पाकिस्तान बनने से पहले जिन्ना ने मान ली थी भारत न टूटने की शर्त! फिर 10 जुलाई 1946 को ऐसा क्या हुआ कि समझौता टूटा और बंटवारे की उलटी गिनती शुरू हो गई?
नई दिल्ली। भारत के इतिहास में 1946-47 का दौर शायद उन सबसे निर्णायक वर्षों में से एक था, जब देश का भविष्य कई अलग-अलग रास्तों के बीच झूल रहा था। आज जब हम 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी और उसके साथ हुए विभाजन को इतिहास की एक तय घटना के रूप में देखते हैं, तब यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत का बंटवारा टाला जा सकता था?
इतिहास का कोई एक आसान जवाब नहीं है। लेकिन 1946 में आया कैबिनेट मिशन प्लान ऐसा संवैधानिक प्रस्ताव जरूर था, जिसने एक ओर भारत की एकता बनाए रखने की कोशिश की और दूसरी ओर मुस्लिम लीग की राजनीतिक आशंकाओं को व्यापक प्रांतीय स्वायत्तता के जरिए संबोधित करने का प्रयास किया। ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, मिशन ने भारत को दो अलग संप्रभु राज्यों में बांटने के बजाय एक संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव रखा था।
यही वह मोड़ था जहां से घटनाएं इतनी तेजी से बदलीं कि कुछ ही महीनों में साझा भारत का विचार विभाजन की वास्तविकता में बदल गया।
1946 में भारत के सामने क्या विकल्प था?
द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था। ब्रिटेन आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका था और भारत में सत्ता हस्तांतरण का सवाल अब टाला नहीं जा सकता था। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि भारतीय राजनीतिक दल किसी ऐसे संवैधानिक समाधान पर पहुंचें जिसके जरिए सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित की जा सके।
इसी उद्देश्य से मार्च 1946 में ब्रिटेन से तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन भारत आया। मिशन में लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और एवी एलेक्जेंडर शामिल थे।
कई दौर की बातचीत के बाद 16 मई 1946 को मिशन ने अपना प्रस्ताव रखा। इस योजना में पाकिस्तान को अलग संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं किया गया। इसके बजाय भारत के लिए एक ऐसा संघीय ढांचा प्रस्तावित किया गया जिसमें केंद्र के पास मुख्य रूप से रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे विषय होते, जबकि अन्य व्यापक अधिकार प्रांतों के पास रहते। प्रांतों को तीन समूहों में संगठित करने की व्यवस्था भी प्रस्तावित थी।
यही व्यवस्था मुस्लिम लीग के लिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे मुस्लिम-बहुल प्रांतों को सामूहिक रूप से काफी राजनीतिक स्वायत्तता मिलने की संभावना थी। वहीं कांग्रेस के लिए इसका सबसे बड़ा आकर्षण यह था कि भारत औपचारिक रूप से एक संघ के रूप में कायम रह सकता था।
जिन्ना ने योजना स्वीकार क्यों की?
मुस्लिम लीग ने जून 1946 में कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार किया। लेकिन यह स्वीकार्यता दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्याओं पर टिकी हुई थी।
जिन्ना के लिए प्रांतों की ग्रुपिंग बेहद महत्वपूर्ण थी। मुस्लिम बहुल प्रांत यदि अपने-अपने समूह में संगठित होते, तो केंद्र अपेक्षाकृत कमजोर रहता और मुस्लिम लीग को अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में व्यापक राजनीतिक शक्ति मिल सकती थी।
कांग्रेस की व्याख्या अलग थी। कांग्रेस संविधान सभा को सर्वोच्च मानती थी और मानती थी कि अंतिम संविधान भारतीय प्रतिनिधि स्वयं तय करेंगे।
यानी दोनों पक्ष एक ही योजना के साथ आगे बढ़ने को तैयार तो थे, लेकिन उनके मन में उस योजना का अंतिम स्वरूप अलग था।
यही अंतर आगे चलकर सबसे बड़ा संकट बना।
10 जुलाई 1946: नेहरू का बयान और बढ़ा अविश्वास
10 जुलाई 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस के रुख को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस संविधान सभा में जाकर अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र होगी और वह किसी बाहरी शक्ति से अपने हाथ बंधे नहीं मानती। प्रांतों की ग्रुपिंग को लेकर भी नेहरू ने ऐसी व्याख्या रखी जिससे मुस्लिम लीग को लगा कि कांग्रेस भविष्य में इस व्यवस्था को बदल सकती है। नेहरू के उस समय के बयान का मूल पाठ उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है।
मुस्लिम लीग ने इसे गंभीर संकेत के रूप में लिया।
जिन्ना को आशंका हुई कि यदि संविधान सभा में कांग्रेस का प्रभाव अधिक रहा तो कैबिनेट मिशन योजना में मुस्लिम लीग को मिली राजनीतिक सुरक्षा कमजोर हो सकती है। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच विश्वास और तेजी से घटने लगा।
29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना से अपना समर्थन वापस लेने का फैसला किया और इसके बाद राजनीतिक संघर्ष संवैधानिक बातचीत से निकलकर सड़कों तक पहुंच गया।
डायरेक्ट एक्शन डे: राजनीति से हिंसा तक
मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वान किया। इसका उद्देश्य पाकिस्तान की मांग के समर्थन में राजनीतिक दबाव बढ़ाना था, लेकिन कलकत्ता में यह आंदोलन भीषण सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया।
कई दिनों तक शहर में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच हिंसा हुई। मृतकों की संख्या को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक अनुमान मिलते हैं, लेकिन यह घटना इतनी भयावह थी कि इसे बाद में Great Calcutta Killings के नाम से जाना गया।
कलकत्ता की हिंसा केवल एक शहर तक सीमित नहीं रही। इसके बाद नोआखली, बिहार और अन्य क्षेत्रों में भी सांप्रदायिक तनाव और हिंसा का सिलसिला बढ़ा।
देश की राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ा। जो नेता कुछ महीने पहले संवैधानिक समझौते के जरिए सत्ता हस्तांतरण का रास्ता खोज रहे थे, उनके सामने अब कानून-व्यवस्था और सामुदायिक सुरक्षा का सवाल खड़ा हो चुका था।
अंतरिम सरकार बनी, लेकिन भरोसा नहीं बना
सितंबर 1946 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। बाद में मुस्लिम लीग भी इसमें शामिल हुई।
लेकिन यह साझेदारी शुरुआत से ही तनावपूर्ण रही। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं के बीच आर्थिक नीति, प्रशासन और सत्ता के इस्तेमाल को लेकर मतभेद बने रहे।
लियाकत अली खान के वित्त मंत्री बनने के बाद भी कांग्रेस और लीग के बीच राजनीतिक टकराव खत्म नहीं हुआ। अंतरिम सरकार के भीतर सहयोग के बजाय अविश्वास बढ़ता गया।
इस समय तक देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा फैल चुकी थी और राजनीतिक नेतृत्व को लगने लगा था कि एक संयुक्त केंद्रीय सरकार बनाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
20 फरवरी 1947: ब्रिटेन ने समय सीमा तय कर दी
20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि भारत में सत्ता का हस्तांतरण जून 1948 तक कर दिया जाएगा। ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली की सरकार ने साफ कर दिया कि भारतीय राजनीतिक दलों के बीच पूर्ण समझौता न होने की स्थिति में भी ब्रिटेन अनिश्चितकाल तक भारत में शासन जारी नहीं रखेगा। इसी घोषणा के साथ लॉर्ड माउंटबेटन को नया वायसराय नियुक्त किया गया।
यह घोषणा बेहद महत्वपूर्ण थी।
अब भारतीय नेताओं के पास समय सीमित था। माउंटबेटन के आने के बाद परिस्थितियों को देखते हुए सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया और तेज कर दी गई।
जून 1948 की जगह अगस्त 1947
माउंटबेटन मार्च 1947 में भारत पहुंचे। उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य नेताओं से बातचीत की। लेकिन पंजाब और बंगाल में बढ़ती हिंसा, अंतरिम सरकार के भीतर संघर्ष और कांग्रेस-लीग के बीच अविश्वास ने एक संयुक्त भारत के लिए समझौते की संभावना को कमजोर कर दिया।
3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने विभाजन की योजना का औपचारिक रास्ता प्रस्तुत किया। ब्रिटिश संसद के रिकॉर्ड में भी दर्ज है कि पहले सत्ता हस्तांतरण की समय सीमा जून 1948 रखी गई थी, लेकिन बाद में उसी प्रक्रिया को 1947 में ही पूरा करने का निर्णय लिया गया।
इसके बाद पंजाब और बंगाल के विभाजन का रास्ता साफ हुआ।
पंजाब और बंगाल की सीमा ने बदल दी लाखों जिंदगियां
विभाजन की सबसे कठिन जिम्मेदारियों में से एक थी नई सीमा तय करना। इसके लिए ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग बनाए गए।
रैडक्लिफ इससे पहले भारत में काम नहीं कर चुके थे और उन्हें बेहद कम समय में पंजाब और बंगाल की सीमाएं निर्धारित करनी थीं।
17 अगस्त 1947 को भारत-पाकिस्तान सीमा से संबंधित रैडक्लिफ अवॉर्ड सार्वजनिक हुआ। ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स में सुरक्षित दस्तावेजों में 17 अगस्त 1947 को निर्धारित भारत-पाकिस्तान सीमा का रिकॉर्ड मौजूद है।
सीमा खिंचते ही लाखों लोगों की जिंदगी बदल गई। जिन लोगों के घर, खेत, दुकान और धार्मिक स्थल पीढ़ियों से एक ही इलाके में थे, वे अचानक दूसरे देश की सीमा के भीतर आ गए।
15 अगस्त को भी कई लोगों को नहीं पता था कि वे किस देश में हैं
भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ। लेकिन पंजाब और बंगाल के कई इलाकों में रहने वाले लोगों को नई सीमा की अंतिम स्थिति की स्पष्ट जानकारी बाद में मिली।
17 अगस्त को सीमा संबंधी फैसला सार्वजनिक होने के बाद विस्थापन और हिंसा का ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसने उपमहाद्वीप की सामाजिक संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया।
लाखों हिंदू, सिख और मुसलमानों ने अपने घर छोड़े। लोग ट्रेनों, बैलगाड़ियों, पैदल काफिलों और अन्य साधनों से सीमा पार करने लगे। रास्ते में व्यापक हिंसा हुई और भारी जनहानि हुई।
यह केवल राजनीतिक नक्शे का बदलाव नहीं था। यह करोड़ों लोगों की निजी जिंदगी का सबसे बड़ा उलटफेर था।
गांधी और कलकत्ता की शांति
विभाजन के बीच महात्मा गांधी ने राजनीतिक सत्ता के उत्सव से अलग हिंसा रोकने पर ध्यान केंद्रित किया। वे कलकत्ता पहुंचे और वहां सांप्रदायिक शांति के लिए प्रयास किया।
उनकी उपस्थिति और बाद में किए गए अनशन ने हिंसा से जूझ रहे शहर में शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधी का प्रयास यह दिखाता है कि विभाजन के सबसे कठिन दौर में भी सांप्रदायिक संबंधों को बचाने की कोशिशें पूरी तरह खत्म नहीं हुई थीं।
तो आखिर भारत का बंटवारा कब हुआ?
भारत का विभाजन किसी एक तारीख या एक व्यक्ति के फैसले का परिणाम नहीं था।
1946 का कैबिनेट मिशन प्लान एक ऐसा रास्ता था जिसमें भारत को एक संघ के रूप में बनाए रखने की संभावना मौजूद थी। लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग की उस योजना को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं, सत्ता और प्रतिनिधित्व को लेकर अविश्वास, मुस्लिम लीग का समर्थन वापस लेना, डायरेक्ट एक्शन और उसके बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा ने परिस्थितियों को लगातार बदला।
फिर 1947 में ब्रिटेन की सत्ता हस्तांतरण की जल्दी, माउंटबेटन की योजना और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग का विभाजन स्वीकार करना निर्णायक साबित हुआ।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि भारत का विभाजन किसी एक दिन नहीं हुआ। वह कई वर्षों के राजनीतिक मतभेदों, सामुदायिक असुरक्षाओं, टूटते समझौतों, बढ़ती हिंसा और तेजी से लिए गए राजनीतिक फैसलों का अंतिम परिणाम था।
20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश सरकार ने स्वयं माना था कि कैबिनेट मिशन की योजना के आधार पर सभी दलों के बीच सहमति वाला संविधान बन पाने की स्पष्ट संभावना नहीं रह गई थी।
और यही शायद उस पूरे दौर की सबसे बड़ी त्रासदी थी—एक ऐसा समझौता, जो कभी संयुक्त भारत की संभावना को जीवित रखता दिखाई दिया था, कुछ ही महीनों में अविश्वास और राजनीतिक संघर्ष के बीच टूट गया।
नक्शे पर सीमा खींचने में कुछ सप्ताह लगे, लेकिन उस सीमा ने जो सामाजिक और मानवीय दरार पैदा की, उसका असर आज भी इतिहास, राजनीति और लाखों परिवारों की स्मृतियों में दिखाई देता है।

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