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जोड़ों की जकड़न और नसों के दर्द से राहत का दावा! रोज 20 मिनट का ये 5-स्टेप तरीका कितना असरदार? जानिए सच



नई दिल्ली: जोड़ों में दर्द, अकड़न, उठने-बैठने में परेशानी या शरीर में भारीपन जैसी शिकायतें उम्र बढ़ने के साथ ही नहीं, बल्कि कई दूसरी वजहों से भी हो सकती हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक ऐसा 5-स्टेप तरीका चर्चा में है, जिसमें तेल मालिश, गर्म सिकाई, मर्म पॉइंट्स पर दबाव, नाड़ी शोधन प्राणायाम और गर्म पानी से स्नान के साथ कुछ खाद्य पदार्थों को शामिल करने की सलाह दी जा रही है।

इस दावे में इसे आयुर्वेद से जोड़ते हुए कहा गया है कि शरीर में वात बढ़ने पर “रास्ते जम” जाते हैं और इससे जोड़ों में दर्द, नसों में ब्लॉकेज और मांसपेशियों की थकान महसूस होती है। हालांकि यहां एक जरूरी बात समझना बेहद महत्वपूर्ण है—जोड़ों का दर्द या जकड़न किसी एक कारण से नहीं होती और इसे शरीर की नसों में “ब्लॉकेज” मानकर खुद इलाज शुरू करना सही नहीं है।

वैज्ञानिक चिकित्सा में जोड़ों के दर्द के कारण ऑस्टियोआर्थराइटिस, चोट, सूजन संबंधी बीमारियां, संक्रमण, मांसपेशियों या टेंडन की समस्या और कई अन्य स्थितियां हो सकती हैं। इसलिए लंबे समय से दर्द या लगातार बढ़ती जकड़न की स्थिति में डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

वायरल 5-स्टेप तरीके में क्या बताया जा रहा है?

सोशल मीडिया पर वायरल दावे में रोजाना करीब 20 से 25 मिनट का एक रूटीन बताया गया है। इसमें सबसे पहले तेल से मालिश करने की बात कही गई है। इसके बाद गर्म तौलिये से सिकाई, कुछ मर्म पॉइंट्स पर हल्का दबाव, नाड़ी शोधन प्राणायाम और अंत में गर्म पानी से स्नान करने की सलाह दी गई है।

दावे में यह भी कहा गया है कि इस प्रक्रिया से जोड़ों में “ब्लॉकेज” खुल सकता है और शरीर में ऊर्जा का प्रवाह बेहतर हो सकता है। लेकिन इन दावों को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में पेश करने से पहले सावधानी जरूरी है।

अमेरिकी National Center for Complementary and Integrative Health (NCCIH) के अनुसार आयुर्वेद से जुड़े कुछ उपचारों पर शुरुआती शोध मौजूद है, लेकिन कई स्थितियों में वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित हैं। कुछ छोटे अध्ययनों में ऑस्टियोआर्थराइटिस के दर्द और कार्यक्षमता में सुधार देखा गया है, लेकिन उपलब्ध शोध इतना मजबूत नहीं है कि आयुर्वेदिक उपचारों को हर व्यक्ति के लिए प्रभावी उपचार माना जा सके।

पहला कदम: तेल मालिश

वायरल रूटीन में दर्द वाले जोड़ पर तेल लगाकर मालिश करने की सलाह दी गई है। मालिश से कुछ लोगों को अस्थायी आराम या मांसपेशियों में रिलैक्सेशन महसूस हो सकता है। घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस पर हुए कुछ अध्ययनों में मालिश से दर्द, जकड़न और शारीरिक कार्यक्षमता में अल्पकालिक सुधार देखा गया है। हालांकि इसके प्रमाण सीमित हैं और यह हर व्यक्ति में समान प्रभाव देगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

इसलिए मालिश को आराम देने वाली सहायक प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे किसी बीमारी का निश्चित इलाज मानना सही नहीं होगा।

एक और सावधानी जरूरी है। बहुत तेज या गहरी मालिश हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं होती। खासकर चोट, सूजन, त्वचा पर घाव, रक्तस्राव की समस्या या खून पतला करने वाली दवाएं लेने वाले लोगों को बिना चिकित्सकीय सलाह के जोरदार मालिश से बचना चाहिए।

दूसरा कदम: गर्म सिकाई

गर्म तौलिये से सिकाई कई लोगों को मांसपेशियों और जोड़ों की जकड़न में आराम दे सकती है। लेकिन वायरल दावे में इसे “ब्लॉकेज पिघलाने” या नसों को खोलने वाला उपाय बताया गया है, जिसका वैज्ञानिक आधार स्पष्ट नहीं है।

गर्म सिकाई करते समय तापमान बहुत ज्यादा नहीं होना चाहिए। लंबे समय तक अत्यधिक गर्म चीज त्वचा पर रखने से जलने का खतरा हो सकता है।

इसके अलावा हर तरह के दर्द में गर्म सिकाई उपयुक्त नहीं होती। चोट के तुरंत बाद होने वाली सूजन या कुछ दूसरी परिस्थितियों में डॉक्टर अलग तरह की सलाह दे सकते हैं।

तीसरा कदम: मर्म पॉइंट्स

वायरल पोस्ट में अंगूठे और तर्जनी के बीच स्थित शिप्र मर्म तथा कलाई के आसपास के मर्म क्षेत्र पर हल्का दबाव देने की बात कही गई है। इसे शरीर में ऊर्जा प्रवाह और “ब्लॉक नसों” को खोलने से जोड़ा गया है।

यहां भी दावा और वैज्ञानिक प्रमाण के बीच अंतर समझना जरूरी है। शरीर में नसों, रक्त वाहिकाओं और अन्य संरचनाओं की वास्तविक रुकावट का इलाज केवल किसी दबाव बिंदु को दबाकर किया जा सकता है, ऐसा प्रमाणित नहीं है।

अगर किसी व्यक्ति को हाथ-पैर में लगातार सुन्नपन, झनझनाहट, कमजोरी या संवेदना कम होने की समस्या है तो इसे केवल मर्म पॉइंट्स की समस्या मानकर इलाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है।

चौथा कदम: नाड़ी शोधन प्राणायाम

नाड़ी शोधन एक नियंत्रित श्वास अभ्यास है। योग और सांस संबंधी अभ्यास कुछ लोगों के लिए तनाव कम करने और रिलैक्सेशन में मददगार हो सकते हैं। योग पर उपलब्ध शोध में कुछ दर्द की स्थितियों, खासकर लोअर बैक पेन में मामूली लाभ के संकेत मिले हैं। हालांकि किसी भी योग या श्वास अभ्यास को बीमारी का सीधा इलाज नहीं माना जा सकता।

प्राणायाम करते समय सांस को जबरदस्ती रोकने या बहुत तेज सांस लेने से बचना चाहिए। पहली बार अभ्यास करने वाले लोग इसे आराम से और प्रशिक्षित व्यक्ति के मार्गदर्शन में सीख सकते हैं।

पांचवां कदम: गर्म पानी और खान-पान

वायरल दावे में गर्म पानी से स्नान करने और दही, ठंडे पेय, कच्ची सलाद तथा ठंडे पानी से बचने की सलाह दी गई है। साथ ही देसी घी, गर्म दूध, खिचड़ी और हल्दी वाला दूध लेने की बात कही गई है।

लेकिन हर व्यक्ति के लिए इन खाद्य पदार्थों को अनिवार्य या निषिद्ध मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। स्वस्थ और संतुलित भोजन में पर्याप्त प्रोटीन, फल, सब्जियां, साबुत अनाज और व्यक्ति की जरूरत के मुताबिक पोषक तत्व शामिल होना अधिक महत्वपूर्ण है।

किसी खास भोजन को “जोड़ों में लुब्रिकेशन” या नसों का प्रवाह सुधारने का निश्चित इलाज बताने के लिए मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं।

सबसे जरूरी है हल्की गतिविधि

जोड़ों में दर्द होने पर पूरी तरह हिलना-डुलना बंद कर देना हमेशा सही तरीका नहीं है। नियमित और व्यक्ति की क्षमता के अनुरूप शारीरिक गतिविधि कई प्रकार की जोड़ों की समस्याओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ऑस्टियोआर्थराइटिस के मामले में एरोबिक एक्सरसाइज, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, वजन प्रबंधन और कुछ अन्य गैर-दवा उपचारों की सिफारिश की जाती है। घुटने या कूल्हे के ऑस्टियोआर्थराइटिस में ताई-ची जैसे व्यायामों के भी सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि दर्द होने पर कोई भी एक्सरसाइज कर लेनी चाहिए। व्यायाम का प्रकार और उसकी तीव्रता व्यक्ति की उम्र, बीमारी और शारीरिक क्षमता के अनुसार तय होना चाहिए।

“नसों में ब्लॉकेज” को नजरअंदाज न करें

वायरल दावे में “नसों में ब्लॉकेज” शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन यह आम बोलचाल का शब्द है और इसके पीछे अलग-अलग चिकित्सकीय समस्याएं हो सकती हैं।

अगर किसी व्यक्ति को लगातार झनझनाहट, सुन्नपन, कमजोरी या चलने में परेशानी हो रही है तो केवल तेल मालिश या प्राणायाम पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।

खासकर अगर दर्द के साथ अचानक कमजोरी या संवेदना खत्म होना शुरू हो, तो तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो सकती है।

कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?

जोड़ों का दर्द अगर लगातार बना रहता है, बार-बार लौटता है या रोजमर्रा के काम प्रभावित करने लगता है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

अगर जोड़ लाल, गर्म और सूजा हुआ है तथा साथ में बुखार या कंपकंपी जैसी समस्या है, तो तत्काल चिकित्सकीय सलाह जरूरी हो सकती है। इसी तरह चोट के बाद बहुत तेज दर्द हो, व्यक्ति जोड़ पर वजन न डाल पा रहा हो या चोट के बाद झनझनाहट अथवा संवेदना खत्म हो गई हो, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

आयुर्वेद को लेकर भी रखें सावधानी

आयुर्वेदिक तेल या दूसरे उत्पादों का इस्तेमाल करने से पहले उनकी गुणवत्ता और सामग्री के बारे में जानकारी लेना जरूरी है। NCCIH के अनुसार कुछ आयुर्वेदिक तैयारियों में सीसा, पारा या आर्सेनिक जैसे पदार्थ पाए गए हैं, जो विषैले हो सकते हैं। इसलिए बिना विश्वसनीय स्रोत और चिकित्सकीय सलाह के कोई भी आयुर्वेदिक उत्पाद खाना या दवा के रूप में लेना उचित नहीं है।

आयुर्वेदिक या किसी भी वैकल्पिक उपचार को डॉक्टर से मिलने में देरी करने का कारण नहीं बनाना चाहिए।

20-25 मिनट का रूटीन क्या वाकई काम करेगा?

वायरल दावे में कहा गया है कि रोजाना 20-25 मिनट यह प्रक्रिया करने से जोड़ हल्के, फ्लेक्सिबल और एनर्जेटिक हो जाएंगे। लेकिन किसी व्यक्ति के दर्द का कारण जाने बिना इतनी निश्चित समय सीमा में परिणाम की गारंटी देना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।

किसी को साधारण मांसपेशियों की जकड़न हो सकती है, किसी को ऑस्टियोआर्थराइटिस, किसी को चोट और किसी को ऐसी बीमारी जिसमें अलग उपचार की आवश्यकता हो।

इसलिए मालिश, हल्की सिकाई, उचित व्यायाम और रिलैक्सेशन जैसी चीजों को सहायक उपाय के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इन्हें डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

जोड़ों की जकड़न और दर्द से राहत के लिए सोशल मीडिया पर बताए जा रहे 5-स्टेप रूटीन में कुछ गतिविधियां—जैसे हल्की मालिश, नियंत्रित श्वास और उपयुक्त शारीरिक गतिविधि—कुछ लोगों को आराम देने में मदद कर सकती हैं। लेकिन “वात बढ़ने से नसों में ब्लॉकेज” या मर्म पॉइंट दबाने से नसों की रुकावट खुलने जैसे दावों को वैज्ञानिक रूप से स्थापित उपचार नहीं माना जा सकता।

अगर दर्द नया है, लगातार बढ़ रहा है, सूजन या बुखार के साथ है, चलने में परेशानी हो रही है या हाथ-पैर में सुन्नपन और कमजोरी महसूस हो रही है, तो घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना सबसे सुरक्षित रास्ता है।

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