायबिटीज नियंत्रित नहीं है, ट्राइग्लिसराइड्स या कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है या जीवनशैली बहुत कम सक्रिय है, तो इन चीजों पर काम करना लिवर के साथ-साथ पूरे स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
बचाव के लिए किन बातों का रखें ध्यान?
फैटी लिवर के जोखिम को कम करने के लिए जीवनशैली में सुधार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए संतुलित आहार लेना, जरूरत के अनुसार वजन कम करना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल तथा ट्राइग्लिसराइड्स को नियंत्रित रखना उपयोगी हो सकता है।
बहुत ज्यादा मीठे पेय, अत्यधिक कैलोरी वाले भोजन और लगातार बैठे रहने की आदत से बचना भी फायदेमंद हो सकता है।
लेकिन किसी भी व्यक्ति के लिए डाइट और एक्सरसाइज का तरीका उसकी उम्र, वजन और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए अगर पहले से कोई बीमारी है तो बड़े बदलाव डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह से करना बेहतर है।
कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर लगातार थकान, पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द या असहजता जैसी समस्या बनी रहती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर अगर साथ में मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ट्राइग्लिसराइड्स या मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसे जोखिम कारक मौजूद हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर आवश्यक जांच कराई जा सकती है।
अगर पहले से फैटी लिवर की जानकारी मिल चुकी है, तो डॉक्टर द्वारा बताई गई फॉलो-अप जांच और जीवनशैली संबंधी सलाह का पालन करना भी जरूरी है।
ध्यान रखें, केवल लक्षण देखकर फैसला न करें
फैटी लिवर की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआत में यह बिना स्पष्ट लक्षणों के मौजूद रह सकता है। इसलिए सिर्फ यह देखकर कि आपको कोई दर्द या परेशानी नहीं है, यह मान लेना सही नहीं है कि लिवर पूरी तरह स्वस्थ है।
वहीं दूसरी तरफ केवल थकान या पेट दर्द को फैटी लिवर मान लेना भी गलत हो सकता है। सही जानकारी के लिए डॉक्टर लक्षणों के साथ ब्लड टेस्ट, इमेजिंग और जरूरत पड़ने पर अन्य जांचों को देखते हैं।
निष्कर्ष यही है कि फैटी लिवर को लेकर डरने की जरूरत नहीं, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए। अगर जोखिम कारक मौजूद हैं या जांच में लिवर से जुड़ी असामान्यता सामने आती है, तो समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है। शुरुआती स्तर पर समस्या की पहचान होने से जीवनशैली और उपचार से जुड़े सही कदम उठाने का मौका मिलता है।

कोई टिप्पणी नहीं