न डॉक्टर, न मशीन… कुत्ते की नाक बताएगी शरीर में छिपा कैंसर? भारत में शुरू हुआ बड़ा प्रयोग
बेंगलुरु: कैंसर की पहचान के लिए अब डॉक्टरों के साथ-साथ इंसान का सबसे वफादार साथी यानी कुत्ता भी अहम भूमिका निभा सकता है। भारत में एक ऐसा प्रयोग सामने आया है, जिसमें प्रशिक्षित कुत्तों की असाधारण सूंघने की क्षमता को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के साथ जोड़ा जा रहा है। इसका मकसद सांस के नमूने से कैंसर के संकेतों को पहचानना और बीमारी की शुरुआती जांच को आसान, सस्ता और गैर-आक्रामक बनाना है।
बेंगलुरु की डीप-टेक स्टार्टअप Dognosis इस तकनीक पर काम कर रही है। कंपनी प्रशिक्षित कुत्तों के जरिए इंसानी सांस में मौजूद ऐसे रासायनिक संकेतों को पहचानने की कोशिश कर रही है, जो कैंसर की मौजूदगी से जुड़े हो सकते हैं। इसके बाद कुत्ते की प्रतिक्रिया को सेंसर और AI की मदद से डेटा में बदला जाता है।
कुत्ता कैसे पहचानता है कैंसर?
सवाल यह है कि आखिर एक कुत्ता कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को सूंघकर कैसे पहचान सकता है?
वैज्ञानिकों के अनुसार, शरीर में बीमारी होने पर उसके मेटाबॉलिज्म और रासायनिक प्रक्रियाओं में बदलाव आ सकते हैं। इन बदलावों के कारण शरीर से निकलने वाले कुछ वाष्पशील रासायनिक यौगिकों यानी volatile organic compounds (VOCs) के पैटर्न में परिवर्तन हो सकता है।
इंसान की नाक इन बेहद सूक्ष्म गंध संकेतों को पहचानने में सीमित है, लेकिन कुत्तों की सूंघने की क्षमता बेहद विकसित होती है। रिपोर्टों के मुताबिक, कुत्तों में लगभग 30 करोड़ scent receptors हो सकते हैं, जबकि इंसानों में यह संख्या करीब 50 लाख बताई जाती है। इसी क्षमता का इस्तेमाल प्रशिक्षित कुत्तों को बीमारी से जुड़े गंध संकेत पहचानने के लिए सिखाने में किया जा रहा है।
मरीज को नहीं बैठना पड़ेगा कुत्ते के सामने
इस तकनीक की खास बात यह है कि मरीज और कुत्ते का सीधे आमना-सामना भी जरूरी नहीं है।
प्रयोग में व्यक्ति को एक कॉटन सर्जिकल मास्क में कुछ समय तक सांस छोड़नी होती है। इसके बाद उस मास्क को सुरक्षित तरीके से पैक करके लैब में भेजा जाता है। वहां प्रशिक्षित कुत्ते उस नमूने को सूंघते हैं और अपनी प्रतिक्रिया के जरिए संकेत देते हैं कि नमूने में कैंसर से जुड़े संभावित रासायनिक पैटर्न मौजूद हैं या नहीं।
यानी भविष्य में अगर यह तकनीक सफल साबित होती है तो मरीज के लिए यह प्रक्रिया काफी सरल हो सकती है—न खून निकालने की जरूरत, न महंगी मशीन के सामने लंबे समय तक बैठना।
AI यहां क्या कर रहा है?
कुत्ते की सूंघने की क्षमता अपने आप में नई बात नहीं है। दुनिया के कई हिस्सों में प्रशिक्षित कुत्तों को विभिन्न बीमारियों से जुड़े गंध संकेत पहचानने पर शोध किया गया है।
लेकिन समस्या यह है कि कुत्ता किसी नमूने को सूंघने के बाद जो प्रतिक्रिया देता है, उसे इंसान को समझना पड़ता है। यही वह जगह है जहां AI इस प्रयोग को अलग बनाता है।
Dognosis के सिस्टम में कुत्तों की प्रतिक्रिया से जुड़े कई संकेत रिकॉर्ड किए जाते हैं। इनमें उनकी brain activity, respiration और body language जैसे डेटा शामिल हैं। सेंसर इन संकेतों को रिकॉर्ड करते हैं और AI उनका विश्लेषण करने में मदद करता है।
इसका उद्देश्य केवल यह जानना नहीं है कि कुत्ते ने किसी नमूने पर प्रतिक्रिया दी या नहीं, बल्कि उसकी प्रतिक्रिया को एक व्यवस्थित डिजिटल डेटा में बदलना है, ताकि भविष्य में ज्यादा सटीक और दोहराए जा सकने वाले परीक्षण विकसित किए जा सकें।
1,500 से ज्यादा लोगों पर हुई स्टडी
इस प्रयोग को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब इसके पीछे प्रकाशित वैज्ञानिक शोध भी मौजूद है।
2026 में Journal of Clinical Oncology में प्रकाशित एक Phase II अध्ययन में भारत के कर्नाटक के छह अस्पतालों से कुल 3,275 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। इनमें से 1,773 लोगों के डेटा का इस्तेमाल प्रशिक्षण के लिए और 1,502 प्रतिभागियों के डेटा का परीक्षण के लिए किया गया। परीक्षण समूह में सात प्रमुख कैंसर समूहों से जुड़े 283 उपचार-पूर्व, बायोप्सी से पुष्ट कैंसर मामले और 1,219 नियंत्रण प्रतिभागी शामिल थे।
अध्ययन में प्रशिक्षित कुत्तों द्वारा सांस के नमूनों की पहचान को Bayesian fusion मॉडल के साथ जोड़ा गया।
नतीजे काफी दिलचस्प रहे। शोध में सिस्टम ने करीब 90.8% sensitivity और 91.3% specificity दर्ज की। शुरुआती चरण यानी Stage I और II के कैंसर के लिए sensitivity लगभग 90.6% रही।
हालांकि इन आंकड़ों को समझते समय यह याद रखना जरूरी है कि यह अभी कैंसर का अंतिम निदान करने वाली मशीन नहीं है। शोधकर्ताओं ने खुद इसे आगे वास्तविक screening populations में prospective evaluation के योग्य बताया है।
क्या इसका मतलब अब अस्पतालों में कुत्ते कैंसर की जांच करेंगे?
नहीं। फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
यह तकनीक अभी experimental और screening-stage में है। इसका उद्देश्य संभावित जोखिम वाले लोगों की पहचान में मदद करना हो सकता है, न कि डॉक्टर द्वारा किए जाने वाले अंतिम कैंसर diagnosis को बदलना।
अगर किसी व्यक्ति के सांस के नमूने में कैंसर का संकेत मिलता है तो उसके बाद डॉक्टरों को दूसरे स्थापित परीक्षणों के जरिए इसकी पुष्टि करनी होगी। उदाहरण के लिए imaging, endoscopy, biopsy या अन्य आवश्यक जांच बीमारी और शरीर के हिस्से के अनुसार की जा सकती हैं।
इसलिए इसे फिलहाल एक संभावित शुरुआती screening tool के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रयोग?
भारत में कैंसर एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। बीमारी का इलाज शुरुआती चरण में शुरू होने पर परिणाम बेहतर हो सकते हैं, लेकिन कई मरीजों में कैंसर की पहचान तब होती है जब बीमारी आगे बढ़ चुकी होती है।
ऐसे में कोई ऐसा screening method जो अपेक्षाकृत सरल, गैर-आक्रामक और कम लागत वाला हो, बड़ी आबादी तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है।
Dognosis का लक्ष्य भी इसी दिशा में आगे बढ़ना है। कंपनी BreathEasy नाम की अपनी तकनीक को विकसित कर रही है और 2027 में भारत में इसके संभावित commercial launch की योजना बताई गई है, हालांकि यह चल रहे clinical studies और आवश्यक regulatory approvals पर निर्भर करेगा।
लैब में काम कर रहे हैं 15 प्रशिक्षित कुत्ते
इस अनोखे प्रयोग में अलग-अलग नस्लों के प्रशिक्षित कुत्तों को शामिल किया गया है। इनमें बीगल, लैब्राडोर और डच शेफर्ड जैसी नस्लें शामिल हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, बेंगलुरु के बाहर स्थित सुविधा में करीब 15 कुत्तों को इस काम के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।
रेस्क्यू डॉग Chloe भी इस प्रयोग का हिस्सा है। उसे सेंसर से लैस एक विशेष 3D-प्रिंटेड हेलमेट और हार्नेस पहनाया जाता है, जिससे उसकी प्रतिक्रिया से जुड़े डेटा को रिकॉर्ड किया जा सके।
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इस तकनीक की शुरुआती सफलता उत्साह बढ़ाने वाली जरूर है, लेकिन इसे आम लोगों तक पहुंचाने से पहले कई सवालों के जवाब जरूरी हैं।
सबसे बड़ा सवाल है—क्या अलग-अलग अस्पतालों, शहरों और अलग-अलग आबादी में यह तकनीक समान रूप से सटीक परिणाम देगी?
इसके अलावा कुत्तों को प्रशिक्षित करने, उनकी क्षमता बनाए रखने, नमूनों को सुरक्षित तरीके से संभालने और बड़ी संख्या में लोगों की screening करने की व्यवस्था भी चुनौती होगी।
AI मॉडल को भी बड़े और विविध datasets की जरूरत होगी, ताकि वह केवल किसी खास लैब या खास परिस्थितियों में मिले संकेतों को पहचानने के बजाय वास्तविक दुनिया में भी विश्वसनीय परिणाम दे सके।
कैंसर की जांच का भविष्य बदल सकता है यह प्रयोग
कुत्तों की सूंघने की क्षमता और AI का यह मेल फिलहाल विज्ञान की एक दिलचस्प दिशा है। अगर आगे होने वाले बड़े और स्वतंत्र clinical studies में इसकी सटीकता और विश्वसनीयता साबित होती है, तो यह कैंसर की शुरुआती screening के क्षेत्र में एक नया विकल्प बन सकता है।
खासकर भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी तक कम लागत में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है, सांस के नमूने पर आधारित गैर-आक्रामक screening तकनीक काफी उपयोगी साबित हो सकती है।
लेकिन फिलहाल इसे कैंसर की पक्की जांच नहीं माना जा सकता। कुत्ता संकेत दे सकता है, AI उस संकेत को समझने में मदद कर सकता है, लेकिन अंतिम फैसला अभी भी मेडिकल जांच और डॉक्टरों के पास ही रहेगा।
यानी आने वाले समय में संभव है कि कैंसर की शुरुआती जांच की कहानी में डॉक्टर और मशीन के साथ एक ऐसा साथी भी शामिल हो, जिसकी सबसे बड़ी ताकत है—उसकी नाक।

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