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‘ओल्ड मोंक’ के दीवानों के लिए बड़ा झटका! बोतल में ऐसा क्या निकला कि FSSAI पहुंचा हाईकोर्ट, अब 8 सितंबर को होगा फैसला?



मुंबई। अगर आप भी ओल्ड मोंक के शौकीन हैं तो महाराष्ट्र से आई यह खबर आपको हैरान कर सकती है। महाराष्ट्र में ओल्ड मोंक की बिक्री पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की ओर से लगाई गई रोक को चुनौती देने वाली याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस मामले में गुरुवार को अदालत में FSSAI की ओर से रखी गई दलील ने पूरे विवाद को एक नए मोड़ पर ला दिया।

मामले की सुनवाई के दौरान FSSAI ने सवाल उठाया कि क्या केवल न्यूट्रल स्पिरिट में बाहर से रम का फ्लेवर मिलाकर तैयार किए गए उत्पाद को कानूनी तौर पर ‘रम’ कहा जा सकता है? FSSAI का तर्क है कि अगर किसी उत्पाद में असली रम की निर्माण प्रक्रिया के बजाय न्यूट्रल स्पिरिट में बाहरी फ्लेवर मिलाया गया है, तो उसकी पहचान और लेबलिंग को लेकर खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन जरूरी है।

FSSAI ने कोर्ट में क्या कहा?

सुनवाई के दौरान FSSAI की ओर से अदालत में कहा गया कि न्यूट्रल स्पिरिट में केवल फ्लेवर मिलाने से वह उत्पाद रम नहीं बन जाता। नियामक की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि ऐसा उत्पाद असली रम की नकल करने वाला हो सकता है और इसलिए उसकी सही पहचान उपभोक्ता को बताई जानी चाहिए।

यही विवाद महाराष्ट्र में ओल्ड मोंक की बिक्री पर रोक का मुख्य आधार बना है। FSSAI का आरोप है कि संबंधित उत्पाद में बाहर से आर्टिफिशियल रम फ्लेवर मिलाया जाता है, लेकिन बोतल के लेबल पर इसकी पर्याप्त और स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती।

इस कार्रवाई के खिलाफ ओल्ड मोंक बनाने वाली कंपनी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है। कंपनी का कहना है कि वह लागू नियमों के मुताबिक अपना उत्पाद तैयार कर रही है और बिक्री पर रोक से उसके कारोबार को बड़ा नुकसान हो रहा है।

लेबल बदलने को तैयार हुई कंपनी

सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से मामले को सुलझाने की दिशा में एक प्रस्ताव भी रखा गया। कंपनी ने अपनी पैकेजिंग में बदलाव करने की बात कही और नया लेबल अदालत के सामने पेश किया।

प्रस्तावित पैकेजिंग में “एड फ्लेवर” यानी जोड़ा गया स्वाद प्रमुखता से लिखने की बात कही गई। इसके साथ ही “7 Years Old Blended” जैसे दावों को हटाने का प्रस्ताव भी दिया गया।

कंपनी की ओर से यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विवाद केवल बिक्री पर रोक तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्पाद की पहचान और उसके लेबल पर दी जाने वाली जानकारी से भी जुड़ा हुआ है।

हालांकि, FSSAI कंपनी के इस प्रस्ताव से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ। नियामक की ओर से अदालत में कहा गया कि सिर्फ बोतल का लेबल बदल देने से उत्पाद की मूल प्रकृति या उसकी गुणवत्ता और पहचान नहीं बदल जाती। यानी विवाद का समाधान केवल पैकेजिंग में बदलाव से नहीं हो सकता।

कंपनी ने कहा—बैन से हो रहा करोड़ों का नुकसान

कंपनी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने अदालत में अंतरिम राहत की मांग की। उन्होंने दलील दी कि कंपनी कृषि मूल के रेक्टिफाइड और न्यूट्रल स्पिरिट का इस्तेमाल कर नियमों के अनुरूप रम तैयार कर रही है।

कंपनी का कहना है कि महाराष्ट्र में बिक्री पर रोक जारी रहने से उसे भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। कंपनी ने अदालत से अपील की कि अंतिम फैसला आने तक उसे अपने स्टॉक की बिक्री की अनुमति दी जाए।

लेकिन अदालत ने इस मांग पर तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने क्यों नहीं दी अंतरिम राहत?

सुनवाई के दौरान एक्टिंग चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में सावधानी बरतने का संकेत दिया। अदालत ने सवाल उठाया कि अगर फिलहाल कंपनी को स्टॉक बेचने की अनुमति दे दी जाती है और बाद में अंतिम सुनवाई में यह पाया जाता है कि उत्पाद नियमों के अनुरूप नहीं था, तो उस स्थिति में क्या होगा?

यही सवाल फिलहाल कंपनी की अंतरिम राहत की राह में सबसे बड़ी अड़चन बन गया।

अदालत ने फिलहाल ओल्ड मोंक की बिक्री को लेकर कोई अंतरिम राहत नहीं दी है। इसका मतलब है कि मामले का अंतिम समाधान अभी बाकी है और कंपनी को अदालत के अगले आदेश का इंतजार करना होगा।

अब 8 सितंबर को होगी अगली सुनवाई

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर तक के लिए टाल दी है। अब अगली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत उत्पाद की प्रकृति, फ्लेवरिंग, लेबलिंग और संबंधित खाद्य सुरक्षा नियमों को लेकर दोनों पक्षों की दलीलों पर क्या रुख अपनाती है।

यह मामला सिर्फ एक लोकप्रिय ब्रांड की बिक्री पर रोक तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह बड़ा सवाल है कि किस उत्पाद को ‘रम’ कहा जा सकता है और उपभोक्ता को उसकी वास्तविक प्रकृति के बारे में बोतल पर कितनी स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए।

ओल्ड मोंक लंबे समय से भारत के लोकप्रिय डार्क रम ब्रांडों में गिना जाता है। ऐसे में महाराष्ट्र में इसकी बिक्री को लेकर उठा यह विवाद शराब उद्योग के साथ-साथ उपभोक्ताओं के लिए भी दिलचस्प है।

फिलहाल अदालत से अंतरिम राहत नहीं मिलने के बाद गेंद एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया के पाले में है। 8 सितंबर की सुनवाई में तस्वीर कुछ और साफ हो सकती है। तब यह भी सामने आएगा कि कंपनी के नए लेबल प्रस्ताव पर अदालत और FSSAI का रुख क्या रहता है और महाराष्ट्र में ओल्ड मोंक की बिक्री को लेकर आगे क्या रास्ता निकलता है।

यानी फिलहाल ओल्ड मोंक के शौकीनों के लिए मामला खत्म नहीं हुआ है—अगली सुनवाई तक इंतजार जारी है।

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