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रक्षाबंधन के बाद लौटा था सपनों की दिल्ली, मां से आखिरी बातचीत के बाद अर्पित का कोई पता नहीं… मलबे में तलाश जारी



नई दिल्ली। दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को भरभराकर गिरी पीजी की पांच मंजिला इमारत ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी है। जिस इमारत में दूसरे राज्यों से आए छात्र अपने बेहतर भविष्य के सपने लेकर रह रहे थे, आज उसी जगह चारों तरफ मलबा, धूल और अपनों की तलाश में भटकते परिवार नजर आ रहे हैं। हादसे के बाद कई छात्रों का अब तक पता नहीं चल पाया है। अपने बच्चों की तलाश में उनके माता-पिता दिल्ली पहुंच रहे हैं और हर गुजरते पल के साथ उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है।

इन्हीं परिवारों में मध्य प्रदेश के देवास से दिल्ली पहुंची अर्पित की मां भी हैं। उनका रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार अपने बेटे का नाम पुकार रही हैं—‘अर्पित... अर्पित...’ लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं आ रहा।

अर्पित सत्य निकेतन के एक पीजी में रहता था और दिल्ली के एआरएसडी कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था। रविवार को जिस समय सत्य निकेतन की इमारत हादसे का शिकार हुई, उस समय अर्पित भी उसी इलाके में था। हादसे के बाद से उसका फोन बंद है और उसका कोई पता नहीं चल सका है।

रक्षाबंधन मनाकर सुबह ही दिल्ली लौटा था अर्पित

अर्पित के परिवार के लिए इस हादसे की सबसे दर्दनाक बात यह है कि उनका बेटा कुछ ही घंटे पहले दिल्ली वापस लौटा था। वह रक्षाबंधन मनाने के लिए अपने घर देवास गया था। परिवार के साथ त्योहार मनाने के बाद उसने रविवार सुबह दिल्ली के लिए वापसी की थी।

घरवालों को क्या पता था कि बेटे की यह वापसी उनके जीवन की सबसे बड़ी चिंता में बदल जाएगी।

परिवार के मुताबिक, हादसे से कुछ समय पहले करीब दोपहर 12 बजे अर्पित ने अपनी मां से वीडियो कॉल पर बात की थी। बातचीत के दौरान उसने बताया था कि वह सुरक्षित पीजी पहुंच गया है। मां से बात करते हुए उसने कहा था कि वह थोड़ा आराम करेगा और इसके बाद फिर बात करेगा।

लेकिन वह ‘फिर बात’ कभी नहीं हो सकी।

वीडियो कॉल खत्म होने के कुछ समय बाद ही अर्पित का फोन बंद हो गया। परिवार ने कई बार कॉल करने की कोशिश की, लेकिन फोन नहीं लगा। मैसेज भेजे गए, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद जैसे-जैसे सत्य निकेतन में इमारत गिरने की खबर सामने आई, परिवार की चिंता डर में बदल गई।

‘बेटे ने कहा था, आराम कर लूं फिर बात करता हूं’

अर्पित की मां को सबसे ज्यादा वही आखिरी बातचीत याद आ रही है। बेटे की आवाज, उसका चेहरा और वीडियो कॉल पर कही गई आखिरी बात अब उनके लिए जिंदगी भर की याद बन गई है।

एक मां के लिए इससे ज्यादा मुश्किल स्थिति शायद ही कोई हो सकती है कि उसे यह भी पता न हो कि उसका बेटा जिंदा है या नहीं।

वह लगातार प्रशासन और रेस्क्यू टीम से अपने बेटे को खोजने की गुहार लगा रही हैं। उनकी आंखें हर उस व्यक्ति की तरफ उम्मीद से देखती हैं जो मलबे की ओर से वापस आता है। शायद कोई अर्पित की खबर लेकर आए, शायद कोई कह दे कि उसका बेटा मिल गया है।

लेकिन अभी तक परिवार को कोई ऐसी खबर नहीं मिली है।

दोस्तों ने अस्पतालों में भी तलाशा

अर्पित के दोस्तों ने भी उसे खोजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हादसे की जानकारी मिलने के बाद उसके दोस्तों ने दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में जाकर घायल छात्रों की सूची और भर्ती मरीजों के बारे में जानकारी ली।

उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि कहीं अर्पित घायल अवस्था में किसी अस्पताल में तो भर्ती नहीं है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कई अस्पतालों में तलाश के बावजूद उसका कोई पता नहीं चला।

अब परिवार की उम्मीद उस मलबे पर टिकी है, जहां राहत और बचाव दल लगातार काम कर रहे हैं।

पिता पिछले साल खुद दिल्ली छोड़कर गए थे

अर्पित के पिता के लिए भी यह हादसा किसी बुरे सपने से कम नहीं है। उन्होंने बताया कि पिछले साल वह खुद बेटे के साथ दिल्ली आए थे और उसे पीजी में छोड़कर गए थे।

उस समय उन्हें पीजी में कोई बड़ी समस्या नजर नहीं आई थी। उन्हें लगा था कि बेटा दिल्ली में रहकर पढ़ाई करेगा और अपने भविष्य को बेहतर बनाएगा।

लेकिन अब वही जगह उनके लिए डर और दर्द की तस्वीर बन चुकी है।

पिता के मन में भी यही सवाल है कि जिस इमारत में उनका बेटा रह रहा था, उसकी सुरक्षा को लेकर पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं थे। अगर इमारत पुरानी थी या उसमें निर्माण और मरम्मत का काम चल रहा था तो वहां छात्रों को रहने की अनुमति कैसे मिली?

इन सवालों के जवाब फिलहाल जांच के दायरे में हैं।

दोपहर करीब डेढ़ बजे भरभराकर गिरी इमारत

सत्य निकेतन में रविवार दोपहर करीब डेढ़ बजे पांच मंजिला पीजी की इमारत अचानक ढह गई। बताया गया कि इस इमारत को ‘Hostel Daze’ के नाम से जाना जाता था।

हादसे के वक्त इमारत में छात्र और अन्य लोग मौजूद थे। इमारत के अचानक गिरने से बड़ी संख्या में लोग मलबे में फंस गए। घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई और स्थानीय लोगों के साथ पुलिस तथा बचाव दल ने राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया।

अब तक छह लोगों की मौत की जानकारी सामने आ चुकी है और कई छात्र घायल हुए हैं। कुछ लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका के चलते रेस्क्यू ऑपरेशन लगातार जारी है।

बेसमेंट में चल रहा था मरम्मत का काम

प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, इमारत के बेसमेंट में मरम्मत या निर्माण से जुड़ा काम चल रहा था। पुलिस और प्रशासन की जांच में यह भी देखा जा रहा है कि इस काम का इमारत की संरचना पर कोई असर पड़ा था या नहीं।

इमारत पुरानी होने और उसमें चल रहे निर्माण कार्य समेत कई पहलुओं की जांच की जा रही है। हालांकि, हादसे की सटीक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना और लापता छात्रों का पता लगाना है।

सत्य निकेतन में हर तरफ अपनों की तलाश

दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक स्थित सत्य निकेतन में बड़ी संख्या में छात्र पीजी और किराये के कमरों में रहते हैं। कॉलेजों के नजदीक होने के कारण देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र यहां पढ़ाई के लिए आते हैं।

कम किराये और कॉलेज से कम दूरी की वजह से यह इलाका छात्रों के बीच लोकप्रिय है। लेकिन हादसे के बाद यहां मौजूद कई इमारतों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि पुराने भवनों में अतिरिक्त निर्माण, बेसमेंट और दूसरे बदलावों की निगरानी कितनी प्रभावी है।

अर्पित जैसे सैकड़ों छात्र अपने घरों से दूर यहां सिर्फ एक उम्मीद लेकर आते हैं—पढ़ाई करेंगे, नौकरी पाएंगे और परिवार का भविष्य बदलेंगे। लेकिन रविवार का हादसा कई परिवारों के इन्हीं सपनों पर भारी पड़ गया।

मां की आंखें अब भी मलबे पर टिकी हैं

अर्पित की मां के लिए इस समय न राजनीति मायने रखती है, न मुआवजा और न ही कोई और बात। उनकी पूरी दुनिया सिर्फ उनके बेटे के इर्द-गिर्द सिमट गई है।

जिस बेटे से रविवार दोपहर वीडियो कॉल पर बात हुई थी, उसी बेटे का अब कोई फोन नहीं आ रहा। वह बार-बार उसका नाम पुकारती हैं और शायद मन ही मन उस आखिरी बातचीत को दोहरा रही हैं।

‘अर्पित ने कहा था—थोड़ा आराम कर लूं, फिर बात करता हूं।’

मां को अब उसी फोन कॉल के बाद बेटे की आवाज सुनने का इंतजार है।

सत्य निकेतन के मलबे में सिर्फ ईंट और सीमेंट नहीं दबे हैं। वहां कई परिवारों की उम्मीदें, बच्चों के सपने और उनके भविष्य की तस्वीरें भी दबी हुई हैं। रेस्क्यू टीम मलबे का एक-एक हिस्सा हटाकर जिंदगी तलाश रही है और दूसरी तरफ अर्पित की मां जैसी कई मां-बाप अपने बच्चों की एक झलक के लिए टकटकी लगाए बैठे हैं।

अर्पित की मां की पुकार अब सिर्फ एक बेटे की तलाश नहीं, बल्कि उस उम्मीद की आवाज बन गई है कि मलबे के नीचे से शायद कोई जिंदगी अभी भी उन्हें पुकार रही हो।

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