2030 तक दुनिया में आने वाला है बड़ा संकट! WHO की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, 1.11 करोड़ हेल्थ वर्कर्स की होगी कमी?
नई दिल्ली/जिनेवा। दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक ऐसी चेतावनी जारी की है, जिसका असर आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पर पड़ सकता है। WHO की नई रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक दुनिया में स्वास्थ्य और देखभाल से जुड़े कर्मचारियों की संभावित कमी 1.11 करोड़ तक पहुंच सकती है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि स्वास्थ्यकर्मियों की कमी केवल उनकी संख्या से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि कई देशों में मौजूदा डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की उम्र भी बढ़ रही है।
WHO ने 18 सितंबर 2026 को जारी अपनी नई रिपोर्ट “National health workforce accounts: health workforce levels and trends 2026” में वैश्विक हेल्थ वर्कफोर्स की स्थिति और आने वाले वर्षों की चुनौतियों का विश्लेषण किया है। रिपोर्ट में 100 से अधिक देशों से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
2030 तक 1.11 करोड़ हेल्थ वर्कर्स की कमी क्यों?
WHO के मुताबिक दुनियाभर में हेल्थ वर्कफोर्स की संख्या पिछले दो दशकों में बढ़ी है। वर्ष 2006 में प्रति 10 हजार लोगों पर स्वास्थ्यकर्मियों का वैश्विक घनत्व करीब 44.8 था, जो 2025 में बढ़कर 67.9 हो गया। दुनिया में अब स्वास्थ्य और देखभाल से जुड़े कर्मचारियों की संख्या 7 करोड़ से अधिक हो चुकी है।
इसके बावजूद स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता हर देश और क्षेत्र में समान नहीं है। WHO के अनुसार स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ने के बावजूद कई देशों में जरूरत के मुकाबले डॉक्टर, नर्स, मिडवाइफ, फार्मासिस्ट और अन्य स्वास्थ्यकर्मी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। यही असमानता आने वाले वर्षों में वैश्विक कमी को और गंभीर बना सकती है।
WHO ने 2030 तक वैश्विक स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का अनुमान 1.11 करोड़ लगाया है। इसका सबसे ज्यादा असर कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों पर पड़ने की आशंका है।
डॉक्टरों की उम्र बढ़ना भी बन रहा बड़ी चुनौती
WHO की रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है। दुनिया के कई देशों में केवल मरीजों की आबादी ही बूढ़ी नहीं हो रही, बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों की औसत उम्र भी बढ़ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार 122 देशों के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर औसतन लगभग हर चार में से एक डॉक्टर की उम्र 55 वर्ष से अधिक है। ऐसे डॉक्टरों में बड़ी संख्या अगले दशक में रिटायरमेंट की उम्र तक पहुंच सकती है।
उच्च आय वाले देशों में स्थिति और ज्यादा चुनौतीपूर्ण बताई गई है। यहां लगभग हर तीन में से एक डॉक्टर अगले 10 वर्षों में रिटायर हो सकता है। इसका मतलब है कि जिन देशों में पहले से स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी व्यवस्था मौजूद है, उन्हें भी आने वाले वर्षों में अनुभवी स्वास्थ्यकर्मियों की जगह नए कर्मचारियों को तैयार करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
एक साथ दो तरफ से बढ़ रहा दबाव
WHO ने इस स्थिति को एक तरह के दोहरे दबाव के रूप में सामने रखा है।
एक तरफ दुनिया की आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। उम्र बढ़ने के साथ लोगों को लंबे समय तक इलाज, नियमित जांच, दवाओं और देखभाल की जरूरत बढ़ सकती है।
दूसरी तरफ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने वाले डॉक्टर, नर्स और अन्य कर्मचारी भी उम्रदराज हो रहे हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ने और स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता में कमी आने की स्थिति एक साथ पैदा हो सकती है।
WHO के मुताबिक यही स्थिति आने वाले वर्षों में कई स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
67 देशों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का अनुमान
WHO की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक 67 देशों में इतनी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध नहीं होंगे कि वे अपनी मौजूदा स्वास्थ्य जरूरतों और मानकों को बनाए रख सकें।
इसका मतलब यह नहीं है कि इन देशों में डॉक्टर या नर्स बिल्कुल नहीं होंगे। बल्कि इसका अर्थ यह है कि उपलब्ध स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या देश की आबादी और स्वास्थ्य जरूरतों के अनुपात में पर्याप्त नहीं हो सकती।
इस स्थिति का असर अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और बुजुर्गों की देखभाल जैसी सेवाओं पर पड़ सकता है।
अमीर और गरीब देशों के बीच बड़ा अंतर
WHO की रिपोर्ट ने स्वास्थ्यकर्मियों के असमान वितरण को भी प्रमुख समस्या बताया है।
दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में डॉक्टरों और नर्सों की उपलब्धता में काफी अंतर है। WHO के आंकड़ों के अनुसार यूरोपीय क्षेत्र में प्रति आबादी डॉक्टरों का घनत्व अफ्रीकी क्षेत्र की तुलना में लगभग 13 गुना ज्यादा है। नर्सों और मिडवाइफ का घनत्व भी यूरोपीय क्षेत्र में अफ्रीकी क्षेत्र की तुलना में लगभग छह गुना ज्यादा है।
इसका सीधा मतलब यह है कि वैश्विक स्तर पर हेल्थ वर्कर्स की समस्या केवल कर्मचारियों की कुल संख्या बढ़ाने से हल नहीं होगी। उन्हें उन देशों और क्षेत्रों तक भी पहुंचाना होगा जहां स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत ज्यादा है।
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में ज्यादा परेशानी
स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का प्रभाव अक्सर ग्रामीण, दूरदराज और आर्थिक रूप से कमजोर इलाकों में ज्यादा दिखाई देता है।
कई देशों में बड़े शहरों में अस्पताल और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और नर्सों की संख्या कम रहती है। WHO भी स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती के साथ-साथ उनकी deployment और retention यानी जरूरत वाले क्षेत्रों में तैनाती और लंबे समय तक बनाए रखने को महत्वपूर्ण चुनौती मानता है।
यदि आने वाले वर्षों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी बढ़ती है, तो दूरदराज के इलाकों में मरीजों को विशेषज्ञ सेवाओं के लिए ज्यादा दूरी तय करनी पड़ सकती है।
विदेशों से स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती बढ़ने का खतरा
WHO की रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई है कि स्वास्थ्यकर्मियों की कमी पूरी करने के लिए कुछ समृद्ध देश दूसरे देशों से डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं।
ऐसी स्थिति में पहले से स्वास्थ्यकर्मियों की कमी झेल रहे गरीब देशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। यदि प्रशिक्षित डॉक्टर और नर्स बेहतर वेतन तथा सुविधाओं के लिए दूसरे देशों में चले जाते हैं, तो उनके मूल देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
WHO ने इसी वजह से स्वास्थ्यकर्मियों की अंतरराष्ट्रीय भर्ती में नैतिक और संतुलित नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया है।
शिक्षा और ट्रेनिंग पर बढ़ाना होगा निवेश
WHO की रिपोर्ट से यह भी संकेत मिलता है कि भविष्य की जरूरतों को देखते हुए स्वास्थ्यकर्मियों की शिक्षा और प्रशिक्षण क्षमता बढ़ाना जरूरी होगा।
सिर्फ मेडिकल कॉलेजों या नर्सिंग संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करने के बाद उन्हें रोजगार उपलब्ध कराना, बेहतर कामकाजी परिस्थितियां देना और लंबे समय तक सिस्टम में बनाए रखना भी जरूरी होगा।
WHO के अनुसार स्वास्थ्यकर्मियों में निवेश स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और सतत विकास के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।
टेक्नोलॉजी भी बन सकती है मददगार
स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को देखते हुए डिजिटल हेल्थ, टेलीमेडिसिन और अन्य तकनीकी समाधानों की भूमिका भी बढ़ सकती है।
टेक्नोलॉजी के जरिए दूरदराज के मरीज विशेषज्ञों से सलाह ले सकते हैं और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशासनिक काम का कुछ बोझ कम किया जा सकता है। हालांकि तकनीक डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों का पूरी तरह विकल्प नहीं है।
विशेष रूप से गंभीर बीमारी, आपातकालीन स्थिति, सर्जरी और प्रत्यक्ष मरीज देखभाल के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की आवश्यकता बनी रहेगी।
WHO की रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
WHO की 2026 की रिपोर्ट स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या के साथ-साथ उनकी उम्र, क्षेत्रीय वितरण और भविष्य की जरूरतों पर भी ध्यान देती है।
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया ने स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने में प्रगति की है, लेकिन यह प्रगति सभी देशों में समान नहीं है। स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता अब भी किसी देश की आर्थिक स्थिति से काफी जुड़ी हुई है।
WHO का कहना है कि बेहतर डेटा के आधार पर स्वास्थ्यकर्मियों की भविष्य की जरूरतों की योजना बनाना जरूरी है। इसके लिए शिक्षा, रोजगार, भर्ती, तैनाती और कर्मचारियों को बनाए रखने की रणनीति पर एक साथ काम करना होगा।
आने वाले वर्षों के लिए बड़ा संकेत
2030 अभी कुछ साल दूर है, लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों की ट्रेनिंग में कई वर्ष लगते हैं। एक डॉक्टर या विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मी को तैयार करने में लंबा समय लग सकता है। इसलिए भविष्य की कमी को दूर करने के लिए कदम समय रहते उठाने की जरूरत होगी।
WHO की चेतावनी का मुख्य संदेश यही है कि दुनिया में स्वास्थ्यकर्मियों की कुल संख्या बढ़ने के बावजूद समस्या खत्म नहीं हुई है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जहां मरीजों को स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है, वहां पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित और अनुभवी स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध हों।
अगर स्वास्थ्यकर्मियों की उम्र बढ़ने, रिटायरमेंट, असमान वितरण, प्रशिक्षण और रोजगार की समस्याओं को समय रहते संबोधित नहीं किया गया, तो 2030 तक अनुमानित 1.11 करोड़ की कमी कई देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

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