धरती पर मंडरा रहा है करोड़ों साल पुराना खतरा! वैज्ञानिकों ने बताया बचने का आखिरी तरीका
नई दिल्ली: अंतरिक्ष हमेशा से इंसानों के लिए रहस्यों से भरा रहा है। लेकिन यही अंतरिक्ष कभी-कभी ऐसा खतरा भी लेकर आता है, जो पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर सकता है। वैज्ञानिक वर्षों से ऐसे एस्टेरॉयड पर नजर रख रहे हैं, जो पृथ्वी के बेहद करीब से गुजरते हैं या भविष्य में उससे टकराने की संभावना रखते हैं। यदि किसी बड़े एस्टेरॉयड की सीधी टक्कर पृथ्वी से हो जाए, तो उसका प्रभाव किसी वैश्विक प्रलय से कम नहीं होगा।
इसी खतरे से निपटने के लिए दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियां लगातार नई तकनीकों पर काम कर रही हैं। एक तरफ अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने DART मिशन के जरिए एस्टेरॉयड का रास्ता बदलने की तकनीक का सफल प्रदर्शन किया है, वहीं दूसरी ओर चीन ने एक ऐसा न्यूक्लियर प्लान पेश किया है, जिसे कई विशेषज्ञ भविष्य का सबसे शक्तिशाली रक्षा विकल्प मान रहे हैं।
आखिर क्या होते हैं एस्टेरॉयड?
एस्टेरॉयड सौर मंडल के निर्माण के समय बचे हुए चट्टानी और धात्विक टुकड़े हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इनकी उम्र लगभग 4.6 अरब वर्ष है। अधिकांश एस्टेरॉयड मंगल और बृहस्पति (जुपिटर) के बीच स्थित एस्टेरॉयड बेल्ट में सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
हालांकि इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी कक्षा पृथ्वी की कक्षा को काटती है। इन्हें Near-Earth Asteroids (NEAs) कहा जाता है। ऐसे एस्टेरॉयड पर दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां लगातार निगरानी रखती हैं क्योंकि भविष्य में इनमें से किसी की टक्कर पृथ्वी से हो सकती है।
कितना बड़ा है खतरा?
एस्टेरॉयड का खतरा कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। वर्ष 2019 में लगभग 130 मीटर चौड़ा एक विशाल एस्टेरॉयड पृथ्वी से केवल 72 हजार किलोमीटर की दूरी से गुजर गया था।
चिंताजनक बात यह थी कि वैज्ञानिकों को इसके बारे में बहुत देर से जानकारी मिली। यदि उसका मार्ग थोड़ा भी बदल जाता, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि 100 मीटर से बड़ा एस्टेरॉयड किसी बड़े शहर को पूरी तरह तबाह कर सकता है, जबकि एक किलोमीटर चौड़ा एस्टेरॉयड वैश्विक जलवायु, कृषि और मानव जीवन पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकता है।
NASA का DART मिशन बना इतिहास
सितंबर 2022 में NASA ने इतिहास रच दिया। DART (Double Asteroid Redirection Test) मिशन के तहत पहली बार जानबूझकर एक स्पेसक्राफ्ट को एस्टेरॉयड से टकराया गया।
इस मिशन का उद्देश्य एस्टेरॉयड को नष्ट करना नहीं बल्कि उसकी दिशा बदलना था।
मिशन के दौरान स्पेसक्राफ्ट ने डिमॉर्फोस नामक छोटे एस्टेरॉयड से टक्कर मारी। इस टक्कर के बाद उसकी कक्षा में सफलतापूर्वक बदलाव दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि एस्टेरॉयड की गति में लगभग 2.7 मिलीमीटर प्रति सेकंड का परिवर्तन आया।
यह मानव इतिहास का पहला सफल "प्लैनेटरी डिफेंस" प्रयोग माना गया।
लेकिन क्या इतना काफी है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि DART तकनीक छोटे और मध्यम आकार के एस्टेरॉयड के लिए काफी प्रभावी हो सकती है।
लेकिन यदि पृथ्वी की ओर कई सौ मीटर या एक किलोमीटर चौड़ा विशाल एस्टेरॉयड तेजी से बढ़ रहा हो, तो केवल एक स्पेसक्राफ्ट की टक्कर उसे रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
ऐसी स्थिति में कहीं अधिक शक्तिशाली तकनीक की आवश्यकता होगी।
चीन ने पेश किया न्यूक्लियर प्लान
इसी चुनौती को देखते हुए चीन के वैज्ञानिकों ने एक नया प्रस्ताव तैयार किया है।
चाइनीज एकेडमी ऑफ लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि यदि बहुत बड़ा एस्टेरॉयड पृथ्वी की ओर बढ़ रहा हो और समय बेहद कम हो, तो उसे न्यूक्लियर तकनीक की मदद से रोका जा सकता है।
यह योजना सुनने में हॉलीवुड फिल्म "आर्मगेडन" जैसी लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिकों का दावा है कि उनका मॉडल पूरी तरह रोबोटिक और बिना किसी मानव मिशन के होगा।
कैसे करेगा काम यह मिशन?
चीन का प्रस्ताव दो चरणों में काम करेगा।
पहले चरण में एक स्पेसक्राफ्ट एस्टेरॉयड की सतह पर एक विशेष धातु का पेनेट्रेटर दागेगा, जो लगभग 30 मीटर गहरा छेद बनाएगा।
इसके तुरंत बाद दूसरा स्पेसक्राफ्ट उसी छेद के भीतर न्यूक्लियर डिवाइस पहुंचाएगा।
जब बम निर्धारित गहराई पर विस्फोट करेगा, तो उसकी पूरी ऊर्जा सीधे एस्टेरॉयड के अंदर पहुंचेगी, जिससे या तो उसका मार्ग बदल जाएगा या वह छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट सकता है।
कंप्यूटर सिमुलेशन ने चौंकाए वैज्ञानिक
चीनी वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का परीक्षण कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए किया।
उन्होंने 10 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से पृथ्वी की ओर बढ़ रहे काल्पनिक एस्टेरॉयड पर यह मॉडल लागू किया।
परिणाम बेहद दिलचस्प रहे।
50 मीटर चौड़ा एस्टेरॉयड
लगभग 300 किलोटन की क्षमता वाला न्यूक्लियर विस्फोट उसे पूरी तरह नष्ट कर सकता है। यह ऊर्जा हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से लगभग 20 गुना अधिक होगी।
100 मीटर चौड़ा एस्टेरॉयड
इसे खत्म करने के लिए लगभग 3 मेगाटन क्षमता वाले विस्फोट की आवश्यकता होगी।
1 किलोमीटर चौड़ा एस्टेरॉयड
इतने विशाल एस्टेरॉयड को पूरी तरह नष्ट करना बेहद कठिन माना गया है। हालांकि वैज्ञानिकों का दावा है कि उसकी गति में लगभग 30 सेंटीमीटर प्रति सेकंड का बदलाव लाकर उसके पृथ्वी से टकराने की संभावना खत्म की जा सकती है।
NASA से 110 गुना ज्यादा असरदार?
रिपोर्ट के अनुसार यदि न्यूक्लियर विस्फोट सतह से लगभग 30 मीटर नीचे किया जाए तो उसका प्रभाव NASA के DART मिशन की तुलना में लगभग 110 गुना अधिक हो सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि गहराई में विस्फोट करने से ऊर्जा बाहर निकलने के बजाय सीधे एस्टेरॉयड के भीतर फैलती है, जिससे उसका मार्ग अधिक प्रभावी तरीके से बदला जा सकता है।
सीधे टक्कर क्यों नहीं?
सवाल उठता है कि न्यूक्लियर बम सीधे एस्टेरॉयड से टकराकर क्यों नहीं फोड़ा जाता?
वैज्ञानिकों के अनुसार यदि बम लगभग 20 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से सीधे टकराए, तो उसके सक्रिय होने से पहले ही वह नष्ट हो सकता है।
इसीलिए दो-स्टेज मॉडल तैयार किया गया है, जिसमें पहले सुरक्षित गहराई बनाई जाती है और फिर वहां विस्फोट किया जाता है।
चुनौतियां अभी भी कम नहीं
हालांकि यह योजना बेहद प्रभावशाली दिखाई देती है, लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा।
सबसे बड़ी चुनौती एस्टेरॉयड का समय रहते पता लगाना है।
यदि वैज्ञानिकों को खतरे की जानकारी बहुत देर से मिले, तो इतने जटिल दो-स्पेसक्राफ्ट मिशन को तैयार करना और लॉन्च करना लगभग असंभव हो सकता है।
इसके अलावा न्यूक्लियर उपकरण और भारी स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए अत्यधिक शक्तिशाली हेवी-लिफ्ट लॉन्च व्हीकल की आवश्यकता होगी।
कानून भी बन सकते हैं बाधा
एक और बड़ी समस्या अंतरराष्ट्रीय कानून हैं।
वर्तमान में Outer Space Treaty के तहत अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों की तैनाती और उपयोग पर कड़े प्रतिबंध हैं।
यदि भविष्य में इस तरह की तकनीक अपनानी हो, तो कई देशों की सहमति और अंतरराष्ट्रीय संधियों में संशोधन आवश्यक होगा।
चेल्याबिंस्क हादसा याद दिलाता है खतरा
2013 में रूस के चेल्याबिंस्क शहर के ऊपर लगभग 20 मीटर चौड़ा एस्टेरॉयड वायुमंडल में फट गया था।
उसकी शॉकवेव इतनी शक्तिशाली थी कि 1,500 से अधिक लोग घायल हो गए और हजारों इमारतों की खिड़कियां टूट गईं।
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि यदि केवल 20 मीटर का एस्टेरॉयड इतना नुकसान पहुंचा सकता है, तो 100 मीटर या एक किलोमीटर चौड़ा एस्टेरॉयड पृथ्वी पर कैसी तबाही मचा सकता है।
भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में ग्रहों की सुरक्षा (Planetary Defense) वैश्विक प्राथमिकताओं में शामिल होगी। NASA का DART मिशन फिलहाल छोटे एस्टेरॉयड के खिलाफ एक सफल और प्रमाणित तकनीक है, जबकि चीन का प्रस्तावित न्यूक्लियर मॉडल अभी सैद्धांतिक चरण में है। यदि भविष्य में किसी विशाल एस्टेरॉयड से पृथ्वी को वास्तविक खतरा पैदा होता है, तो संभव है कि दुनिया की अंतरिक्ष एजेंसियां मिलकर नई तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए मानव सभ्यता की रक्षा का रास्ता तलाशें। फिलहाल विज्ञान लगातार इस दिशा में आगे बढ़ रहा है ताकि यदि कभी अंतरिक्ष से विनाश का कोई पत्थर पृथ्वी की ओर बढ़े, तो मानवता उसके सामने असहाय न रहे।

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