90% हिंदू महिलाओं की डिलीवरी ऑपरेशन से और 95% मुस्लिम महिलाओं की नॉर्मल? वायरल दावे के पीछे का सच जानकर चौंक जाएंगे!
सोशल मीडिया पर इन दिनों डिलीवरी और सी-सेक्शन को लेकर एक दावा तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल पोस्ट में कहा जा रहा है कि 90 फीसदी हिंदू महिलाओं की डिलीवरी ऑपरेशन यानी सी-सेक्शन से होती है, जबकि 95 फीसदी मुस्लिम महिलाओं की डिलीवरी सामान्य तरीके से होती है। पोस्ट में आगे सवाल उठाया गया है कि आखिर दोनों समुदायों की महिलाओं में डिलीवरी के तरीके में इतना बड़ा अंतर क्यों है।
वायरल दावे में यह भी कहा गया है कि हिंदू महिलाएं गर्भावस्था के दौरान लंबे समय तक इलाज और जांच पर ज्यादा खर्च करती हैं, जबकि मुस्लिम महिलाएं कथित तौर पर कम खर्च में सामान्य डिलीवरी करा लेती हैं।
लेकिन जब इस दावे की तुलना उपलब्ध राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़ों से की जाती है तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।
उपलब्ध आंकड़े इस बात का समर्थन नहीं करते कि 90 फीसदी हिंदू महिलाओं की डिलीवरी सी-सेक्शन से और 95 फीसदी मुस्लिम महिलाओं की डिलीवरी सामान्य तरीके से होती है।
राष्ट्रीय आंकड़ों में क्या सामने आया?
NFHS-5 यानी National Family Health Survey-5 के 2019-21 के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में भारत में सी-सेक्शन डिलीवरी का धर्म के अनुसार विश्लेषण किया गया।
इसके मुताबिक हिंदू महिलाओं में सी-सेक्शन डिलीवरी की दर करीब 24 फीसदी थी, जबकि मुस्लिम महिलाओं में यह दर करीब 21.9 फीसदी थी।
यानी दोनों समुदायों के बीच अंतर मौजूद जरूर है, लेकिन वह इतना बड़ा नहीं है कि किसी एक समुदाय की लगभग हर डिलीवरी ऑपरेशन से और दूसरे समुदाय की लगभग हर डिलीवरी सामान्य बताई जा सके।
एक अन्य NFHS-5 आधारित विश्लेषण में भी सी-सेक्शन की दर हिंदू महिलाओं में करीब 21.4 फीसदी और मुस्लिम महिलाओं में 19.6 फीसदी बताई गई थी।
इन आंकड़ों से साफ है कि सोशल मीडिया पर वायरल 90% और 95% वाला दावा राष्ट्रीय स्तर के उपलब्ध आंकड़ों से मेल नहीं खाता।
आखिर सी-सेक्शन की जरूरत कब पड़ती है?
सी-सेक्शन यानी Caesarean Section एक सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें बच्चे को ऑपरेशन के जरिए जन्म दिया जाता है।
कई परिस्थितियों में डॉक्टर सी-सेक्शन की सलाह दे सकते हैं। उदाहरण के तौर पर बच्चे की स्थिति सामान्य न होना, प्रसव के दौरान बच्चे की धड़कन में गंभीर समस्या, प्लेसेंटा से जुड़ी जटिलता, प्रसव का आगे न बढ़ना, कुछ मामलों में पहले सी-सेक्शन का इतिहास या मां अथवा बच्चे की ऐसी स्वास्थ्य स्थिति जिसमें सामान्य डिलीवरी जोखिमपूर्ण हो सकती है।
इसलिए सिर्फ धर्म के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी महिला की डिलीवरी सामान्य होगी या सी-सेक्शन से।
सिर्फ धर्म नहीं, कई दूसरे कारण भी महत्वपूर्ण
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शोधों के अनुसार सी-सेक्शन की दर पर कई सामाजिक, आर्थिक, चिकित्सकीय और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कारकों का असर पड़ता है।
उम्र, पहली डिलीवरी या बाद की डिलीवरी, महिला की शिक्षा, आर्थिक स्थिति, शहरी या ग्रामीण क्षेत्र, अस्पताल का प्रकार, गर्भावस्था के दौरान मिलने वाली देखभाल और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं सी-सेक्शन की संभावना को प्रभावित कर सकती हैं।
एक NFHS-5 आधारित अध्ययन में भी सी-सेक्शन की दर में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र, शिक्षा और आर्थिक स्थिति के साथ महत्वपूर्ण अंतर देखा गया।
उदाहरण के लिए इसी विश्लेषण में शहरी महिलाओं में सी-सेक्शन की दर करीब 34.7 फीसदी और ग्रामीण महिलाओं में करीब 19.8 फीसदी थी।
इससे संकेत मिलता है कि डिलीवरी के तरीके को समझने के लिए केवल धर्म को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है।
निजी अस्पतालों में सी-सेक्शन की दर क्यों ज्यादा हो सकती है?
भारत में सी-सेक्शन की बढ़ती दर को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है।
कुछ शोधों में निजी स्वास्थ्य संस्थानों में सी-सेक्शन की दर सरकारी संस्थानों की तुलना में अधिक पाई गई है। इसके पीछे मरीजों की चिकित्सकीय स्थिति के साथ-साथ अस्पताल की सुविधाएं, डॉक्टर की उपलब्धता, प्रसव की निगरानी, मरीज की पसंद और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कई कारक हो सकते हैं।
इसलिए किसी समुदाय की महिलाओं के बारे में यह कहना कि वे केवल धर्म या समुदाय की वजह से ज्यादा सामान्य डिलीवरी कराती हैं, वैज्ञानिक रूप से उचित निष्कर्ष नहीं होगा।
क्या ज्यादा सी-सेक्शन का मतलब महिला कमजोर हो जाती है?
वायरल पोस्ट में यह भी दावा किया गया है कि ऑपरेशन के कारण हिंदू महिलाएं शारीरिक रूप से कमजोर हो जाती हैं।
यह दावा भी बहुत सामान्यीकृत है।
सी-सेक्शन एक बड़ी सर्जरी है और इसके बाद महिला को रिकवरी के लिए समय चाहिए। सामान्य डिलीवरी की तुलना में ऑपरेशन के बाद अस्पताल में रहने और रिकवरी की अवधि अधिक हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर महिला लंबे समय तक कमजोर रहती है।
महिला की सेहत पर पोषण, एनीमिया, नींद, शारीरिक गतिविधि, गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य, प्रसव के बाद की देखभाल और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों का भी बड़ा प्रभाव पड़ता है।
हाल की स्वास्थ्य रिपोर्टों में भारत में मातृ पोषण और एनीमिया को भी सी-सेक्शन तथा गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण कारक माना गया है।
ज्यादा बच्चे होने का मतलब ज्यादा मजबूत शरीर नहीं
वायरल पोस्ट में एक और तुलना की गई है कि मुस्लिम महिलाओं के ज्यादा बच्चे होने के बावजूद वे ज्यादा मजबूत रहती हैं।
यह निष्कर्ष भी वैज्ञानिक आधार पर नहीं निकाला जा सकता।
किसी महिला के कितने बच्चे हैं और उसका शरीर कितना स्वस्थ है—इन दोनों चीजों के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।
बार-बार गर्भधारण महिला के शरीर पर प्रभाव डाल सकता है, लेकिन उसका प्रभाव महिला की उम्र, पोषण, एनीमिया, गर्भधारण के बीच का अंतर, प्रसव के तरीके और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।
इसलिए “ज्यादा बच्चे = ज्यादा मजबूत महिला” जैसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
भारत में सी-सेक्शन की दर वास्तव में बढ़ी है
हालांकि वायरल पोस्ट का धर्म आधारित आंकड़ा गलत है, लेकिन उसके पीछे एक वास्तविक स्वास्थ्य समस्या जरूर है—भारत में सी-सेक्शन डिलीवरी की दर बढ़ी है।
NFHS के आंकड़ों के अनुसार देश में सी-सेक्शन की दर NFHS-3 में करीब 8.5 फीसदी थी, जो NFHS-5 में बढ़कर करीब 21.5 फीसदी हो गई।
यानी देश में सी-सेक्शन की बढ़ती संख्या पर गंभीरता से चर्चा और अध्ययन की जरूरत है।
लेकिन इसका समाधान किसी धर्म या समुदाय को जिम्मेदार ठहराना नहीं है।
क्या हर सी-सेक्शन गलत है?
नहीं।
जब मां या बच्चे की जान बचाने के लिए सी-सेक्शन जरूरी हो, तब यह एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवनरक्षक चिकित्सा प्रक्रिया हो सकती है।
समस्या तब मानी जाती है जब बिना पर्याप्त चिकित्सकीय कारण के अनावश्यक सी-सेक्शन किया जाए। इसलिए गर्भवती महिलाओं के लिए यह जरूरी है कि वे अपनी गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच कराएं और प्रसव के तरीके को लेकर अपने डॉक्टर से पूरी जानकारी लें।
गर्भवती महिलाओं को क्या ध्यान रखना चाहिए?
गर्भावस्था के दौरान नियमित एंटीनेटल चेकअप कराना बेहद जरूरी है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार रक्त की जांच, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, बच्चे की ग्रोथ और अन्य जरूरी जांच करानी चाहिए।
अगर महिला को एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या गर्भावस्था से जुड़ी कोई अन्य समस्या है तो उसका समय पर इलाज जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डिलीवरी का तरीका धर्म देखकर नहीं, मां और बच्चे की स्वास्थ्य स्थिति देखकर तय होना चाहिए।
वायरल दावे का निष्कर्ष
सोशल मीडिया पर वायरल यह दावा कि “90% हिंदू महिलाओं की डिलीवरी ऑपरेशन से और 95% मुस्लिम महिलाओं की डिलीवरी नॉर्मल होती है”, उपलब्ध राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़ों से सही साबित नहीं होता।
NFHS-5 आधारित आंकड़ों में हिंदू महिलाओं में सी-सेक्शन करीब 24 फीसदी और मुस्लिम महिलाओं में करीब 21.9 फीसदी पाया गया।
इसलिए इस मुद्दे को धर्म के आधार पर देखने के बजाय भारत में बढ़ती सी-सेक्शन दर, मातृ पोषण, एनीमिया, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और अनावश्यक ऑपरेशन जैसे वास्तविक स्वास्थ्य मुद्दों पर चर्चा करना ज्यादा जरूरी है।
मां और बच्चे की सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता है। सामान्य डिलीवरी हो या सी-सेक्शन—सही फैसला वही है जो डॉक्टर की चिकित्सकीय जांच और मां-बच्चे की स्थिति के आधार पर लिया जाए।

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