थार के नीचे छिपा ‘काला सोना’! रोज 80 हजार बैरल तेल निकालने की तैयारी, क्या भारत बनेगा अगला सऊदी?
नई दिल्ली/जयपुर: मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर संकट ने भारत समेत पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। सोमवार, 7 सितंबर 2026 को भी अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री क्षेत्र में हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई। ब्रेंट क्रूड करीब 97.48 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि WTI करीब 92.62 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
होर्मुज की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सामान्य परिस्थितियों में इस संकरे समुद्री रास्ते से दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब एक चौथाई हिस्सा गुजरता है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक 2025 में यहां से औसतन करीब 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते थे।
ऐसे माहौल में भारत के लिए सवाल सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों का नहीं है। असली सवाल है—अगर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई लंबे समय तक बाधित हुई तो भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को कैसे पूरा करेगा?
और इसी सवाल का एक जवाब राजस्थान के उस रेगिस्तान में छिपा है, जिसे कभी सिर्फ रेत और गर्मी के लिए जाना जाता था।
थार की रेत के नीचे छिपा है ‘काला सोना’
राजस्थान का पश्चिमी हिस्सा लंबे समय से भारत के घरेलू तेल उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। खासकर बाड़मेर बेसिन में मंगला, भाग्यम और ऐश्वर्या यानी MBA फील्ड्स ने देश के तेल नक्शे को बदल दिया।
मंगला फील्ड की खोज 2004 में हुई थी और 2009 में यहां से व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ। केयर्न के मुताबिक अक्टूबर 2022 तक अकेले मंगला फील्ड से 500 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन हो चुका था। कंपनी ने इसे भारत का सबसे बड़ा ऑनशोर ऑयल फील्ड बताया है।
यानी जिस जमीन को देखकर कभी यह लगता था कि यहां जीवन और खेती सबसे बड़ी चुनौती है, उसी जमीन के नीचे भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण संसाधन मौजूद है।
लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती।
असल चुनौती अब यह है कि पुराने होते तेल क्षेत्रों से ज्यादा से ज्यादा तेल कैसे निकाला जाए?
राजस्थान का तेल उत्पादन फिर बढ़ाने की तैयारी
राजस्थान फिलहाल करीब 51,000-52,000 बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है। राज्य सरकार अब इसे चरणबद्ध तरीके से 80,000 बैरल प्रतिदिन तक ले जाने की योजना पर काम कर रही है। इसके लिए पुराने और परिपक्व तेल क्षेत्रों में Enhanced Oil Recovery यानी EOR तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह लक्ष्य ऐसे समय में सामने आया है जब अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भू-राजनीतिक जोखिम तेजी से बढ़ रहे हैं।
मतलब साफ है—भारत सिर्फ विदेशों से आने वाले तेल पर निर्भर रहने के बजाय अपने पुराने तेल कुओं से भी ज्यादा उत्पादन निकालने की कोशिश कर रहा है।
जमीन के नीचे अब उतरेगी नई तकनीक
पुराने तेल क्षेत्रों में एक बड़ी समस्या यह होती है कि समय के साथ दबाव कम होने लगता है और भूमिगत चट्टानों में मौजूद तेल को बाहर निकालना मुश्किल होता जाता है।
राजस्थान में इसका मुकाबला करने के लिए अत्याधुनिक Enhanced Oil Recovery तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इनमें प्रमुख है Alkaline Surfactant Polymer यानी ASP flooding।
इस प्रक्रिया में विशेष रसायनों का मिश्रण तेल क्षेत्र में इंजेक्ट किया जाता है। इसका उद्देश्य चट्टानों में फंसे तेल की गतिशीलता बढ़ाना और उसे कुओं की तरफ प्रवाहित करना आसान बनाना होता है।
Cairn Oil & Gas ने जून 2024 में मंगला फील्ड में भारत की सबसे बड़ी commercial ASP injection परियोजना शुरू करने की घोषणा की थी। कंपनी के अनुसार यह तकनीक परिपक्व हो चुके मंगला फील्ड में तेल की recovery बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है।
कंपनी ने पहले ही राजस्थान ब्लॉक में polymer flooding और अन्य EOR तकनीकों के जरिए उत्पादन बनाए रखने की कोशिश की है।
बाड़मेर से आगे जैसलमेर और दूसरे बेसिन भी निशाने पर
राजस्थान सरकार की योजना सिर्फ बाड़मेर तक सीमित नहीं है।
राज्य में अलग-अलग बेसिन में अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल करने की तैयारी है। रिपोर्ट के मुताबिक Barmer-Sanchore और Jaisalmer basins में ASP technology, जबकि Bikaner-Nagaur basin में Cyclic Steam Stimulation यानी CSS के इस्तेमाल की योजना है।
CSS में भूमिगत क्षेत्र में भाप पहुंचाकर भारी और चिपचिपे तेल को गर्म किया जाता है। तापमान बढ़ने पर तेल की viscosity कम होती है और उसे कुएं के जरिए निकालना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
यानी राजस्थान के रेगिस्तान में अब सिर्फ कुएं खोदने की पारंपरिक तकनीक नहीं, बल्कि केमिकल और थर्मल EOR जैसी आधुनिक तकनीकें भी इस्तेमाल की जा रही हैं।
लेकिन तेल निकालना ही काफी नहीं
यहां कहानी का दूसरा बड़ा हिस्सा शुरू होता है—रिफाइनिंग।
कच्चा तेल जमीन से निकलने के बाद सीधे कार, ट्रक या विमान में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उसे पेट्रोल, डीजल, ATF और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने के लिए रिफाइनरी की जरूरत होती है।
और राजस्थान के लिए इसी मोर्चे पर 2026 में बड़ा बदलाव आया है।
पचपदरा में खड़ी हो गई विशाल रिफाइनरी
राजस्थान के बालोतरा जिले के पचपदरा में HPCL Rajasthan Refinery Limited यानी HRRL का विशाल रिफाइनरी-कम-पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स तैयार हो चुका है।
यह HPCL और राजस्थान सरकार का संयुक्त उपक्रम है, जिसमें HPCL की हिस्सेदारी 74 प्रतिशत और राजस्थान सरकार की 26 प्रतिशत है।
परियोजना की क्षमता 9 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष यानी 9 MMTPA है। इसके साथ 2.4 MMTPA की पेट्रोकेमिकल क्षमता भी है।
सबसे खास बात यह है कि यह रिफाइनरी राजस्थान के स्थानीय क्रूड को भी प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई है। HPCL के मुताबिक शुरुआती कॉन्फिगरेशन में करीब 1.5 MMTPA राजस्थान क्रूड और 7.5 MMTPA imported crude को प्रोसेस करने की योजना है।
यानी राजस्थान में निकला तेल अब उसी राज्य में बड़े पैमाने पर प्रोसेस करने की क्षमता के साथ जुड़ गया है।
79 हजार करोड़ से ज्यादा का प्रोजेक्ट
यह कोई छोटा औद्योगिक प्रोजेक्ट नहीं है।
केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में HRRL की संशोधित परियोजना लागत को बढ़ाकर 79,459 करोड़ रुपये करने को मंजूरी दी थी। परियोजना में 2.4 MMTPA पेट्रोकेमिकल क्षमता के साथ पेट्रोल, डीजल, पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलीथीन जैसे उत्पादों का उत्पादन भी प्रस्तावित है।
HPCL के अनुसार रिफाइनरी सेक्शन पूरा हो चुका है और 4 जुलाई 2026 को इस परिसर को राष्ट्र को समर्पित किया गया।
इसका मतलब यह है कि राजस्थान अब केवल तेल निकालने वाला राज्य नहीं रह गया है। वह तेल की प्रोसेसिंग और पेट्रोकेमिकल उत्पादन की दिशा में भी एक बड़ा केंद्र बन रहा है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है राजस्थान?
भारत की ऊर्जा चुनौती की सबसे बड़ी वजह उसकी बड़ी आयात निर्भरता है। PPAC के एक आधिकारिक प्रकाशन के अनुसार भारत की तेल खपत का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा आयात पर निर्भर रहा है।
यही वजह है कि दुनिया में कहीं भी बड़ा तेल संकट पैदा होता है तो उसका असर भारत तक पहुंचता है।
होर्मुज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
IEA के अनुसार यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल chokepoints में से एक है और इसके रास्ते होने वाली सप्लाई में गंभीर व्यवधान का वैश्विक तेल बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।
2026 के संघर्ष में इसकी अहमियत और स्पष्ट हो गई है। अमेरिकी EIA के मुताबिक 2026 की दूसरी तिमाही में होर्मुज से तेल और पेट्रोलियम तरल पदार्थों का प्रवाह औसतन सिर्फ 4.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा, जबकि 2025 की चौथी तिमाही में यह करीब 21.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन था।
ऐसी परिस्थितियों में घरेलू उत्पादन का हर अतिरिक्त बैरल भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।
क्या राजस्थान भारत को तेल के मामले में आत्मनिर्भर बना देगा?
यहां एक बात साफ समझना जरूरी है।
राजस्थान अकेले भारत को तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बना सकता।
भारत की कुल जरूरत इतनी बड़ी है कि घरेलू उत्पादन में राजस्थान की वृद्धि आयात को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती। लेकिन राजस्थान का बढ़ता उत्पादन आयात पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है और सबसे महत्वपूर्ण बात—यह भारत को सप्लाई के स्रोतों में विविधता देता है।
इसके साथ पचपदरा जैसी रिफाइनरी स्थानीय क्रूड को देश के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल सिस्टम से जोड़ने में मदद करती है।
यानी फायदा सिर्फ एक बैरल अतिरिक्त तेल का नहीं है। फायदा है—उत्पादन + रिफाइनिंग + पेट्रोकेमिकल + रोजगार + औद्योगिक विकास का पूरा इकोसिस्टम।
रेगिस्तान से निकल रही है ऊर्जा सुरक्षा की नई कहानी
कभी जिस थार को भारत के सबसे कठिन भौगोलिक इलाकों में गिना जाता था, वही इलाका अब देश की ऊर्जा रणनीति में तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है।
एक तरफ बाड़मेर और आसपास के क्षेत्रों में पुराने तेल क्षेत्रों से ज्यादा उत्पादन निकालने के लिए ASP, polymer flooding और steam-based EOR जैसी तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है। दूसरी तरफ पचपदरा में विशाल रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स राजस्थान को ऊर्जा और औद्योगिक नक्शे पर नई पहचान दे रहा है।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है।
क्या राजस्थान का उत्पादन 80,000 बैरल प्रतिदिन तक पहुंच पाएगा? क्या EOR तकनीक पुराने कुओं से उम्मीद से ज्यादा तेल निकाल पाएगी? और क्या पचपदरा की रिफाइनरी भारत की आयात निर्भरता को वास्तव में कम करने में बड़ी भूमिका निभाएगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में मिलेंगे।
फिलहाल इतना तय है कि दुनिया के समुद्री रास्तों और युद्ध के मोर्चों पर जब तेल की हर बूंद रणनीतिक ताकत बन रही है, तब राजस्थान के रेतीले धोरों के नीचे मौजूद काला सोना भारत के लिए पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

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