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सहारनपुर मस्जिद पर चला बुलडोजर, अब अपनों ने ही घेरा अखिलेश को! ‘37 सांसद-100 विधायक कहां हैं?’ से गरमाई यूपी की सियासत



लखनऊ/सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण का मामला अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई या सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। शनिवार को हुई कार्रवाई के बाद इस मुद्दे पर विपक्षी दलों के बीच भी बयानबाजी तेज हो गई है। खास तौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) और असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) आमने-सामने दिखाई दे रही हैं।

AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता शादाब चौहान ने सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण को लेकर समाजवादी पार्टी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सहारनपुर में मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई हुई और सपा की कैराना सांसद इकरा हसन को सहारनपुर जाने से रोके जाने की बात सामने आई, तब समाजवादी पार्टी के बाकी सांसद और विधायक कहां थे।

शादाब चौहान ने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए पूछा कि सपा के पास बड़ी संख्या में सांसद और विधायक हैं, ऐसे में पार्टी इस मामले में कितनी मजबूती से मैदान में उतर रही है। उन्होंने सपा की राजनीति और मुस्लिम समुदाय के मुद्दों पर उसकी सक्रियता को लेकर भी सवाल खड़े किए। उनके बयान के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है।

कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद पर चला बुलडोजर

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को शनिवार सुबह प्रशासन ने भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच ध्वस्त किया। प्रशासन के मुताबिक, सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने इस ढांचे को सरकारी जमीन पर बना अवैध निर्माण माना था। मस्जिद प्रबंधन समिति की ओर से इस फैसले के खिलाफ अपील की गई, लेकिन जिला अदालत ने अपील खारिज कर दी। इसके बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।

कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर और उसके आसपास बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। कई रिपोर्टों के मुताबिक, सुरक्षा कारणों से इलाके में बैरिकेडिंग की गई और प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाए गए। प्रशासन की ओर से किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए थे।

यह मामला लंबे समय से विवाद में था। अदालतों में मुख्य सवाल मस्जिद की जमीन और निर्माण की वैधता को लेकर था। जिला अदालत के फैसले के बाद प्रशासन की कार्रवाई का रास्ता साफ हुआ।

इकरा हसन को हाउस अरेस्ट किए जाने का दावा

मामले ने उस समय और राजनीतिक रंग ले लिया जब कैराना से सपा सांसद इकरा हसन ने दावा किया कि उन्हें सहारनपुर जाने से पहले उनके आवास पर हाउस अरेस्ट कर दिया गया।

इकरा हसन का कहना है कि वह सहारनपुर जाकर अधिकारियों से मिलना और मस्जिद मामले को लेकर स्थिति का जायजा लेना चाहती थीं, लेकिन उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई। कई मीडिया रिपोर्टों में भी उनके आवास के बाहर पुलिस बल तैनात होने और उन्हें सहारनपुर जाने से रोके जाने की जानकारी सामने आई है।

सपा सांसद ने इस कार्रवाई को लेकर सरकार पर सवाल उठाए और इसे जनप्रतिनिधि की आवाज को रोकने की कोशिश बताया। वहीं प्रशासन की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए प्रतिबंधात्मक कार्रवाई किए जाने की बात सामने आई है।

यानी एक तरफ प्रशासन इसे कानून और अदालत के आदेश के अनुपालन के रूप में देख रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के संदर्भ में उठा रहा है।

AIMIM ने सपा पर साधा सीधा निशाना

इसी घटनाक्रम के बीच AIMIM प्रवक्ता शादाब चौहान का बयान सामने आया। उन्होंने समाजवादी पार्टी से पूछा कि अगर पार्टी के पास बड़ी संख्या में सांसद और विधायक हैं तो फिर सहारनपुर के मुद्दे पर उनकी सक्रियता कहां दिखाई दे रही है।

शादाब चौहान ने आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय लंबे समय से समाजवादी पार्टी को राजनीतिक समर्थन देता रहा है, लेकिन जब मस्जिद, मदरसा, बुलडोजर कार्रवाई या मुस्लिम समुदाय से जुड़े संवेदनशील मुद्दे सामने आते हैं तो सपा की प्रतिक्रिया उतनी आक्रामक नहीं होती, जितनी होनी चाहिए।

हालांकि, ये AIMIM की राजनीतिक आलोचनाएं और आरोप हैं, जिन्हें समाजवादी पार्टी का आधिकारिक पक्ष मानना सही नहीं होगा।

AIMIM नेता ने इसी बहाने अखिलेश यादव की राजनीति पर भी सवाल उठाया और पूछा कि पार्टी अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को लेकर सहारनपुर क्यों नहीं पहुंची।

इकरा हसन पर भी तीखा हमला

शादाब चौहान ने इकरा हसन को भी अपने निशाने पर लिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर सक्रिय राजनीति को लेकर तंज कसते हुए कहा कि केवल सोशल मीडिया पोस्ट या वीडियो के जरिए बयान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर जनता के बीच पहुंचकर संघर्ष करना चाहिए।

AIMIM नेता ने इकरा हसन को लेकर ‘रील’ और ‘रियल’ राजनीति के बीच अंतर बताते हुए कहा कि मुश्किल समय में नेता की पहचान उसके जमीन पर उतरने से होती है।

हालांकि, इकरा हसन की ओर से इस घटनाक्रम पर पहले ही प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। उन्होंने खुद के हाउस अरेस्ट किए जाने पर सवाल उठाए हैं और सरकार पर जनप्रतिनिधि को सहारनपुर जाने से रोकने का आरोप लगाया है।

अखिलेश यादव ने भी सरकार पर साधा निशाना

दूसरी तरफ सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सहारनपुर की घटना पर सरकार की कार्रवाई की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि सच्चा सनातन धर्म सौहार्द और दूसरे धर्मों के सम्मान की बात करता है और जो लोग दूसरे धर्मों का सम्मान नहीं करते, उन्हें सच्चा सनातनी नहीं कहा जा सकता।

अखिलेश के इस बयान से साफ है कि सपा इस मुद्दे को केवल स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में नहीं देख रही, बल्कि इसे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठा रही है।

इसी बीच AIMIM का सपा पर हमला यह संकेत दे रहा है कि विपक्ष के भीतर भी मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर प्रतिस्पर्धा मौजूद है।

2027 से पहले पश्चिमी यूपी में क्यों अहम है यह विवाद?

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं। ऐसे में सहारनपुर की घटना को पश्चिमी यूपी की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सहारनपुर, कैराना, शामली, मुजफ्फरनगर और मेरठ जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में मुस्लिम मतदाता चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सपा लंबे समय से इस क्षेत्र में मुस्लिम-यादव सामाजिक समीकरण और व्यापक पीडीए राजनीति के जरिए अपना आधार मजबूत करने की कोशिश करती रही है।

वहीं AIMIM लगातार यह संदेश देने की कोशिश करती रही है कि मुस्लिम समुदाय को अपनी राजनीतिक आवाज और स्वतंत्र नेतृत्व को लेकर अधिक मुखर होना चाहिए।

यही वजह है कि सहारनपुर मस्जिद का विवाद केवल एक स्थानीय घटना नहीं रह गया है। इसके बहाने AIMIM ने सपा के राजनीतिक प्रदर्शन और मुस्लिम मुद्दों पर उसकी भूमिका को चुनौती देने की कोशिश की है।

क्या विपक्षी एकता पर पड़ेगा असर?

सहारनपुर का विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के खिलाफ साझा राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की है।

लेकिन अगर विपक्षी दल एक-दूसरे पर ही मुस्लिम मतदाताओं के बीच नेतृत्व को लेकर सवाल उठाने लगते हैं, तो इसका असर उनकी चुनावी रणनीति पर भी पड़ सकता है।

AIMIM का आरोप है कि सपा मुस्लिम समुदाय से वोट तो लेती है, लेकिन संकट के समय उतनी मजबूती से खड़ी नहीं होती। दूसरी तरफ सपा खुद को व्यापक सामाजिक गठबंधन की राजनीति करने वाली पार्टी के तौर पर पेश करती है और भाजपा सरकार की कार्रवाई को लेकर लगातार सवाल उठा रही है।

ऐसे में सहारनपुर का मुद्दा आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरी को और बढ़ा सकता है।

कानूनी कार्रवाई बनाम राजनीतिक विवाद

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रशासन के मुताबिक ध्वस्तीकरण की कार्रवाई अदालत में मस्जिद की जमीन और निर्माण की वैधता से जुड़े फैसलों के बाद हुई है। जिला अदालत ने मस्जिद प्रबंधन की अपील खारिज कर दी थी और इससे पहले सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने निर्माण को सरकारी जमीन पर अवैध माना था।

यानी सरकार और प्रशासन की ओर से इसे कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई कार्रवाई बताया जा रहा है, जबकि विपक्षी दल इसके समय, तरीके और राजनीतिक प्रभाव पर सवाल उठा रहे हैं।

यही अंतर इस पूरे विवाद को और ज्यादा संवेदनशील बना रहा है।

अब आगे क्या?

फिलहाल सहारनपुर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है और प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है। मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया के बाद AIMIM का हमला और इकरा हसन के हाउस अरेस्ट का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस को और गर्म कर सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह विवाद केवल सहारनपुर तक सीमित रहेगा या फिर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का नया मुद्दा बन जाएगा।

एक तरफ समाजवादी पार्टी सरकार की कार्रवाई को लेकर सवाल उठा रही है, तो दूसरी तरफ AIMIM सपा के ही मुस्लिम जनाधार और नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रही है।

यानी सहारनपुर में मस्जिद पर चला बुलडोजर अब सिर्फ एक ढांचे के ध्वस्तीकरण की कहानी नहीं रह गया है। इसके बाद उठे राजनीतिक सवालों ने यूपी की विपक्षी राजनीति में एक नई जंग जरूर छेड़ दी है—और इसका असली असर 2027 के चुनावी मैदान में कितना दिखाई देगा, यह आने वाला समय बताएगा।

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