Breaking News

होर्मुज में अचानक बदल गया खेल! ईरान ने चली ऐसी चाल कि अमेरिकी नौसेना पर मंडराया बड़ा खतरा, दुनिया की नजरें समुद्र पर



नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा सैन्य तनाव एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींच रहा है। सबसे बड़ा टकराव होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, जो दुनिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। हाल के दिनों में यहां जहाजों पर हमलों, सैन्य धमकियों और समुद्री आवाजाही में भारी गिरावट ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में अमेरिकी नौसेना के पूरी तरह तबाह होने जैसे दावे किए जा रहे हैं, लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में ऐसी किसी घटना की पुष्टि नहीं हुई है।

इसके बजाय मौजूदा तस्वीर यह है कि ईरान और अमेरिका दोनों होर्मुज पर अपना प्रभाव साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। ईरान के अधिकारियों का दावा है कि जलडमरूमध्य उसके नियंत्रण में है, जबकि अमेरिका ने समुद्री आवाजाही को सुरक्षित रखने और ईरानी बंदरगाहों पर दबाव बनाए रखने के लिए सैन्य और आर्थिक कदम तेज किए हैं।

होर्मुज बना सबसे बड़ा युद्धक्षेत्र

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के तेल और LNG व्यापार के लिए यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है। संघर्ष के कारण यहां से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

रॉयटर्स के मुताबिक, अगस्त के मध्य में एक सप्ताहांत के दौरान होर्मुज से सिर्फ कुछ ही कमोडिटी जहाज गुजर पाए, जबकि युद्ध से पहले इस मार्ग से रोजाना 130 से अधिक जहाजों की आवाजाही होती थी। इस गिरावट का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री परिवहन पर पड़ रहा है।

यही वजह है कि होर्मुज में होने वाली हर सैन्य गतिविधि को केवल ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इसका असर एशिया, यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में तेल की कीमतों और ईंधन आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

ईरान का दावा- होर्मुज हमारे नियंत्रण में

ईरान की ओर से हाल में लगातार यह दावा किया गया है कि होर्मुज पर उसका नियंत्रण है। ईरान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने अमेरिका के दावे को चुनौती देते हुए कहा कि जलडमरूमध्य ईरानी नियंत्रण में है।

दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी होर्मुज को लेकर सख्त रुख अपनाया है। दोनों पक्षों के विरोधी दावों ने समुद्री क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है।

इस टकराव का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यदि दोनों पक्षों में से किसी ने समुद्री मार्ग पर सैन्य कार्रवाई और बढ़ाई, तो सामान्य व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और भी मुश्किल हो सकती है।

जहाजों पर हमलों ने बढ़ाई चिंता

हाल के दिनों में संयुक्त अरब अमीरात से जुड़े जहाज भी इस संकट की चपेट में आए हैं। UAE ने आरोप लगाया है कि उसके सरकारी ऊर्जा समूह ADNOC से जुड़े जहाजों पर होर्मुज में हमले हुए।

14 अगस्त को दो UAE तेल टैंकरों पर ड्रोन हमले की रिपोर्ट सामने आई। इन घटनाओं में किसी की मौत की सूचना नहीं थी, लेकिन इस घटना ने समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी। UAE ने ईरान पर आरोप लगाया, जबकि क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ता गया।

इससे पहले भी होर्मुज में अलग-अलग जहाजों पर हमले और संदिग्ध प्रोजेक्टाइल से नुकसान की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

अमेरिका ने भी बढ़ाया सैन्य दबाव

ईरान की सैन्य गतिविधियों के जवाब में अमेरिका ने भी दबाव बढ़ाया है। अमेरिकी अधिकारियों ने होर्मुज से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित कराने की कोशिश की है और ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखा है।

अमेरिकी सेना ने इससे पहले ईरानी सैन्य ठिकानों और समुद्री क्षमता से जुड़े कई लक्ष्यों पर हमले किए थे। जुलाई में अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दावा किया था कि ईरानी मिसाइल, ड्रोन, नौसैनिक क्षमता, गोला-बारूद और निगरानी से जुड़े कई ठिकानों को निशाना बनाया गया।

ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की और क्षेत्र में अमेरिकी तथा उसके सहयोगी देशों के ठिकानों को लेकर सैन्य धमकियां जारी रखीं।

IRGC की भूमिका सबसे अहम

इस संघर्ष में ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। होर्मुज के आसपास समुद्री गतिविधियों और ईरानी सैन्य रणनीति में IRGC की प्रमुख भूमिका रही है।

जुलाई में अमेरिका ने आरोप लगाया था कि IRGC ने होर्मुज से गुजर रहे एक वाणिज्यिक जहाज पर हमला किया था। अमेरिकी सेना के अनुसार जहाज को काफी नुकसान हुआ और एक नागरिक चालक दल का सदस्य लापता हो गया था। ईरान की ओर से हालांकि घटना की अलग व्याख्या की गई और कहा गया कि जहाज को चेतावनी दी गई थी।

इस तरह दोनों पक्ष एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से पेश कर रहे हैं, जिससे वास्तविक स्थिति को लेकर भ्रम और बढ़ रहा है।

क्या अमेरिकी नौसेना पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि होर्मुज पारंपरिक समुद्री युद्ध के बजाय असममित युद्ध का क्षेत्र बन सकता है। ईरान के पास छोटी तेज नौकाएं, ड्रोन, मिसाइल और तटीय निगरानी प्रणालियां हैं। ऐसी क्षमताओं का इस्तेमाल बड़े युद्धपोतों और व्यापारिक जहाजों को परेशान करने के लिए किया जा सकता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी नौसेना के "टुकड़े-टुकड़े" होने जैसी स्थिति सामने आ गई है। ऐसी भाषा फिलहाल अधिकतर सनसनीखेज दावों में दिखाई देती है। उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में अमेरिकी नौसेना के व्यापक विनाश की पुष्टि नहीं है।

असल चुनौती अमेरिका के लिए यह है कि होर्मुज जैसे संकरे समुद्री मार्ग में लंबे समय तक सैन्य दबाव बनाए रखना महंगा और जोखिमपूर्ण हो सकता है।

ईरान भी भारी कीमत चुका रहा है

दूसरी ओर, होर्मुज में तनाव ईरान के लिए भी बिना कीमत का खेल नहीं है। यदि तेल और गैस की समुद्री आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहती है तो ईरान की अपनी अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।

अमेरिकी प्रतिबंध और समुद्री नाकेबंदी पहले से ईरान पर दबाव बढ़ा रहे हैं। ईरान ने भी अमेरिका से नाकेबंदी हटाने और सैन्य दबाव कम करने की मांग की है।

60 दिनों के लिए बनाई गई शांति वार्ता की व्यवस्था अगस्त में बिना व्यापक समझौते के समाप्त हो गई। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच फिर तनाव बढ़ गया।

युद्धविराम के बाद फिर बढ़ा तनाव

ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष को रोकने के लिए पहले एक अस्थायी समझौते की कोशिश की गई थी। लेकिन व्यापक और स्थायी समाधान नहीं निकल सका।

17 अगस्त की रिपोर्टों में ईरानी अधिकारियों की ओर से संकेत दिया गया कि बातचीत विफल होने की स्थिति में ईरान अधिक आक्रामक सैन्य रुख अपना सकता है। उसी समय अमेरिका ने भी अस्थायी युद्धविराम को आगे बढ़ाने की संभावना से इनकार किया।

यानी कूटनीतिक रास्ता अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन दोनों देशों के बीच भरोसे का संकट गहरा चुका है।

अमेरिका ने तेल जहाजों के लिए शुरू किया गुप्त अभियान

19 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज से तेल की आवाजाही को जारी रखने के लिए एक गुप्त सैन्य अभियान शुरू किया है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्य खाली टैंकरों को खाड़ी में प्रवेश कराने और तेल लदे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने में मदद करना है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अभियान के बाद हर रात करीब 15 से 20 टैंकर दक्षिणी चैनल से निकल रहे हैं। हालांकि यह आवाजाही युद्ध से पहले के स्तर से अभी भी काफी कम है।

यदि यह अभियान सफल रहता है तो अमेरिका यह दिखाने की कोशिश कर सकता है कि ईरान के दबाव के बावजूद होर्मुज से ऊर्जा आपूर्ति पूरी तरह बंद नहीं की जा सकती।

तेल बाजार पर पड़ सकता है बड़ा असर

होर्मुज में संकट का सबसे बड़ा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है। यह जलमार्ग लंबे समय तक बाधित हुआ तो एशियाई देशों के लिए ऊर्जा आयात महंगा हो सकता है।

भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए फारस की खाड़ी महत्वपूर्ण है। समुद्री बीमा, माल ढुलाई और ईंधन लागत बढ़ने पर इसका असर आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है।

रॉयटर्स ने बताया है कि होर्मुज से जहाजों की आवाजाही में तेज गिरावट पहले ही दर्ज की जा चुकी है। इससे तेल और LNG की वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है।

क्या बड़ा युद्ध होने वाला है?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष फिर व्यापक युद्ध में बदल सकता है।

हालात निश्चित रूप से गंभीर हैं। ईरान अधिक आक्रामक सैन्य रुख की चेतावनी दे रहा है, अमेरिका आर्थिक और सैन्य दबाव बनाए हुए है और होर्मुज में व्यापारिक जहाजों पर हमलों ने जोखिम बढ़ा दिया है। साथ ही, क्षेत्र के दूसरे देश भी इस संघर्ष की चपेट में आ रहे हैं।

लेकिन दूसरी तरफ कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। पाकिस्तान समेत कुछ देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं और होर्मुज की स्थिति को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर भी बातचीत जारी है।

इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिकी नौसेना का विनाश होने वाला है या ईरान होर्मुज पर निर्णायक सैन्य जीत हासिल कर चुका है। वास्तविक स्थिति एक बेहद तनावपूर्ण रणनीतिक गतिरोध की है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, तेल आपूर्ति और कूटनीति—तीनों एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं।

आने वाले दिनों में होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की संख्या, ईरान की सैन्य गतिविधियां और अमेरिका की समुद्री रणनीति इस संकट की दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण संकेत होंगे।

कोई टिप्पणी नहीं