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SCO में शहबाज ने पानी को लेकर छेड़ा बड़ा मुद्दा, भारत ने भी दे दिया दो टूक जवाब! अब सिंधु जल संधि पर क्या होगा?



बिश्केक: शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई दिया। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित SCO बैठक के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने साझा जल संसाधनों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पानी को कभी भी राजनीतिक दबाव या हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

शरीफ ने कहा कि पानी पूरे क्षेत्र की “जीवन रेखा” है। यह लाखों लोगों की जिंदगी, खेती और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है। उन्होंने साझा जल संसाधनों से संबंधित संधियों को बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता बताते हुए उनके पालन की मांग की।

हालांकि शरीफ ने अपने भाषण में भारत का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन उनका बयान स्पष्ट रूप से 1960 की सिंधु जल संधि को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा था। यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में हेग स्थित मध्यस्थता अदालत ने सिंधु जल संधि से जुड़े भारत के कदम पर फैसला दिया और भारत ने उस फैसले को मानने से इनकार कर दिया है।

भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को ‘अबeyance’ में रखा

सिंधु जल संधि को लेकर मौजूदा विवाद की शुरुआत अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद हुई। हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाए। इन्हीं कदमों में सिंधु जल संधि को अबeyance यानी अगले निर्णय तक स्थगित रखने का फैसला भी शामिल था।

भारत का कहना रहा है कि सीमा पार आतंकवाद और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों के बीच सामान्य परिस्थितियों की तरह जल संधि को जारी रखना संभव नहीं है।

नई दिल्ली ने लगातार यह रुख रखा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को छोड़कर अपनी भूमिका में ठोस बदलाव नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि को सामान्य रूप से लागू करने का सवाल नहीं उठता। भारत सरकार ने जुलाई 2026 में भी कहा था कि संधि तब तक अबeyance में रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन से खुद को अलग नहीं करता।

हेग की अदालत के फैसले के बाद बढ़ा विवाद

सिंधु जल संधि पर भारत के फैसले के खिलाफ पाकिस्तान ने हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) की प्रक्रिया का सहारा लिया।

31 अगस्त 2026 को अदालत ने भारत के संधि को अबeyance में रखने के फैसले पर पाकिस्तान के पक्ष में महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए। अदालत ने कहा कि संधि के तहत भारत की ओर से एकतरफा तरीके से संधि को निलंबित या समाप्त करने का आधार नहीं बनता। अदालत ने कुछ जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े निर्माण पर भी अंतरिम सीमाएं लगाईं।

पाकिस्तान ने इस फैसले को अपनी स्थिति के समर्थन के तौर पर देखा। इसके ठीक बाद शहबाज शरीफ ने SCO मंच से पानी को हथियार न बनाने की अपील की।

लेकिन भारत ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया।

भारत ने अदालत के अधिकार क्षेत्र पर ही उठाया सवाल

नई दिल्ली का कहना है कि जिस कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने यह फैसला दिया है, उसका गठन ही भारत की सहमति के बिना किया गया और इसलिए भारत उसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता।

भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि अदालत भारत के संप्रभु फैसलों पर आदेश देने की स्थिति में नहीं है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत का फैसला अभी भी प्रभावी है और संबंधित मध्यस्थता प्रक्रिया भारत के लिए बाध्यकारी नहीं है।

इस तरह विवाद अब केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रहा है। इसके साथ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, संप्रभु अधिकार और आतंकवाद के मुद्दे भी सीधे जुड़ गए हैं।

SCO मंच पर शहबाज ने क्या कहा?

SCO बैठक में शहबाज शरीफ ने पानी को लेकर अपनी चिंता सामने रखते हुए कहा कि साझा जल संसाधनों से जुड़ी संधियां केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं बदली जा सकतीं।

उनके मुताबिक, ऐसी संधियां लाखों लोगों के जीवन और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी होती हैं और उन्हें बिना शर्त लागू किया जाना चाहिए।

उन्होंने पानी को राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल किए जाने का विरोध किया और कहा कि साझा जल संसाधनों को लेकर क्षेत्रीय देशों को सहयोग और बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई देशों के नेताओं की मौजूदगी वाले SCO मंच पर आया।

भारत ने भी आतंकवाद पर दिया कड़ा संदेश

जहां पाकिस्तान ने SCO में पानी का मुद्दा उठाया, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में आतंकवाद को लेकर बेहद कड़ा संदेश दिया।

मोदी ने बिना पाकिस्तान का नाम लिए कहा कि आतंकवाद को किसी भी देश की रणनीतिक नीति का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने आतंकवादियों को पनाह देने और उनका समर्थन करने वाले देशों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े कदम उठाने की जरूरत बताई।

इससे SCO सम्मेलन में भारत-पाकिस्तान के बीच मौजूद तनाव एक बार फिर अप्रत्यक्ष रूप से सामने आया।

एक तरफ पाकिस्तान पानी की संधि और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की बात कर रहा था, वहीं भारत का जोर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और सुरक्षा पर था।

पाकिस्तान के लिए सिंधु जल संधि क्यों महत्वपूर्ण है?

1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के बीच व्यवस्था बनाई गई।

पाकिस्तान के लिए यह संधि बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी कृषि और बड़ी आबादी का एक बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। इसी कारण भारत की ओर से संधि को अबeyance में रखने के फैसले को पाकिस्तान लंबे समय से गंभीर चिंता के रूप में पेश करता रहा है।

दूसरी ओर भारत का कहना है कि पाकिस्तान की ओर से सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियों के बीच जल समझौते को पहले की परिस्थितियों की तरह जारी रखना संभव नहीं है।

अब क्या होगा?

फिलहाल दोनों देशों की स्थिति में कोई नरमी दिखाई नहीं दे रही है।

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिंधु जल संधि को लागू करने की मांग उठा रहा है। दूसरी तरफ भारत हेग की मध्यस्थता प्रक्रिया और उसके फैसलों को स्वीकार नहीं कर रहा है।

इस विवाद का असर सिर्फ भारत-पाकिस्तान संबंधों पर नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। SCO जैसे मंच पर जब दोनों देशों के नेता एक साथ मौजूद होते हैं, तो ऐसे मुद्दे स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचते हैं।

पाकिस्तान ने 2026-27 के लिए SCO की अध्यक्षता भी संभाल ली है और अगले साल SCO से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की मेजबानी करेगा। पाकिस्तान के सरकारी रेडियो के मुताबिक, इस दौरान इस्लामाबाद में 2027 में SCO Plus बैठक आयोजित करने की योजना भी है।

भारत-पाकिस्तान के बीच पानी बना नया कूटनीतिक मोर्चा

भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद दशकों से कश्मीर, सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा है। अब सिंधु जल संधि भी दोनों देशों के बीच कूटनीतिक टकराव का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।

शहबाज शरीफ ने SCO में पानी को “जीवन रेखा” बताते हुए इसे राजनीतिक दबाव का साधन नहीं बनाने की अपील की है। वहीं भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को नजरअंदाज करके जल संधि को पहले की तरह नहीं चलाया जा सकता।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर संधि के पालन की मांग कर रहा है, जबकि भारत संबंधित मध्यस्थता अदालत के अधिकार क्षेत्र को ही स्वीकार नहीं करता।

यानी फिलहाल पानी पर शुरू हुआ यह विवाद केवल नदी और बांधों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारत-पाकिस्तान के बीच आतंकवाद, सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता से जुड़े बड़े सवाल भी खड़े हो चुके हैं।

अब देखना यह होगा कि SCO की अध्यक्षता संभालने के बाद पाकिस्तान इस मुद्दे को कितने बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच तक ले जाता है और भारत अपने मौजूदा रुख पर कितना दृढ़ रहता है।

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