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वंदे मातरम पर कांग्रेस का बड़ा फैसला, 1937 की लाइन पर अड़ी पार्टी; सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे

 


नई दिल्ली। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने अपने आंतरिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर अपना पुराना रुख बरकरार रखने का फैसला किया है। कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में पार्टी ने तय किया है कि उसके कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। यह फैसला उस ऐतिहासिक व्यवस्था के अनुरूप है, जिसे कांग्रेस की कार्यसमिति ने 1937 में अपनाया था।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार की ओर से ‘वंदे मातरम’ को लेकर हाल में कानूनी संरक्षण बढ़ाया गया है। संसद ने जुलाई 2026 में Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 पारित किया था और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून बन चुका है। नए कानून के तहत राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में लगी सभा में व्यवधान डालना दंडनीय बनाया गया है।

15 अगस्त के कार्यक्रम के बाद शुरू हुआ विवाद

वंदे मातरम को लेकर ताजा राजनीतिक विवाद कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के बाद सामने आया। समारोह के दौरान राष्ट्रगीत के गायन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में आया, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी के बीच बातचीत होती दिखाई दी।

वीडियो सामने आने के बाद भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के प्रति कथित अनादर का आरोप लगाया। भाजपा की ओर से सवाल उठाए गए कि राष्ट्रगीत के दौरान कांग्रेस नेताओं का इस तरह बातचीत करना उचित था या नहीं। इस पूरे घटनाक्रम ने देखते ही देखते राजनीतिक बहस का रूप ले लिया।

कांग्रेस ने हालांकि इन आरोपों को खारिज किया और घटनाक्रम की अलग व्याख्या पेश की। पार्टी की ओर से कहा गया कि बातचीत का संबंध कार्यक्रम की व्यवस्था से था और इसे राष्ट्रगीत रोकने या उसका अनादर करने की मंशा से जोड़ना सही नहीं है।

खरगे ने भाजपा पर किया पलटवार

विवाद बढ़ने के बाद मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा के आरोपों का तीखा जवाब दिया। उन्होंने कांग्रेस के उस रुख का बचाव किया जिसके तहत पार्टी अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पहले दो अंतरों को प्राथमिकता देती है।

खरगे का तर्क रहा कि कांग्रेस जिस संस्करण को गाती रही है, वह कोई नया फैसला नहीं है। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल सहित स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए भाजपा के आरोपों पर सवाल उठाए। हालिया राजनीतिक बयानबाजी में उन्होंने यह भी कहा कि यदि उस ऐतिहासिक परंपरा को गलत माना जा रहा है तो उस दौर के प्रमुख नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठाने होंगे।

1937 में क्यों तय हुआ था सिर्फ दो अंतरों का इस्तेमाल?

वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस का मौजूदा रुख समझने के लिए 1937 के फैसले को समझना जरूरी है।

कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में राष्ट्रगीत के इस्तेमाल पर विस्तार से विचार किया था। उस समय समिति ने माना था कि गीत के शुरुआती दो अंतरे लंबे समय से सार्वजनिक और राष्ट्रीय आयोजनों में व्यापक रूप से गाए जाते रहे हैं और इनमें ऐसी बातें नहीं थीं जिन पर विभिन्न समुदायों की ओर से धार्मिक आपत्ति जताई जाए।

वहीं गीत के बाद के हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों और रूपकों का इस्तेमाल था, जिसको लेकर उस समय कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों की आपत्तियां सामने आई थीं। इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय समारोहों के लिए पहले दो अंतरों को अपनाने की सिफारिश की थी।

जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक दस्तावेजों में भी इस विषय पर विस्तृत चर्चा मिलती है। उस दौर में कांग्रेस नेतृत्व का मानना था कि राष्ट्रीय प्रतीक के तौर पर ऐसा स्वरूप चुना जाना चाहिए जिसे देश के विभिन्न समुदाय सहज रूप से स्वीकार कर सकें।

बाद में वंदे मातरम को मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा

स्वतंत्रता के बाद वंदे मातरम को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में विशेष स्थान मिला। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए जाने की व्यवस्था की। दोनों को सम्मान देने की बात भी कही गई थी।

इस तरह वंदे मातरम का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ा इतिहास बेहद पुराना है। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा इसे गाए जाने का उल्लेख भी मिलता है। बाद में यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख प्रतीकों में शामिल हो गया।

अब नया कानून क्या कहता है?

2026 में केंद्र सरकार ने वंदे मातरम को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव किया। संसद ने Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 को पारित किया, जिसके जरिए 1971 के कानून में संशोधन किया गया।

इस संशोधन के बाद राष्ट्रगीत को भी उस कानूनी सुरक्षा के दायरे में लाया गया है, जो पहले राष्ट्रीय गान के लिए उपलब्ध थी। कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन को रोकता है या उसके गायन में लगी सभा में व्यवधान पैदा करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। पहली बार दोषसिद्धि पर तीन वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 11 अगस्त 2026 को विधेयक को मंजूरी दी, जिसके बाद संशोधन कानून बन गया।

क्या पहले दो अंतरे गाना कानून का उल्लंघन है?

यहीं इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।

नए कानून का केंद्र जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन को रोकना या गायन में लगी सभा में व्यवधान डालना है। उपलब्ध कानूनी विवरण यह नहीं कहता कि हर सार्वजनिक या निजी कार्यक्रम में वंदे मातरम के सभी अंतरों का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। इसलिए कांग्रेस द्वारा अपने आंतरिक कार्यक्रमों के लिए पहले दो अंतरों की परंपरा बनाए रखने के फैसले को सीधे तौर पर कानून तोड़ने के बराबर मानना उचित नहीं होगा।

यानी विवाद का केंद्र यह है कि राष्ट्रगीत का सम्मान और उसके पूर्ण संस्करण के गायन की मांग—इन दोनों को किस तरह समझा जाए।

कांग्रेस अपने 1937 के ऐतिहासिक फैसले को आधार बना रही है, जबकि भाजपा और केंद्र समर्थक पक्ष वंदे मातरम के व्यापक और पूर्ण गायन पर जोर दे रहे हैं।

कांग्रेस ने क्यों दोहराया पुराना फैसला?

कांग्रेस के लिए यह फैसला केवल गीत के कितने अंतरे गाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे पार्टी की ऐतिहासिक राजनीतिक स्थिति भी जुड़ी हुई है।

1937 का फैसला उस समय लिया गया था जब कांग्रेस राष्ट्रीय आंदोलन में विभिन्न समुदायों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रही थी। पार्टी ने शुरुआती दो अंतरों को राष्ट्रीय आयोजनों के लिए उपयुक्त माना था और यही व्यवस्था लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा बनी रही।

अब 2026 में उसी फैसले को दोहराकर कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह अपने ऐतिहासिक रिकॉर्ड से पीछे नहीं हटेगी।

भाजपा-कांग्रेस के बीच बढ़ सकती है राजनीतिक गर्मी

वंदे मातरम का मुद्दा अब केवल सांस्कृतिक या ऐतिहासिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है। यह भाजपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक टकराव का एक और मुद्दा बन गया है।

भाजपा कांग्रेस पर राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर नरम रुख अपनाने का आरोप लगाती रही है। दूसरी ओर कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रगीत के सम्मान को किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से जोड़ना उचित नहीं है और 1937 में तय की गई व्यवस्था का अपना ऐतिहासिक संदर्भ है।

कांग्रेस के ताजा फैसले के बाद आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। खासकर ऐसे समय में जब वंदे मातरम को नया कानूनी संरक्षण मिल चुका है, कांग्रेस का अपने पुराने दो-अंतरा वाले रुख पर कायम रहना इस बहस को और महत्वपूर्ण बना देता है।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल कांग्रेस ने अपने आंतरिक कार्यक्रमों में पहले दो अंतरों की परंपरा जारी रखने का फैसला किया है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम को कानूनी संरक्षण देने के बाद राष्ट्रगीत से जुड़े सार्वजनिक आयोजनों में नियमों और व्यवहार को लेकर नई बहस शुरू हो चुकी है।

आने वाले समय में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि विभिन्न राजनीतिक दल और सार्वजनिक संस्थान राष्ट्रगीत के सम्मान, उसके ऐतिहासिक स्वरूप और नए कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।

कुल मिलाकर, वंदे मातरम पर कांग्रेस का 1937 वाला रुख 2026 में फिर सामने आ गया है। पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि उसके आंतरिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। वहीं नया कानून इस गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या उसमें व्यवधान डालने के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। यही दो अलग-अलग पहलू आने वाले दिनों में इस राजनीतिक विवाद को और हवा दे सकते हैं।

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