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कुत्ते ने सूंघा और खुल गया कैंसर का राज! भारत में AI के साथ हो रहा ऐसा प्रयोग, सामने आए हैरान करने वाले नतीजे


कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों के मुकाबले कई गुना ज्यादा तेज मानी जाती है। यही वजह है कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अक्सर विस्फोटक, ड्रग्स, संदिग्ध सामान या अपराध से जुड़े सुराग तलाशने के लिए प्रशिक्षित कुत्तों की मदद लेती हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या यही क्षमता किसी बीमारी का पता लगाने में भी इस्तेमाल की जा सकती है? खासतौर पर क्या कुत्ते किसी व्यक्ति के शरीर की गंध या सांस में मौजूद संकेतों के आधार पर कैंसर की पहचान कर सकते हैं?

यह सवाल सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है। हॉलीवुड की फिल्म 'द आर्ट ऑफ रेसिंग इन द रेन' में भी एक ऐसा दृश्य दिखाया गया है, जिसमें कुत्ता अपनी मालकिन के शरीर में कैंसर होने का संकेत सूंघकर पहचान लेता है। फिल्म की कहानी भले काल्पनिक हो, लेकिन कुत्तों की सूंघने की क्षमता को मेडिकल रिसर्च में इस्तेमाल करने की संभावना पर वैज्ञानिक लंबे समय से अध्ययन करते रहे हैं।

अब भारत में भी इसी दिशा में एक हेल्थ-टेक स्टार्टअप कुत्तों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से कैंसर से जुड़े संकेतों की पहचान करने की कोशिश कर रहा है। शुरुआती अध्ययन में इसके परिणाम उत्साहजनक बताए गए हैं। हालांकि, यह समझना बेहद जरूरी है कि यह तकनीक अभी सामान्य मेडिकल डायग्नोसिस का विकल्प नहीं है और किसी व्यक्ति को केवल इस टेस्ट के आधार पर कैंसर का मरीज नहीं माना जा सकता।

बीमारी होने पर शरीर की गंध में क्यों आता है बदलाव?

दरअसल, हमारे शरीर के अंदर हर समय कई तरह की जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। इन प्रक्रियाओं के दौरान अलग-अलग तरह के केमिकल कंपाउंड्स बनते हैं। इनमें कुछ ऐसे पदार्थ भी होते हैं जिन्हें वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स यानी VOCs कहा जाता है।

ये कंपाउंड्स सांस, पसीने, पेशाब और शरीर से निकलने वाले दूसरे तरल पदार्थों के जरिए बाहर आ सकते हैं। अलग-अलग बीमारियां शरीर के अंदर होने वाली जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर से निकलने वाले VOCs के पैटर्न में भी बदलाव आ सकता है।

कैंसर जैसी बीमारी में भी शरीर की कई प्रक्रियाओं में बदलाव होता है। वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इसी बात में है कि क्या कैंसर के कारण बनने वाले अलग-अलग केमिकल सिग्नेचर को पहचानना संभव है।

इसी जगह कुत्तों की बेहद संवेदनशील सूंघने की क्षमता महत्वपूर्ण हो सकती है।

कुत्तों की नाक कैसे बन सकती है मेडिकल रिसर्च का हिस्सा?

कुत्तों की नाक इंसानों की तुलना में बेहद संवेदनशील होती है। उन्हें अलग-अलग गंधों के बीच अंतर पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। मेडिकल रिसर्च में भी इसी क्षमता का इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है।

भारत में जिस तकनीक पर काम किया जा रहा है, उसमें शुरुआत एक बेहद सामान्य प्रक्रिया से होती है। किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए कॉटन मास्क पहनाया जाता है। इस दौरान वह सामान्य रूप से सांस लेता है और बातचीत करता है। गहरी सांस लेने के दौरान बाहर निकलने वाले कुछ कंपाउंड्स मास्क में जमा हो जाते हैं।

इसके बाद इस मास्क को प्रशिक्षित कुत्तों के पास ले जाया जाता है। कुत्तों को अलग-अलग नमूनों की गंध पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।

लेकिन इस प्रयोग की खास बात केवल कुत्तों की नाक नहीं है। यहां कुत्तों के व्यवहार और शरीर में होने वाले बदलावों को भी रिकॉर्ड करने की कोशिश की जाती है।

कुत्तों को पहनाया जाता है खास सूट

इस पूरी प्रक्रिया को और वैज्ञानिक बनाने के लिए प्रशिक्षित कुत्तों को एक विशेष तरह का सूट पहनाया जाता है। इस सूट की मदद से कुत्ते की प्रतिक्रिया से जुड़े कई संकेत रिकॉर्ड किए जा सकते हैं।

इसमें उसकी ब्रेन एक्टिविटी, हार्ट रेट, सांस लेने की गति और बॉडी लैंग्वेज जैसे संकेतों को रिकॉर्ड करने की कोशिश की जाती है। यानी केवल यह नहीं देखा जाता कि कुत्ते ने किसी नमूने को सूंघकर क्या प्रतिक्रिया दी, बल्कि उसकी शारीरिक प्रतिक्रिया को भी डेटा में बदला जाता है।

इसके बाद इस डेटा को AI मॉडल में डाला जाता है। AI अलग-अलग संकेतों का विश्लेषण करके एक VOC रिस्क स्कोर तैयार करता है।

यही वह हिस्सा है जो इस तकनीक को पारंपरिक 'कुत्ते ने गंध पहचान ली' वाले प्रयोग से अलग बनाता है। यहां कुत्ते की सूंघने की क्षमता और मशीन लर्निंग को एक साथ इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है।

स्टडी में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

बताई गई स्टडी के मुताबिक, इस सिस्टम ने कैंसर वाले मामलों में 10 में से करीब 9 मामलों की सही पहचान की। वहीं, जिन लोगों को कैंसर नहीं था, उनमें भी करीब 10 में से 9 मामलों को सही तरीके से पहचानने का दावा किया गया।

इस तरह के परिणाम निश्चित तौर पर मेडिकल रिसर्च के लिए महत्वपूर्ण माने जा सकते हैं, क्योंकि अगर किसी तकनीक की मदद से कैंसर के संभावित संकेतों को शुरुआती स्तर पर पहचानने में सहायता मिलती है तो आगे की जांच के लिए मरीजों को सही दिशा में भेजा जा सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह अध्ययन कर्नाटक के छह अस्पतालों में तीन हजार से ज्यादा लोगों पर किया गया। अंतिम टेस्टिंग ग्रुप में 283 मरीज शामिल थे, जिनमें बायोप्सी के जरिए पहले ही कैंसर की पुष्टि हो चुकी थी।

अध्ययन में एक और बात पर ध्यान दिया गया कि अलग-अलग स्टेज के कैंसर मामलों में सिस्टम के प्रदर्शन को देखा गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अलग-अलग स्टेज में इसके प्रदर्शन में बड़ा अंतर नहीं देखा गया।

क्या अब अस्पतालों में कुत्ते कैंसर की जांच करेंगे?

यह सवाल सबसे ज्यादा लोगों के मन में आ सकता है। लेकिन इसका जवाब फिलहाल नहीं है।

किसी स्टडी में अच्छे परिणाम आने का मतलब यह नहीं है कि तकनीक तुरंत मेडिकल डायग्नोसिस के लिए तैयार हो गई है। कैंसर की पुष्टि के लिए डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक जांच, इमेजिंग टेस्ट, ब्लड टेस्ट और जरूरत पड़ने पर बायोप्सी जैसी स्थापित जांचों का इस्तेमाल करते हैं।

कुत्ते और AI आधारित VOC टेस्ट को फिलहाल एक संभावित स्क्रीनिंग या सहायक टूल के रूप में देखना ज्यादा उचित है। अगर आगे बड़े और स्वतंत्र अध्ययनों में इसके परिणाम लगातार विश्वसनीय पाए जाते हैं, तभी इसका व्यापक मेडिकल इस्तेमाल संभव हो सकता है।

AI और कुत्तों का मेल क्यों है खास?

इस तकनीक का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें इंसान, कुत्ता और AI तीनों की क्षमताओं को एक साथ इस्तेमाल किया जा रहा है।

कुत्ता बेहद सूक्ष्म गंधों में अंतर पहचान सकता है। वहीं, AI बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण कर सकता है और ऐसे पैटर्न खोज सकता है जिन्हें इंसान के लिए पहचानना मुश्किल हो। अगर दोनों की क्षमताओं को सही तरीके से जोड़ा जाए तो भविष्य में बीमारी की शुरुआती स्क्रीनिंग के लिए एक नया रास्ता खुल सकता है।

हालांकि, इस दिशा में अभी काफी रिसर्च की जरूरत है। यह भी देखना जरूरी होगा कि अलग-अलग उम्र, खान-पान, दवाओं, अन्य बीमारियों और जीवनशैली से शरीर की गंध में होने वाले बदलाव इस तकनीक के परिणामों को कितना प्रभावित करते हैं।

कैंसर की जांच में भविष्य की नई उम्मीद?

कैंसर का जल्दी पता लगना इलाज की संभावनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए दुनिया भर में वैज्ञानिक ऐसे तरीकों की तलाश कर रहे हैं जो कम खर्चीले, आसान और कम तकलीफ वाले हों।

सांस के नमूने से शरीर के VOCs का विश्लेषण इसी दिशा में एक संभावित रास्ता है। भारत में कुत्तों और AI को मिलाकर किया जा रहा यह प्रयोग इस क्षेत्र में एक दिलचस्प कदम माना जा सकता है।

फिर भी, फिलहाल इसे लेकर उत्साहित होने के साथ सावधानी बरतना जरूरी है। कुत्ते किसी व्यक्ति के कैंसर की अंतिम पुष्टि नहीं कर सकते और इस तरह के प्रयोग को बायोप्सी या डॉक्टर द्वारा सुझाई गई स्थापित जांचों का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

आने वाले समय में अगर बड़े स्तर पर होने वाले शोध इस तकनीक की सटीकता और विश्वसनीयता को साबित करते हैं, तो संभव है कि किसी दिन अस्पतालों में कैंसर की शुरुआती स्क्रीनिंग के लिए इंसानी विशेषज्ञों के साथ प्रशिक्षित कुत्तों और AI की भूमिका भी देखने को मिले। फिलहाल यह तकनीक शोध के चरण में है, लेकिन इसके शुरुआती नतीजों ने मेडिकल जगत में एक बेहद दिलचस्प सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या भविष्य में बीमारी का पहला संकेत डॉक्टर की मशीन नहीं, बल्कि एक प्रशिक्षित कुत्ते की नाक देगी?

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