Breaking News

H1N1 से ठीक होने के बाद अचानक लौटे ये लक्षण! कहीं फेफड़ों में तो नहीं पनप रहा खतरनाक संक्रमण? 7 संकेत कर देंगे सावधान



नई दिल्ली: देश में मौसमी इन्फ्लुएंजा A (H1N1) के मामलों के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों को सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। आमतौर पर फ्लू से कई लोग कुछ दिनों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में संक्रमण के बाद फेफड़ों से जुड़ी गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। इनमें सेकेंडरी बैक्टीरियल निमोनिया भी शामिल है।

इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरीज की हालत पहले बेहतर होने लगे और उसके बाद अचानक दोबारा बिगड़ने लगे। बुखार वापस आना, खांसी बढ़ना, सांस लेने में परेशानी या सीने में दर्द जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

हालांकि, हर H1N1 मरीज को निमोनिया नहीं होता। जोखिम व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर कर सकता है।

H1N1 के बाद क्यों हो सकता है बैक्टीरियल निमोनिया?

इन्फ्लुएंजा वायरस श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। संक्रमण के दौरान शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है और कुछ परिस्थितियों में बैक्टीरिया को फेफड़ों तक पहुंचने का मौका मिल सकता है।

फ्लू के बाद होने वाला बैक्टीरियल निमोनिया गंभीर स्थिति बन सकता है। खासतौर पर तब, जब मरीज को पहले कुछ राहत महसूस होने लगे और फिर अचानक लक्षण दोबारा बढ़ जाएं।

इसलिए फ्लू से ठीक होते समय शरीर में होने वाले बदलावों पर नजर रखना जरूरी है।

पहला संकेत- ठीक होने के बाद फिर लौट आया बुखार

सेकेंडरी संक्रमण का एक महत्वपूर्ण संकेत बुखार का दोबारा लौटना हो सकता है।

अगर किसी व्यक्ति को कई दिनों तक बुखार रहने के बाद राहत मिलने लगे और फिर अचानक तेज बुखार वापस आ जाए, तो इसे सामान्य रिकवरी का हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेकर जांच कराना जरूरी हो सकता है।

दूसरा संकेत- खांसी अचानक बढ़ जाए

फ्लू के दौरान खांसी होना आम बात है। लेकिन अगर खांसी पहले कम होने लगे और फिर अचानक ज्यादा बढ़ जाए तो सावधान होने की जरूरत है।

खासकर खांसी के साथ बलगम की मात्रा बढ़ने लगे या सांस लेने में परेशानी होने लगे तो चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।

हालांकि केवल बलगम के रंग या खांसी के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि संक्रमण बैक्टीरियल है। इसके लिए डॉक्टर की जांच जरूरी होती है।

तीसरा संकेत- सांस लेने में परेशानी

सांस फूलना या सांस लेने में कठिनाई गंभीर चेतावनी संकेत हो सकता है।

अगर सामान्य गतिविधि करने पर भी सांस बहुत ज्यादा फूलने लगे, सीने में दबाव महसूस हो या सांस लेने में लगातार परेशानी बनी रहे तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

फ्लू के बाद सांस से जुड़ी समस्या को हल्के में लेना नुकसानदायक हो सकता है।

चौथा संकेत- सीने में दर्द

लगातार खांसी के कारण शरीर में दर्द हो सकता है, लेकिन सीने में तेज या लगातार दर्द होने पर सावधानी जरूरी है।

अगर सांस लेने या खांसने के दौरान सीने में दर्द बढ़ता है और साथ में बुखार या सांस की समस्या भी मौजूद है, तो डॉक्टर से जल्द संपर्क करना चाहिए।

पांचवां संकेत- अचानक बहुत ज्यादा कमजोरी

फ्लू में थकान और कमजोरी होना सामान्य हो सकता है। लेकिन अगर शुरुआती सुधार के बाद व्यक्ति फिर से अत्यधिक कमजोरी महसूस करने लगे या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

विशेष रूप से बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों में कमजोरी गंभीर संक्रमण का संकेत हो सकती है।

छठा संकेत- ऑक्सीजन कम होना

अगर मरीज की ऑक्सीजन का स्तर कम हो रहा है या सांस लेने में गंभीर परेशानी हो रही है, तो तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो सकती है।

होंठ या चेहरे का नीला पड़ना, बहुत तेज सांस चलना या मरीज का असामान्य रूप से सुस्त पड़ जाना आपात स्थिति के संकेत हो सकते हैं।

ऐसी स्थिति में घर पर इंतजार करना उचित नहीं है।

सातवां संकेत- सुधार के बाद अचानक हालत बिगड़ना

यह सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक है।

अगर मरीज को लगने लगे कि फ्लू ठीक हो रहा है, लेकिन कुछ दिनों बाद अचानक बुखार, खांसी, कमजोरी या सांस की परेशानी फिर से बढ़ जाए, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

इसे केवल मौसम बदलने या सामान्य कमजोरी का असर समझकर टालना सही नहीं होगा।

किन लोगों को ज्यादा सावधान रहना चाहिए?

फ्लू की गंभीर जटिलताएं किसी भी व्यक्ति को हो सकती हैं, लेकिन कुछ लोगों में जोखिम ज्यादा हो सकता है।

65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और अस्थमा, डायबिटीज, हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों वाले लोगों को फ्लू के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

इन लोगों में फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।

खुद से एंटीबायोटिक लेना पड़ सकता है भारी

H1N1 एक वायरल संक्रमण है। इसलिए फ्लू के हर मामले में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती।

सबसे बड़ी गलती यह होती है कि लोग बुखार या खांसी होने पर खुद से एंटीबायोटिक लेना शुरू कर देते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए।

अगर डॉक्टर को बैक्टीरियल संक्रमण का संदेह होता है, तभी आवश्यक जांच और स्थिति के आधार पर एंटीबायोटिक दी जाती है। बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेने से दवा के खिलाफ बैक्टीरिया में प्रतिरोध बढ़ने की समस्या पैदा हो सकती है।

H1N1 से बचने के लिए क्या करें?

फ्लू से बचाव के लिए रोजमर्रा की कुछ सावधानियां काफी महत्वपूर्ण हैं।

हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोएं। खांसते और छींकते समय मुंह और नाक को ढकें। बीमार होने पर भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें और दूसरों के संपर्क को कम रखें।

जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल भी संक्रमण फैलने के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

अगर घर में किसी व्यक्ति को फ्लू जैसे लक्षण हैं तो उसके इस्तेमाल की वस्तुओं को साझा करने से बचना और कमरे में पर्याप्त हवा का आवागमन रखना भी उपयोगी हो सकता है।

कब तुरंत अस्पताल जाना चाहिए?

अगर मरीज को सांस लेने में बहुत ज्यादा परेशानी हो, सीने में लगातार दर्द हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे, अत्यधिक कमजोरी हो, भ्रम की स्थिति पैदा हो या हालत तेजी से बिगड़ रही हो, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

बच्चों में तेज सांस, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक सुस्ती या पानी की कमी जैसे संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

घबराने की नहीं, सतर्क रहने की जरूरत

H1N1 या किसी भी मौसमी फ्लू का नाम सुनकर घबराने की जरूरत नहीं है। अधिकांश मरीज उचित देखभाल के साथ ठीक हो जाते हैं। लेकिन फ्लू के बाद शरीर में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है।

खासकर पहले सुधार और फिर अचानक बिगड़ने का पैटर्न डॉक्टर के ध्यान में जरूर लाना चाहिए।

अगर H1N1 के बाद बुखार दोबारा लौट आए, खांसी तेजी से बढ़े, सीने में दर्द हो या सांस लेने में परेशानी शुरू हो जाए तो इसे सामान्य कमजोरी समझकर घर पर न बैठें। समय पर चिकित्सकीय जांच और उचित उपचार गंभीर जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

कोई टिप्पणी नहीं