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डायबिटीज समझकर कर रहे थे नजरअंदाज… लेकिन शरीर के अंदर चुपचाप बढ़ रहा था लीवर का खतरा! शुरुआती लक्षण भी नहीं दिखते



नई दिल्ली: टाइप-2 डायबिटीज को आमतौर पर ब्लड शुगर बढ़ने से जुड़ी बीमारी माना जाता है, लेकिन इसका असर शरीर के कई दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है। आंखों, किडनी और नसों के साथ अब लीवर की सेहत को लेकर भी विशेषज्ञ लगातार सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। खासतौर पर टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे से जूझ रहे लोगों में लीवर में फैट जमा होने और फाइब्रोसिस का खतरा बढ़ सकता है।

डायबिटीज और लीवर के बीच संबंध को लेकर चिकित्सा जगत में जागरूकता तेजी से बढ़ी है। लंबे समय तक ब्लड शुगर और इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ी मेटाबॉलिक गड़बड़ियां लीवर की सेहत को प्रभावित कर सकती हैं। यही वजह है कि डायबिटीज मरीजों को सिर्फ शुगर की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि डॉक्टर की सलाह के अनुसार लीवर की स्थिति पर भी नजर रखनी चाहिए।

डायबिटीज और लीवर का क्या है संबंध?

टाइप-2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता। लंबे समय तक इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबॉलिक असंतुलन की स्थिति बनी रहने पर लीवर में अतिरिक्त फैट जमा हो सकता है।

इसे मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टिएटोटिक लिवर डिजीज यानी MASLD कहा जाता है। कुछ मरीजों में यह बीमारी आगे बढ़कर लीवर में सूजन और कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली स्थिति तक पहुंच सकती है। इसके बाद लीवर में स्कार टिश्यू बनने लगता है, जिसे फाइब्रोसिस कहा जाता है।

अगर फाइब्रोसिस लंबे समय तक बढ़ता रहे तो गंभीर मामलों में यह सिरोसिस का रूप ले सकता है। सिरोसिस लीवर की गंभीर बीमारी है, जिसमें लीवर की सामान्य संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

मोटापे के साथ डायबिटीज हो तो ज्यादा सावधानी जरूरी

टाइप-2 डायबिटीज के साथ मोटापा होने पर लीवर से जुड़ी समस्या का खतरा अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। शरीर में अतिरिक्त चर्बी, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं मिलकर मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।

ऐसे मरीजों को अपनी शुगर के साथ-साथ वजन, ब्लड प्रेशर और लिपिड प्रोफाइल पर भी ध्यान देना चाहिए।

हालांकि केवल वजन देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को लीवर की बीमारी है या नहीं। कुछ सामान्य वजन वाले लोगों में भी लीवर से जुड़ी समस्या हो सकती है। इसलिए जोखिम का आकलन डॉक्टर की सलाह और जरूरी जांच के आधार पर किया जाना चाहिए।

सबसे बड़ी परेशानी, शुरुआत में नहीं दिखते लक्षण

लीवर से जुड़ी बीमारी का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शुरुआती चरण में कई मरीजों को कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होता।

कई बार व्यक्ति सामान्य थकान या कमजोरी को रोजमर्रा की समस्या समझकर नजरअंदाज कर देता है। जब तक बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंचती है, तब तक लीवर को काफी नुकसान हो चुका हो सकता है।

यही कारण है कि जोखिम वाले डायबिटीज मरीजों में केवल लक्षण आने का इंतजार करना सही रणनीति नहीं मानी जाती। डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय-समय पर जांच कराना बीमारी को शुरुआती चरण में पहचानने में मदद कर सकता है।

केवल लीवर एंजाइम सामान्य होने से निश्चिंत न हों

कई लोग SGOT, SGPT या अन्य लीवर एंजाइम की रिपोर्ट सामान्य आने पर मान लेते हैं कि उनका लीवर पूरी तरह स्वस्थ है। लेकिन कुछ मामलों में फाइब्रोसिस मौजूद होने के बावजूद शुरुआती चरण में लीवर एंजाइम सामान्य रह सकते हैं।

इसलिए जरूरत पड़ने पर डॉक्टर केवल सामान्य लीवर टेस्ट के बजाय दूसरे जोखिम आकलन वाले तरीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

यही वजह है कि डायबिटीज मरीजों में लीवर की जांच को लेकर अब अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।

FIB-4 टेस्ट क्या है?

लीवर फाइब्रोसिस के जोखिम का शुरुआती आकलन करने के लिए डॉक्टर FIB-4 स्कोर का इस्तेमाल कर सकते हैं।

इसमें उम्र, कुछ लीवर एंजाइम और प्लेटलेट काउंट जैसे सामान्य रक्त जांच के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य यह पता लगाने में मदद करना होता है कि मरीज को आगे लीवर की अधिक विस्तृत जांच की आवश्यकता है या नहीं।

अगर किसी मरीज का जोखिम अधिक पाया जाता है, तो डॉक्टर आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं।

ध्यान रखें कि FIB-4 अपने आप में सिरोसिस का अंतिम निदान नहीं है। यह केवल जोखिम का आकलन करने का एक तरीका है।

फाइब्रोस्कैन क्यों किया जाता है?

फाइब्रोस्कैन एक गैर-आक्रामक जांच है, जिसकी मदद से लीवर की कठोरता का आकलन किया जा सकता है। लीवर में फाइब्रोसिस बढ़ने पर उसकी कठोरता भी बढ़ सकती है।

डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, ब्लड टेस्ट और अन्य जोखिम कारकों को देखते हुए फाइब्रोस्कैन की सलाह दे सकते हैं।

हर डायबिटीज मरीज को फाइब्रोस्कैन की आवश्यकता हो, ऐसा जरूरी नहीं है। किस मरीज को कौन-सी जांच करानी है, यह डॉक्टर उसकी व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर तय करते हैं।

लंबे समय से डायबिटीज वाले मरीज रहें सतर्क

जिन लोगों को कई वर्षों से टाइप-2 डायबिटीज है, उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच को गंभीरता से लेना चाहिए। हालांकि लीवर की बीमारी का जोखिम केवल डायबिटीज की अवधि से निर्धारित नहीं होता।

मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, लीवर में फैट और अन्य मेटाबॉलिक समस्याएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इसलिए यह मानना सही नहीं है कि सिर्फ 10 साल से अधिक पुराने डायबिटीज मरीजों को ही लीवर की जांच की जरूरत होती है। हर मरीज का जोखिम अलग हो सकता है।

फाइब्रोसिस बढ़ने पर सिरोसिस का खतरा

लीवर में बार-बार होने वाली चोट और सूजन के कारण स्कार टिश्यू जमा हो सकता है। समय के साथ यही फाइब्रोसिस बढ़कर एडवांस्ड फाइब्रोसिस और फिर सिरोसिस तक पहुंच सकता है।

सिरोसिस की स्थिति में लीवर की सामान्य कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। गंभीर अवस्था में मरीज को कई जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

इसीलिए बीमारी को शुरुआती स्तर पर पहचानना बेहद महत्वपूर्ण है।

क्या जीवनशैली में बदलाव मदद कर सकता है?

डायबिटीज और लीवर दोनों की सेहत के लिए स्वस्थ जीवनशैली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

डॉक्टर की सलाह के अनुसार वजन को नियंत्रित रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना, संतुलित भोजन लेना और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना फायदेमंद हो सकता है।

अत्यधिक मीठे और बहुत अधिक कैलोरी वाले भोजन का सेवन कम करना, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि करना और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं को नियमित रूप से लेना भी महत्वपूर्ण है।

हालांकि किसी भी दवा को अपने स्तर पर शुरू या बंद नहीं करना चाहिए।

किन लोगों को ज्यादा ध्यान देना चाहिए?

टाइप-2 डायबिटीज के साथ अगर किसी व्यक्ति में निम्न समस्याएं हैं, तो डॉक्टर से लीवर के स्वास्थ्य को लेकर चर्चा करना उपयोगी हो सकता है:

  • मोटापा या अधिक वजन

  • हाई ब्लड प्रेशर

  • बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड

  • लीवर में फैट की समस्या

  • लंबे समय से डायबिटीज

  • लीवर टेस्ट में लगातार असामान्यता

  • अन्य मेटाबॉलिक समस्याएं

इनमें से कोई एक समस्या होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को फाइब्रोसिस या सिरोसिस है। इसके लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है।

समय पर जांच से बच सकती है बड़ी परेशानी

लीवर की बीमारी कई बार चुपचाप आगे बढ़ती रहती है। यही कारण है कि जोखिम वाले मरीजों के लिए समय पर जांच बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।

डायबिटीज मरीजों को जिस तरह आंखों, किडनी और नसों की नियमित जांच की सलाह दी जाती है, उसी तरह अपनी पूरी स्वास्थ्य स्थिति की समीक्षा कराते समय लीवर के जोखिम के बारे में भी डॉक्टर से बात करनी चाहिए।

सबसे जरूरी बात यह है कि टाइप-2 डायबिटीज को केवल ब्लड शुगर की बीमारी समझकर नजरअंदाज न करें। लंबे समय तक मेटाबॉलिक असंतुलन का असर लीवर पर भी पड़ सकता है। समय पर जांच, स्वस्थ जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार अपनाकर गंभीर जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किसी भी जांच, दवा या उपचार का निर्णय डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लें।

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