‘9 से 5 के बाद भी नहीं मिलती फुर्सत!’ भारतीय महिला ने बताया भारत छोड़कर UK जाने की असली वजह
नई दिल्ली। विदेश में नौकरी करने वाले भारतीयों के अनुभव अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन जाते हैं। कभी वेतन और सुविधाओं को लेकर तुलना होती है तो कभी काम के घंटे, ऑफिस कल्चर और निजी जिंदगी को लेकर बहस छिड़ जाती है। अब यूके में रहने वाली भारतीय महिला अनुष्का व्यास का एक वीडियो इसी वजह से सोशल मीडिया पर चर्चा में है।
वीडियो में अनुष्का ने भारत और यूके की 9 से 5 नौकरी के बीच अपने अनुभव के आधार पर अंतर समझाने की कोशिश की है। उन्होंने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की नौकरी के आधिकारिक घंटे खत्म होने के बाद उसके पास अपनी निजी जिंदगी के लिए कितना समय और ऊर्जा बचती है।
अनुष्का के मुताबिक, यूके में काम खत्म होने के बाद लोग अक्सर अपने व्यक्तिगत जीवन को समय दे पाते हैं। वहीं भारत में कई कामकाजी लोगों के लिए ऑफिस का समय खत्म होने के बावजूद उनका दिन वास्तव में खत्म नहीं होता। ऑफिस से घर पहुंचने में लगने वाला समय, ट्रैफिक और अतिरिक्त काम कई बार निजी समय को काफी कम कर देते हैं।
हालांकि, यह एक व्यक्तिगत अनुभव और सोशल मीडिया पर साझा किया गया नजरिया है। भारत और यूके में सभी कर्मचारियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। नौकरी का क्षेत्र, शहर, कंपनी, यात्रा की दूरी और कार्य संस्कृति के अनुसार अनुभव काफी अलग हो सकता है।
पार्क में बैठकर समझाया अंतर
वायरल वीडियो में अनुष्का को अपने घर के पास एक पार्क में शाम का समय बिताते हुए देखा जा सकता है। इसी दौरान वह बताती हैं कि यूके में काम खत्म होने के बाद उनके पास अपनी जिंदगी के लिए समय बचता है।
वह बताती हैं कि ऑफिस का दिन पूरा होने के बाद व्यक्ति परिवार के साथ बैठ सकता है, पार्क में टहल सकता है, एक्सरसाइज कर सकता है या फिर बिना किसी काम के आराम कर सकता है। उनके मुताबिक, यह छोटा-सा निजी समय मानसिक रूप से तरोताजा होने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
अनुष्का का कहना है कि उनके लिए इस अनुभव ने यह सवाल खड़ा किया कि आखिर 9 से 5 नौकरी का मतलब केवल ऑफिस में बिताए गए आठ घंटे हैं या उन आठ घंटों के बाद बचने वाली जिंदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
यही सवाल उनके वीडियो का मुख्य विषय है।
भारत में 9 से 5 के बाद भी क्यों लंबा हो जाता है दिन?
अनुष्का के मुताबिक भारत में कई लोगों के लिए 9 से 5 की नौकरी कागज पर तो 9 से 5 ही होती है, लेकिन वास्तविक दिन इससे काफी लंबा हो सकता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति का ऑफिस शाम 5 बजे खत्म हो गया। अगर उसे घर पहुंचने में एक या डेढ़ घंटा लगता है, तो उसकी निजी जिंदगी का समय पहले ही काफी कम हो जाता है। इसके ऊपर अगर ऑफिस में अतिरिक्त काम मिल जाए या किसी जरूरी काम की वजह से देर हो जाए तो स्थिति और कठिन हो सकती है।
इसके बाद घर पहुंचने पर भी घरेलू जिम्मेदारियां इंतजार कर रही होती हैं। ऐसे में कर्मचारी के पास आराम, परिवार, दोस्तों या अपनी पसंद की गतिविधियों के लिए बहुत कम समय बचता है।
अनुष्का ने अपने वीडियो में इसी अनुभव की ओर ध्यान दिलाया है।
ट्रैफिक बन जाता है सबसे बड़ा समय-खाने वाला हिस्सा
भारत के बड़े शहरों में रोजाना ऑफिस आने-जाने में लगने वाला समय लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और अन्य बड़े शहरों में रोजाना लंबी दूरी तय करने वाले कर्मचारियों के लिए आवागमन कामकाजी दिन का बड़ा हिस्सा बन सकता है।
ऑफिस का समय समाप्त होने के बाद कर्मचारी को घर पहुंचने के लिए ट्रैफिक में घंटों बिताने पड़ सकते हैं। इस दौरान न तो वह परिवार के साथ समय बिता पाता है और न ही आराम कर पाता है।
यही वजह है कि कागज पर आठ घंटे की नौकरी कई लोगों के लिए घर से निकलने से लेकर वापस पहुंचने तक 10 से 12 घंटे या उससे भी ज्यादा लंबा समय ले सकती है।
अनुष्का ने इसी अंतर को अपने वीडियो में प्रमुखता से उठाया है।
बॉस का आखिरी समय का काम भी बड़ी परेशानी
वीडियो में अनुष्का ने ऑफिस के अतिरिक्त काम का भी जिक्र किया है। उनके अनुसार, कई बार कर्मचारी की शिफ्ट खत्म होने वाली होती है और उसी समय कोई नया जरूरी काम सामने आ जाता है।
ऐसी स्थिति में कर्मचारी के लिए समय पर ऑफिस छोड़ना मुश्किल हो सकता है। यदि काम पूरा करने की जिम्मेदारी उसी दिन की हो तो घर जाने का समय आगे खिसक जाता है।
उनका कहना है कि इस तरह की परिस्थितियां रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालती हैं। व्यक्ति देर से घर पहुंचता है, थकान बढ़ती है और उसके बाद अगले दिन फिर वही दिनचर्या शुरू हो जाती है।
वीकेंड का इंतजार क्यों रहता है?
अनुष्का के वीडियो में सबसे दिलचस्प बातों में से एक वीकेंड का जिक्र है। उनका कहना है कि जब सोमवार से शुक्रवार तक काम, यात्रा और दूसरी जिम्मेदारियों में समय निकल जाता है तो शनिवार और रविवार निजी जिंदगी के लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन बन जाते हैं।
लेकिन यहां भी एक समस्या है।
पूरे सप्ताह की थकान जमा होने के कारण कई लोग वीकेंड का बड़ा हिस्सा आराम करने या घरेलू कामों में ही निकाल देते हैं। ऐसे में दोस्तों से मिलना, घूमना, व्यायाम करना या परिवार के साथ बाहर जाना भी मुश्किल हो सकता है।
इस तरह अगले सोमवार का इंतजार शुरू हो जाता है और काम का एक नया सप्ताह शुरू हो जाता है।
परिवार और फिटनेस के लिए कम समय
अनुष्का ने यह भी बताया कि लंबे कामकाजी दिन का असर सिर्फ आराम पर नहीं पड़ता। इसका प्रभाव परिवार, सामाजिक जीवन और स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
यदि कोई कर्मचारी रोजाना लंबे समय तक ऑफिस और ट्रैफिक में रहता है तो उसके पास बच्चों के साथ समय बिताने, माता-पिता से बातचीत करने या दोस्तों से मिलने का समय कम हो सकता है।
इसी तरह नियमित व्यायाम के लिए समय निकालना भी मुश्किल हो सकता है। काम से लौटने के बाद जब व्यक्ति पहले से थका हुआ हो तो जिम जाने या दौड़ने के बजाय आराम करना ज्यादा आसान विकल्प लग सकता है।
अनुष्का के मुताबिक, यही वह जगह है जहां वर्क-लाइफ बैलेंस महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्या UK में हर किसी की जिंदगी ऐसी ही है?
अनुष्का का वीडियो भारत और यूके के बीच तुलना करता है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि किसी भी देश में सभी कर्मचारियों का अनुभव एक जैसा नहीं होता।
यूके में भी कई लोग लंबे घंटे काम करते हैं, लंबी यात्रा करते हैं या नौकरी से जुड़े तनाव का सामना करते हैं। इसी तरह भारत में भी ऐसी अनेक कंपनियां हैं जहां कर्मचारी बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस के साथ काम करते हैं।
वर्क-लाइफ बैलेंस कई चीजों पर निर्भर करता है—कंपनी की नीति, नौकरी की प्रकृति, काम के घंटे, शहर, यात्रा, आय, परिवार की जिम्मेदारियां और व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएं।
इसलिए अनुष्का के वीडियो को दोनों देशों के हर कर्मचारी की जिंदगी की अंतिम तस्वीर के रूप में नहीं देखा जा सकता।
विदेश जाने की वजह सिर्फ ज्यादा कमाई नहीं
अनुष्का ने अपने वीडियो में एक महत्वपूर्ण बात कही है कि विदेश जाने का फैसला सिर्फ ज्यादा वेतन या बेहतर करियर के कारण नहीं होता। कुछ लोगों के लिए जीवन की गुणवत्ता और निजी समय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
भारतीय पेशेवरों का विदेश जाना नया विषय नहीं है। बड़ी संख्या में भारतीय विभिन्न देशों में पढ़ाई, नौकरी और व्यवसाय के लिए जाते हैं। कुछ वापस भारत लौटते हैं, जबकि कुछ लंबे समय के लिए वहीं बस जाते हैं।
अनुष्का के नजरिए में विदेश में रहने का एक फायदा यह हो सकता है कि काम और निजी जिंदगी के बीच सीमा कुछ लोगों के लिए अधिक स्पष्ट महसूस होती है।
हालांकि, विदेश में रहने के साथ भी कई चुनौतियां होती हैं—परिवार से दूरी, रहने की लागत, अकेलापन, मौसम, वीजा संबंधी अनिश्चितताएं और नई संस्कृति में खुद को ढालना। इसलिए केवल वर्क-लाइफ बैलेंस के आधार पर विदेश में रहना हर व्यक्ति के लिए बेहतर विकल्प हो, ऐसा जरूरी नहीं है।
सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस
अनुष्का के वीडियो ने इसी वजह से सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। कुछ लोग उनके अनुभव से सहमत नजर आते हैं और कहते हैं कि भारत के बड़े शहरों में काम और यात्रा का समय वास्तव में निजी जिंदगी को काफी प्रभावित करता है।
दूसरी ओर कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि भारत में सभी नौकरियों और शहरों को एक ही नजर से देखना सही नहीं है। कई भारतीय कंपनियां अब हाइब्रिड वर्क, फ्लेक्सिबल टाइमिंग और वर्क-फ्रॉम-होम जैसी सुविधाएं भी दे रही हैं।
यानी बहस सिर्फ भारत बनाम यूके की नहीं है। असली सवाल यह है कि एक कर्मचारी को काम के बदले अपनी जिंदगी के लिए कितना समय मिल रहा है।
बदलती दुनिया में वर्क-लाइफ बैलेंस क्यों जरूरी?
काम किसी भी व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन काम के अलावा भी जिंदगी के कई पहलू होते हैं। परिवार, दोस्त, स्वास्थ्य, नींद, मनोरंजन और व्यक्तिगत विकास सभी के लिए समय जरूरी है।
यदि व्यक्ति लगातार काम और यात्रा में व्यस्त रहता है तो लंबे समय में थकान और तनाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यदि काम और निजी जिंदगी के बीच बेहतर संतुलन हो तो कर्मचारी अपने काम में भी ज्यादा ऊर्जा और ध्यान लगा सकता है।
इसी वजह से दुनिया भर में कंपनियां अब कर्मचारी कल्याण, मानसिक स्वास्थ्य, लचीले काम के घंटे और हाइब्रिड वर्क जैसे विषयों पर ध्यान दे रही हैं।
अनुष्का व्यास का वायरल वीडियो इसी बड़े सवाल को सामने लाता है कि क्या 9 से 5 की नौकरी सचमुच 9 से 5 ही होती है, या ऑफिस के बाहर का समय भी हमारी नौकरी की वास्तविक कीमत का हिस्सा है?
वीडियो में उन्होंने यूके में काम के बाद पार्क में बिताए जा रहे शांत समय को भारत के लंबे सफर और अतिरिक्त काम से जोड़कर अपनी बात रखी। उनका अनुभव भले ही व्यक्तिगत हो, लेकिन इसने हजारों कामकाजी लोगों को अपनी दिनचर्या पर सोचने का मौका जरूर दिया है।
आखिरकार, अच्छी नौकरी केवल अच्छी सैलरी का नाम नहीं है। कमाई के साथ अगर परिवार, स्वास्थ्य और अपने लिए समय बचा रहे, तभी काम और जिंदगी के बीच सही संतुलन बन पाता है।

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