अमेरिका से क्यों खिसक रहा यूरोप का सोना? सैकड़ों टन गोल्ड शिफ्ट, कहीं किसी बड़े संकट की आहट तो नहीं!
नई दिल्ली। दुनिया में सोना सिर्फ आभूषण बनाने की धातु नहीं है। केंद्रीय बैंकों के लिए यह संकट के समय भरोसेमंद रिजर्व, आर्थिक सुरक्षा और विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता का एक अहम साधन माना जाता है। यही वजह है कि जब कोई देश अपने सैकड़ों टन सोने की भंडारण जगह बदलता है, तो यह महज लॉजिस्टिक्स का मामला नहीं रहता, बल्कि उसके पीछे की रणनीति पर भी नजर जाती है।
इन दिनों यूरोप में ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है। नीदरलैंड ने 2026 में करीब 86 टन सोना न्यूयॉर्क और ओटावा से लंदन शिफ्ट किया है, जबकि फ्रांस ने 2025-26 में न्यूयॉर्क में रखे करीब 129 टन सोने को यूरोप में नए मानक वाले सोने से बदल दिया। दोनों घटनाओं को जोड़ें तो 200 टन से ज्यादा सोने के रिजर्व की लोकेशन बदली है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है—इसका मतलब यह नहीं कि सैकड़ों टन सोने की ईंटों को ट्रकों या विमानों से एक देश से दूसरे देश पहुंचाया गया। बड़ी मात्रा में लेनदेन बेचने और नई जगह पर खरीदने के जरिए हुआ है।
तो आखिर यूरोप के केंद्रीय बैंक ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या उन्हें अमेरिका की सुरक्षा पर भरोसा कम हो रहा है? क्या रूस के विदेशी रिजर्व फ्रीज किए जाने के बाद दुनिया के केंद्रीय बैंकों को अपने विदेशी भंडार को लेकर नई चिंता सताने लगी है? या फिर मामला केवल सोने को ऐसी जगह रखने का है जहां जरूरत पड़ने पर उसे तेजी से इस्तेमाल किया जा सके?
नीदरलैंड ने क्यों बदली सोने की लोकेशन?
इस पूरी कहानी का सबसे ताजा उदाहरण नीदरलैंड का केंद्रीय बैंक De Nederlandsche Bank यानी DNB है। बैंक ने सितंबर 2026 में बताया कि मार्च से अगस्त के बीच उसने अमेरिका और कनाडा में रखे अपने सोने में से करीब 86 टन को लंदन स्थानांतरित किया।
DNB के कुल सोने का भंडार करीब 612.4 टन है, जिसकी 2025 के अंत में कीमत लगभग 72.2 अरब यूरो बताई गई थी। इस बदलाव के बाद नीदरलैंड के कुल सोने में लंदन की हिस्सेदारी 18.1 प्रतिशत से बढ़कर 32.1 प्रतिशत हो गई, जबकि न्यूयॉर्क और ओटावा की हिस्सेदारी घटकर दोनों जगह 18.5-18.5 प्रतिशत रह गई। नीदरलैंड में ही करीब 30.8 प्रतिशत सोना रखा हुआ है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि DNB ने इस कदम के पीछे सीधे तौर पर ‘बढ़ती भू-राजनीतिक अशांति’ और संकट की स्थिति के लिए बेहतर तैयारी को कारण बताया है।
बैंक के मुताबिक लंदन में रखा सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा आसानी से कारोबार योग्य है। यानी अगर किसी गंभीर आर्थिक या वित्तीय संकट के दौरान केंद्रीय बैंक को अपने सोने का इस्तेमाल करना पड़े तो लंदन से उसे अपेक्षाकृत तेजी से बाजार में लगाया जा सकता है।
DNB ने साफ कहा है कि उसे उम्मीद है कि उसे कभी अपने सोने को संकट में इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन फिर भी संकट से निपटने की तैयारी मजबूत रखना जरूरी है।
क्या पूरा 86 टन सोना अमेरिका से बाहर निकाला गया?
यहां इस खबर का सबसे बड़ा ट्विस्ट है।
कागज पर लगभग 86 टन सोने की लोकेशन बदली है, लेकिन पूरा 86 टन भौतिक रूप से अमेरिका से लंदन नहीं पहुंचाया गया।
DNB के अनुसार करीब 59 टन सोना न्यूयॉर्क में बेचकर लंदन में उसके बराबर नया सोना खरीदा गया। इसके अलावा 27 टन से ज्यादा सोना अमेरिका और कनाडा से नीदरलैंड के Zeist स्थित सुरक्षित केंद्र तक भौतिक रूप से लाया गया और फिर वहां से लगभग उतनी ही मात्रा में अंतरराष्ट्रीय मानकों वाला सोना लंदन भेजा गया। इस व्यवस्था का मकसद बड़े पैमाने पर सोने की भौतिक ढुलाई से जुड़े जोखिम को कम करना था।
यानी मामला केवल ‘अमेरिका से सोना वापस लाने’ का नहीं है। असली कहानी है—रिजर्व को अलग-अलग जगहों पर इस तरह रखना कि संकट में उसका इस्तेमाल तेजी से किया जा सके और किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।
फ्रांस ने भी बदली थी रणनीति
नीदरलैंड से पहले फ्रांस ने भी न्यूयॉर्क में रखे सोने के एक हिस्से को यूरोप में शिफ्ट किया था।
बैंक ऑफ फ्रांस के मुताबिक 2025 में उसके कुल करीब 2,437 टन सोने में से 129 टन, यानी लगभग 5 प्रतिशत, न्यूयॉर्क में रखा हुआ था। यह सोना पुराने मानकों वाला था। बैंक ने जुलाई 2025 से जनवरी 2026 के बीच इस सोने को बेचकर यूरोप में आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नया सोना खरीदा और उसे पेरिस में रखा।
इस प्रक्रिया से फ्रांस को करीब 12.8 अरब यूरो का असाधारण पूंजीगत लाभ भी हुआ। बैंक ऑफ फ्रांस ने स्पष्ट किया कि इस कदम का मकसद राजनीतिक नहीं था, बल्कि सोने को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप करना और यूरोपीय बाजार में उसकी ट्रेडेबिलिटी बढ़ाना था।
यानी फ्रांस का मामला नीदरलैंड से कुछ अलग है। यहां सीधे तौर पर अमेरिका पर अविश्वास जताने के बजाय गुणवत्ता, मानकीकरण और यूरोपीय बाजार में बेहतर कारोबार को वजह बताया गया।
फिर अमेरिका को लेकर आशंका की बात क्यों हो रही है?
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का भू-राजनीतिक पहलू सामने आता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस के विदेशी मुद्रा और दूसरे रिजर्व को फ्रीज कर दिया था। इस घटना ने दुनिया के केंद्रीय बैंकों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा किया—अगर किसी देश के विदेशी रिजर्व दूसरे देश या दूसरे अधिकार क्षेत्र में रखे हैं, तो गंभीर राजनीतिक टकराव की स्थिति में उन परिसंपत्तियों तक उसकी पहुंच कितनी सुरक्षित रहेगी?
यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय बैंकों ने सोने को लेकर अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना शुरू किया है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक 2026 के सर्वे में रिकॉर्ड 45 प्रतिशत केंद्रीय बैंक रिजर्व मैनेजरों ने कहा कि वे अगले 12 महीनों में अपने सोने के भंडार को बढ़ाने की योजना रखते हैं। सर्वे में 74 केंद्रीय बैंकों ने हिस्सा लिया था। साथ ही 10 प्रतिशत ने पिछले एक साल में अपने सोने के भंडारण स्थानों में विविधता बढ़ाई।
यानी यह केवल यूरोप की कहानी नहीं है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक सोने को लेकर ज्यादा सक्रिय हो रहे हैं।
सोना फिर क्यों बन रहा है ‘सेफ हेवन’?
सोने की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसी दूसरे देश की सरकार की देनदारी नहीं है। डॉलर या किसी सरकारी बॉन्ड के विपरीत सोना अपने आप में एक भौतिक संपत्ति है।
विश्व स्वर्ण परिषद के 2026 के आंकड़ों के अनुसार 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों की शुद्ध सोना खरीद 288.9 टन रही। पहली छमाही में कुल शुद्ध खरीद 345 टन रही। पोलैंड इस अवधि में सबसे बड़ा खरीदार रहा और जून 2026 के अंत तक उसके सोने का भंडार 632 टन तक पहुंच गया।
ECB की 2026 की रिपोर्ट भी बताती है कि भू-राजनीतिक जोखिम केंद्रीय बैंकों की सोना खरीदने की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। 2025 में आधिकारिक क्षेत्र की सोना खरीद करीब 850-863 टन रही, जो 2022 से पहले के ऐतिहासिक औसत से काफी ऊपर है।
क्या जर्मनी भी अमेरिका से सोना वापस ला रहा है?
इस सवाल का जवाब फिलहाल नहीं है।
जर्मनी के पास दुनिया के सबसे बड़े सरकारी सोना भंडारों में से एक है। Bundesbank के 2025 के आंकड़ों के अनुसार उसके पास कुल करीब 3,350 टन सोना था। इसमें 1,710 टन फ्रैंकफर्ट, 1,236 टन न्यूयॉर्क और 404 टन लंदन में रखा था।
यानी जर्मनी के सोने का लगभग एक-तिहाई अभी भी न्यूयॉर्क में है। लेकिन Bundesbank ने फिलहाल इसे वापस लाने का फैसला नहीं किया है। उसके अधिकारियों ने न्यूयॉर्क में रखे सोने की सुरक्षा और कानूनी स्थिति पर भरोसा जताया है।
इससे यह भी साफ होता है कि यूरोप एक साथ अमेरिका से सोना निकाल नहीं रहा है। अलग-अलग केंद्रीय बैंक अपनी जरूरत, जोखिम और रणनीति के अनुसार फैसला कर रहे हैं।
असली चिंता अमेरिका है या भू-राजनीतिक अनिश्चितता?
इस सवाल का जवाब शायद दोनों के बीच है।
नीदरलैंड ने अपने कदम को सीधे अमेरिका के खिलाफ कदम नहीं बताया है। उसने कहा है कि वह सोने की लोकेशन को ज्यादा संतुलित बनाकर संकट से निपटने की क्षमता बढ़ा रहा है। फ्रांस ने भी अपने कदम को राजनीतिक फैसला मानने से इनकार किया है।
लेकिन दूसरी तरफ यूरोप और अमेरिका के बीच पिछले कुछ समय में व्यापार, सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर तनाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में केंद्रीय बैंकों के लिए यह स्वाभाविक है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनका सबसे महत्वपूर्ण रिजर्व किसी एक देश या एक भौगोलिक क्षेत्र पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न हो।
इसी वजह से लंदन भी महत्वपूर्ण बन रहा है। बैंक ऑफ इंग्लैंड दुनिया के सबसे बड़े और पुराने गोल्ड वॉल्टिंग केंद्रों में से एक है और लंदन दुनिया का प्रमुख भौतिक सोना ट्रेडिंग हब है। DNB ने भी कहा है कि लंदन में रखा सोना संकट के समय ज्यादा आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।
तो क्या यूरोप को किसी बड़े संकट का डर है?
फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि यूरोपीय केंद्रीय बैंक किसी निश्चित युद्ध, आर्थिक संकट या अमेरिका से टकराव की भविष्यवाणी कर रहे हैं।
लेकिन उनके फैसले यह जरूर दिखाते हैं कि वे संभावित संकटों के लिए पहले से तैयारी करना चाहते हैं।
रूस के रिजर्व फ्रीज होने के बाद दुनिया ने देखा कि भू-राजनीतिक संघर्ष में वित्तीय परिसंपत्तियां भी रणनीतिक हथियार बन सकती हैं। दूसरी तरफ व्यापार युद्ध, प्रतिबंध, मुद्रा जोखिम और वैश्विक वित्तीय अस्थिरता ने केंद्रीय बैंकों को अपने रिजर्व की संरचना पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है।
इसलिए सोने को घर या किसी नजदीकी सुरक्षित केंद्र में रखना सिर्फ ‘अमेरिका पर भरोसा नहीं’ करने का संकेत नहीं है। यह रिस्क डाइवर्सिफिकेशन और संकट में तुरंत उपलब्धता की रणनीति भी है।
‘सैकड़ों टन सोना शिफ्ट’ होने की असली कहानी
नीदरलैंड के 86 टन और फ्रांस के 129 टन को जोड़ें तो 200 टन से ज्यादा सोने के रिजर्व की लोकेशन या संरचना बदली है। लेकिन इसे देखकर यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि यूरोप के देश सामूहिक रूप से अमेरिका से अपना पूरा सोना वापस ला रहे हैं।
असल तस्वीर ज्यादा दिलचस्प है।
कुछ देश सोना खरीद रहे हैं, कुछ उसे घरेलू वॉल्ट में बढ़ा रहे हैं, कुछ लंदन जैसे बड़े ट्रेडिंग सेंटर में रख रहे हैं और कुछ अभी भी न्यूयॉर्क को सुरक्षित और उपयोगी मान रहे हैं।
यानी सोने की यह आवाजाही किसी एक फैसले की कहानी नहीं, बल्कि बदलती दुनिया में केंद्रीय बैंकों की नई सोच का संकेत है।
और सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—युद्ध हो या वित्तीय संकट, केंद्रीय बैंक अब केवल यह नहीं देख रहे कि उनके पास कितना सोना है; वे यह भी देख रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर वह सोना कितनी जल्दी, कितनी सुरक्षित और किस अधिकार क्षेत्र में इस्तेमाल किया जा सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं