क्या एक मां की छोटी सी गलती बच्चे की जिंदगी पर पड़ सकती है भारी? WHO की नई चेतावनी ने बढ़ाई चिंता!
बच्चे के जन्म के तुरंत बाद मां का पहला दूध यानी स्तनपान केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि नवजात के जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा माना जाता है। इसी बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक बार फिर दुनिया के सभी देशों को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि नवजात शिशुओं और माताओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है तो स्तनपान को प्राथमिकता देना ही होगा। संगठन ने स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने और हर मां को स्तनपान संबंधी सही जानकारी तथा सहायता उपलब्ध कराने पर जोर दिया है।
WHO का कहना है कि आज भी दुनिया में लाखों बच्चे केवल इसलिए बीमार पड़ते हैं क्योंकि उन्हें जन्म के बाद समय पर मां का दूध नहीं मिल पाता या शुरुआती छह महीनों तक केवल स्तनपान नहीं कराया जाता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी देशों में स्तनपान को लेकर जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किया जाए तो हर साल लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकती है।
आखिर WHO ने क्यों जारी की नई चेतावनी?
विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि जन्म के पहले एक घंटे के भीतर बच्चे को मां का दूध पिलाना बेहद जरूरी है। इसके बावजूद कई देशों में अस्पतालों की व्यवस्था, जागरूकता की कमी, सामाजिक मिथकों और गलत जानकारी के कारण ऐसा नहीं हो पाता।
WHO ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे हर मां को स्तनपान शुरू कराने में मदद कर सकें। साथ ही अस्पतालों और प्रसूति केंद्रों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे मां और बच्चा जन्म के तुरंत बाद साथ रह सकें।
मां का पहला दूध क्यों है अमृत?
विशेषज्ञ बताते हैं कि जन्म के बाद निकलने वाला गाढ़ा पीला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम (Colostrum) कहा जाता है, बच्चे के लिए प्राकृतिक वैक्सीन की तरह काम करता है।
इसमें मौजूद पोषक तत्व और एंटीबॉडी नवजात को कई गंभीर संक्रमणों से बचाने में मदद करते हैं।
इसके प्रमुख फायदे—
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
निमोनिया और डायरिया का खतरा कम होता है।
पाचन तंत्र मजबूत बनता है।
संक्रमण से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास बेहतर होता है।
यही कारण है कि डॉक्टर इसे बच्चे का पहला टीका भी कहते हैं।
केवल छह महीने तक स्तनपान क्यों जरूरी?
WHO की सिफारिश है कि जन्म के बाद पहले छह महीनों तक बच्चे को केवल मां का दूध ही दिया जाए।
इस दौरान पानी, शहद, गाय का दूध या अन्य कोई भोजन देने की जरूरत नहीं होती।
छह महीने बाद धीरे-धीरे पूरक आहार शुरू किया जा सकता है, लेकिन स्तनपान दो वर्ष या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा करने से बच्चे का शारीरिक विकास बेहतर होता है और भविष्य में मोटापा, मधुमेह तथा कई अन्य बीमारियों का खतरा भी कम हो सकता है।
मां को भी होते हैं बड़े फायदे
अक्सर लोग केवल बच्चे के फायदे की बात करते हैं, लेकिन स्तनपान मां के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभदायक माना जाता है।
इसके प्रमुख लाभ—
प्रसव के बाद शरीर जल्दी सामान्य होता है।
अत्यधिक रक्तस्राव का खतरा कम होता है।
स्तन कैंसर का जोखिम घटता है।
ओवरी कैंसर का खतरा कम होता है।
मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
मां और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है।
क्यों नहीं करा पातीं कई महिलाएं स्तनपान?
WHO के अनुसार कई देशों में महिलाओं को पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाता।
मुख्य कारण हैं—
परिवार की गलत धारणाएं।
कार्यस्थल पर पर्याप्त मातृत्व अवकाश का अभाव।
अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ की कमी।
शिशु फार्मूला दूध का बढ़ता प्रचार।
स्तनपान से जुड़ी झिझक और सामाजिक दबाव।
संगठन ने कहा कि यदि इन समस्याओं का समाधान किया जाए तो स्तनपान की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
भारत की स्थिति
भारत में सरकार द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी और सरकारी अस्पतालों के माध्यम से नई माताओं को स्तनपान के महत्व के बारे में जानकारी दी जाती है।
फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों और कुछ शहरी इलाकों में जागरूकता की कमी अब भी चुनौती बनी हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समाज के हर वर्ग को इस विषय पर सही जानकारी देने की जरूरत है।
अस्पतालों की भूमिका सबसे अहम
WHO ने कहा कि अस्पतालों को "बेबी फ्रेंडली" बनाना बेहद जरूरी है।
इसका अर्थ है—
जन्म के तुरंत बाद मां और बच्चे का संपर्क।
पहले घंटे में स्तनपान शुरू कराना।
बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के फार्मूला दूध न देना।
प्रशिक्षित नर्स और डॉक्टर द्वारा स्तनपान में सहायता करना।
ऐसी व्यवस्था से स्तनपान की सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
कामकाजी महिलाओं के लिए क्या सुझाव?
WHO का कहना है कि कामकाजी महिलाओं को भी स्तनपान जारी रखने के लिए बेहतर सुविधाएं मिलनी चाहिए।
इसके लिए—
पर्याप्त मातृत्व अवकाश,
कार्यालयों में स्तनपान कक्ष,
दूध सुरक्षित रखने की सुविधा,
लचीला कार्य समय
जैसी व्यवस्थाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं।
परिवार की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मां ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार इस प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।
यदि पति, दादा-दादी और अन्य सदस्य सहयोग करें तो मां का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह लंबे समय तक सफलतापूर्वक स्तनपान करा सकती है।
विशेषज्ञों की राय
बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि मां का दूध किसी भी कृत्रिम दूध से बेहतर होता है।
इसमें मौजूद पोषक तत्व बच्चे की उम्र और जरूरत के अनुसार स्वाभाविक रूप से बदलते रहते हैं। यही कारण है कि इसका कोई पूर्ण विकल्प नहीं है।
डॉक्टरों का कहना है कि यदि किसी विशेष चिकित्सकीय कारण से मां स्तनपान नहीं करा सकती, तभी डॉक्टर की सलाह से अन्य विकल्प अपनाने चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई अपील केवल एक सलाह नहीं, बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यदि हर नवजात को जन्म के पहले घंटे में मां का दूध मिले और पहले छह महीनों तक केवल स्तनपान कराया जाए, तो लाखों बच्चों को गंभीर बीमारियों और कुपोषण से बचाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था, जागरूकता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और परिवार का सहयोग मिलकर ही इस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं। मां का दूध सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि बच्चे के स्वस्थ भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।

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